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अफगानिस्तान में अमन की तलाश

Mon, 19 Jun 2017 08:03 PM IST
कुलदीप तलवार
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कुलदीप तलवार
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अफगानिस्तान में रमजान के इस पवित्र महीने में, इंसानी खून की होली जारी है। शायद ही कोई दिन जाता हो, जब बम धमाकों में निर्दोष लोगों की जान न जाती हो। रमजान के पहले दिन एक आत्मघाती हमले में 13 लोगों को जान गंवानी पड़ी। तीन दिन बाद फिर काबुल स्थित भारतीय दूतावास के निकट बम धमाके हुए और इनमें 90 से ज्यादा लोग मारे गए और 350 से अधिक लोग घायल हुए। इसके बाद इन बम धमाकों के खिलाफ हुए प्रदर्शन में तीन लोग मारे गए, जिनमें एक अफगान सांसद का बेटा भी था।
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मृतक के अंतिम संस्कार के दौरान भी तीन बम धमाकों में 20 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। अंतिम संस्कार में शामिल सरकार के मुख्य कार्यकारी अब्दुला-अब्दुला भी शामिल थे, जो बाल-बाल बच गए। इस कड़ी में हरात शहर में एक मस्जिद के करीब हुए विस्फोट में सात लोग मारे गए और 13 लोग घायल हुए। काबुल स्थित दूतावास में भी रॉकेट दागा गया। रॉकेट के टेनिस कोर्ट में गिरने से कर्मचारी बाल-बाल बच गए। 

अफगानिस्तान एक मुस्लिम देश है और इन हालात के जिम्मेदार भी मुसलमान ही हैं। इससे एक बात फिर साबित हो जाती है कि दहशतगर्दों का कोई मजहब नहीं है, क्योंकि उनको इस बात की परवाह नहीं है कि महीना कौन-सा है या दिन कौन सा है? उनकी दिलचस्पी बस इससे होती है कि किस तरह लोगों में दहशत फैलाई जाए और ज्यादा से ज्यादा मासूम लोगों की जाने ली जाएं? वैसे ऐसी हत्याएं इस्लाम में हराम है। इसे किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
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देखा जाए तो काबुल ही नहीं पूरे अफगानिस्तान में पिछले एक साल भर में हिंसा में तेजी आई है। अफगान-तालिबान, हक्कानी नेटवर्क और आईएस के आतंकी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को कमजोर करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। आम अफगानियों का मानना है कि इस हिंसा के पीछे पाक की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है, जो इन संगठनों को हथियार और माली मदद उपलब्ध करा रही है। यूं तो बहुत से कारण हैं, लेकिन पाक को मुख्य तौर पर काबुल और नई दिल्ली के बेहतर रिश्ते हजम नहीं हो रहे हैं। पाक चाहता है कि हर सूरत में भारत बल्कि अमेरिका को अफगानिस्तान से बाहर किया जाए और अफगानिस्तान की सत्ता पर कब्जा जमा ले। पहले की तरह वहां एक ऐसी कठपुतली सरकार कायम हो, जो उसके उंगलियों पर नाचे। 

पर्याप्त सुरक्षा प्रदान कराने में नाकाम रहने पर अफगान सरकार से बेहतर सुरक्षा के लिए काबुल में हजारों लोग सड़क पर उतर आए और उन्होंने काबुल सरकार के इस्तीफे की मांग की। वाशिंगटन में भी पाकिस्तानी दूतावास के सामने अफगानी अमेरिकियों ने भी विरोध प्रदर्शन किया और आरोप लगाया कि काबुल में आईएसआई के इशारे पर हमले हो रहे हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने भी कहा है कि उनका देश पाकिस्तान से एक अघोषित युद्ध झेल रहा है। तालिबान पूर्वनियोजित आतंकवाद को ऐसा मंच प्रदान कर रहा है, जहां से पूरे इलाके के आतंकवादियों को अफगानिस्तान लाया जा रहा है। अशरफ गनी ने तालिबान को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि या तो वे शांति अपनाएं या फिर परिणाम भुगतने को तैयार रहें। 

एक अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फार स्ट्रैटजी ऐंड इंटरनेशनल स्टडीज (सीएसआईएस) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में अमेरिकी सरकार को चेताया है कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के लिए पाकिस्तान पनाहगाह बना हुआ है। अमेरिका को पाकिस्तान को यह साफ करना चाहिए कि अगर वह तालिबान को समर्थन देना और हक्कानी नेटवर्क को सहन करना जारी रखेगा, तो उसे मिलने वाली मदद पूरी तरह से बंद कर दी जाएगी। 

गरज यह है कि अफगानिस्तान के मौजूदा संगीन हालातों पर काबू पाने और वहां शांति बहाली के लिए अफगानिस्तान के हमदर्द सहयोगी देशों को खासतौर पर अमेरिका को बिना किसी देरी के आवश्यक ठोस कदम उठाने होंगे। 
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