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विज्ञान से मुंह मोड़ते छात्र : मेरे स्कूली दिनों में उन छात्रों को स्मार्ट नहीं माना जाता था

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Thu, 04 Jul 2019 12:49 AM IST
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विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया - फोटो : a

मैं एक इंजीनियर हूं और मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट करके निजी वित्त सलाहकार हूं। मेरे स्कूली दिनों में उन छात्रों को स्मार्ट नहीं माना जाता था, जो ग्यारहवीं कक्षा में विज्ञान से इतर विषय की पढ़ाई करते थे। हालांकि कुछ अपवाद थे, जिन्हें आप उंगलियों पर गिन सकते थे और वे इसलिए विज्ञान नहीं पढ़ते थे, क्योंकि वे विज्ञान द्वारा पेश आने वाली कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना चाहते थे। कला एवं वाणिज्य के ऊपर विज्ञान को तवज्जो देने की मानसिकता लगातार जारी रही, खासकर विज्ञान के छात्रों ने स्कूली शिक्षा के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां इंजीनियरों के लिए रोजगार सुलभ था, कुकुरमुत्ते की तरह इंजीनियरिंग कॉलेज खुले। सुरक्षित भविष्य के लिए इंजीनियरिंग का विकल्प चुनना जरूरत थी।

समय के साथ जैसे हर चीज का क्षरण हुआ है, उसी तरह हम अब ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं, जहां इंजीनियरिंग के लिए वैसा आकर्षण नहीं रहा है, जैसा एक दशक पहले हुआ करता था। दूसरी तरफ कला, राजनीति विज्ञान, भाषा-साहित्य, लेखा और वाणिज्य विषय की मांग बढ़ती प्रतीत होती है। ऐसा नहीं है कि विज्ञान की पढ़ाई करने वालों की संख्या पूरी तरह खत्म हो गई है, अब भी बहुत से छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग एवं गणित पढ़ते हैं। हुआ बस इतना है कि रोजगार के रास्ते बदल गए हैं, जिससे विज्ञान से इतर विषय की पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी उसमें भाग लेने और लाभान्वित होने का अवसर मिल रहा है।



इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में चल रही प्रवेश प्रक्रिया को देखें, तो पता चलता है कि उच्च कटऑफ के बावजूद राजनीति विज्ञान एवं मानविकी की अन्य शाखाओं में अपेक्षा से अधिक तेजी से सीटें भर रही हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि छात्र अपने भविष्य की मांगों के बारे में पूरी तरह से वाकिफ हैं। प्रारंभिक स्कूली परामर्श से कई लोगों को लग रहा है कि सिविल सेवा, अध्यापन और विकास क्षेत्र में अपनी भूमिका तलाशना उनके लिए ज्यादा लाभप्रद है, जिसमें विज्ञान पढ़ने की जरूरत नहीं है।

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विश्वविद्यालय प्रवेश प्रक्रिया - फोटो : a
मैं एक इंजीनियर हूं और मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट करके निजी वित्त सलाहकार हूं। मेरे स्कूली दिनों में उन छात्रों को स्मार्ट नहीं माना जाता था, जो ग्यारहवीं कक्षा में विज्ञान से इतर विषय की पढ़ाई करते थे। हालांकि कुछ अपवाद थे, जिन्हें आप उंगलियों पर गिन सकते थे और वे इसलिए विज्ञान नहीं पढ़ते थे, क्योंकि वे विज्ञान द्वारा पेश आने वाली कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना चाहते थे। कला एवं वाणिज्य के ऊपर विज्ञान को तवज्जो देने की मानसिकता लगातार जारी रही, खासकर विज्ञान के छात्रों ने स्कूली शिक्षा के बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां इंजीनियरों के लिए रोजगार सुलभ था, कुकुरमुत्ते की तरह इंजीनियरिंग कॉलेज खुले। सुरक्षित भविष्य के लिए इंजीनियरिंग का विकल्प चुनना जरूरत थी।

समय के साथ जैसे हर चीज का क्षरण हुआ है, उसी तरह हम अब ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं, जहां इंजीनियरिंग के लिए वैसा आकर्षण नहीं रहा है, जैसा एक दशक पहले हुआ करता था। दूसरी तरफ कला, राजनीति विज्ञान, भाषा-साहित्य, लेखा और वाणिज्य विषय की मांग बढ़ती प्रतीत होती है। ऐसा नहीं है कि विज्ञान की पढ़ाई करने वालों की संख्या पूरी तरह खत्म हो गई है, अब भी बहुत से छात्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग एवं गणित पढ़ते हैं। हुआ बस इतना है कि रोजगार के रास्ते बदल गए हैं, जिससे विज्ञान से इतर विषय की पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी उसमें भाग लेने और लाभान्वित होने का अवसर मिल रहा है।

इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में चल रही प्रवेश प्रक्रिया को देखें, तो पता चलता है कि उच्च कटऑफ के बावजूद राजनीति विज्ञान एवं मानविकी की अन्य शाखाओं में अपेक्षा से अधिक तेजी से सीटें भर रही हैं। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि छात्र अपने भविष्य की मांगों के बारे में पूरी तरह से वाकिफ हैं। प्रारंभिक स्कूली परामर्श से कई लोगों को लग रहा है कि सिविल सेवा, अध्यापन और विकास क्षेत्र में अपनी भूमिका तलाशना उनके लिए ज्यादा लाभप्रद है, जिसमें विज्ञान पढ़ने की जरूरत नहीं है।

