मैं एक इंजीनियर हूं और मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट करके निजी वित्त सलाहकार हूं। मेरे स्कूली दिनों में उन छात्रों को स्मार्ट नहीं माना जाता था, जो ग्यारहवीं कक्षा में विज्ञान से इतर विषय की पढ़ाई करते थे। हालांकि कुछ अपवाद थे, जिन्हें आप उंगलियों पर गिन सकते थे और वे इसलिए विज्ञान नहीं पढ़ते थे, क्योंकि वे विज्ञान द्वारा पेश आने वाली कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना चाहते थे। कला एवं वाणिज्य के ऊपर विज्ञान को तवज्जो देने की मानसिकता लगातार जारी रही, खासकर विज्ञान के छात्रों ने स्कूली शिक्षा के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां इंजीनियरों के लिए रोजगार सुलभ था, कुकुरमुत्ते की तरह इंजीनियरिंग कॉलेज खुले। सुरक्षित भविष्य के लिए इंजीनियरिंग का विकल्प चुनना जरूरत थी।
समय के साथ जैसे हर चीज का क्षरण हुआ है, उसी तरह हम अब ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं, जहां इंजीनियरिंग के लिए वैसा आकर्षण नहीं रहा है, जैसा एक दशक पहले हुआ करता था। दूसरी तरफ कला, राजनीति विज्ञान, भाषा-साहित्य, लेखा और वाणिज्य विषय की मांग बढ़ती प्रतीत होती है। ऐसा नहीं है कि विज्ञान की पढ़ाई करने वालों की संख्या पूरी तरह खत्म हो गई है, अब भी बहुत से छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग एवं गणित पढ़ते हैं। हुआ बस इतना है कि रोजगार के रास्ते बदल गए हैं, जिससे विज्ञान से इतर विषय की पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी उसमें भाग लेने और लाभान्वित होने का अवसर मिल रहा है।