ऐसी स्पष्टता के साथ कॉलेज में प्रवेश करते समय कई छात्र कला विषयों को चुनते हैं, क्योंकि सिविल सेवा या अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में प्रवेश पाने के लिए यह स्वाभाविक प्रगति है। मनोविज्ञान, अंग्रेजी साहित्य, इतिहास और बीए के अन्य कार्यक्रमों में भी कटऑफ सूची उच्च रहती है और पहली सूची जारी होने के तुरंत बाद सीटें भर जाती हैं। इस वर्ष बारहवीं कक्षा में सीबीएसई परीक्षा में पूरे देश में शीर्ष स्थान पाने वाली हंसिका शुक्ला ने लेडी श्रीराम कॉलेज में बीए (आनर्स) में मनोविज्ञान विषय में दाखिला लिया है।

सिर्फ उसने ही नहीं, हाल के समय में कई टॉपरों ने मनोविज्ञान विषय को चुना है, क्योंकि यह न सिर्फ भविष्य के लिए अवसर की गुंजाइश प्रदान करता है, बल्कि बाद में उनके लिए संबद्ध विज्ञान विषयों में अवसरों की कई खिड़कियां खोलता है, जिसके लिए उन्हें स्नातक कक्षा में बुनियादी विज्ञान विषय पढ़ने की जरूरत नहीं होती।

मानविकी में व्यापक विकल्प- पारंपरिक तौर पर मानविकी को इस तरह वर्गीकृत किया जाता है कि इसमें साहित्य, दर्शन, विदेशी भाषा इत्यादि की पढ़ाई होती है। हालांकि मानविकी के तहत किन-किन विषयों की पढ़ाई हो सकती है, उसका स्पष्ट बोध कराने में यह तरीका विफल रहता है। वास्तव में यह भ्रामक हो सकता है। ऐसी सामान्य परिभाषाओं ने मजबूत इरादों वाले मानविकी के छात्रों को भी अपनी क्षमताओं और भविष्य की संभावनाओं पर संदेह करने के लिए मजबूर किया है।

मानविकी एक विशाल और विस्तृत विषय है, जो मानव द्वारा बनाई गई चीजों का अध्ययन और विश्लेषण करता है, जैसे कि साहित्य, संगीत, कला आदि। एक तरह से, मानविकी हमें जटिल नैतिक मुद्दों का पता लगाने में मदद करती है, और हमें यह समझने में मदद करती है कि हमारे अंदर क्या चल रहा है, यानी यह हमें बताती है कि मनुष्य होने का क्या मतलब है। हां, विज्ञान के छात्र को यह क्षेत्र अजीब लग सकता है, जो अस्पष्ट है और इन विषयों के अध्ययन के परिणाम का स्पष्ट खुलासा नहीं करता है। जबकि सिविल इंजीनियर के रूप में यह स्पष्ट होता है कि आप निर्माण कार्य के क्षेत्र में जाएंगे या कंप्यूटर साइंस इंजीनियर में आप कोडिंग या हार्डवेयर का काम करेंगे।

मानविकी की महत्ता को केवल तभी पूरी तरह सराहा जा सकता है, जब आप उसका अनुभव करें और उसे समझें। विज्ञान और इंजीनियरिंग के विपरीत मानविकी का अध्ययन तत्काल और व्यावाहरिक खोज से परे के लिए आपको प्रेरित करता है। यह मानव स्थिति की संपूर्णता की परीक्षा के लिए अवसर खोलता है और जीवन में कभी-कभी जटिल नैतिक मुद्दों से जुझने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह विचार को प्रोत्साहित करता है और मानवता के लिए प्रशंसा और सहानुभूति प्रदान करता है।

रोजगारोन्मुखी शिक्षा- विज्ञान और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले छात्र इन डिग्रियों से जुड़े स्पष्ट कैरियर परिणामों के कारण इनका अध्ययन करते हैं, लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ने और इंजीनियरों की मांग घटने के कारण उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, दुनिया अधिक स्वचालित और मशीनों पर निर्भर हो रही है। इंजीनियरिंग एवं इंजीनियरों की भूमिका के लिए मानवीय भागीदारी की आवश्यकता होती है, जिसे विज्ञान और इंजीनियरिंग के छात्रों की तुलना में मानविकी के छात्र करने में ज्यादा सक्षम हैं।

आज मानविकी में कई स्पष्ट रोजगारोन्मुख कैरियर विकल्प हैं और इसे विज्ञान एवं इंजीनियरिंग की तुलना में एक समग्र विषय के रूप में माना जाता है, जिसके चलते उज्ज्वल दिमाग वाले छात्र विज्ञान की तुलना में इसे ज्यादा आकर्षक पाते हैं। मानविकी शिक्षा की लागत अपेक्षाकृत कम भी है। कानून, अर्थशास्त्र, मीडिया अध्ययन और विकासात्मक विज्ञान जैसे विकल्प ज्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं, क्योंकि इनमें रोजगार के साथ-साथ कैरियर विकास की संभावनाएं भी हैं।
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