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पाकिस्तान की हताशा

Mon, 19 Jun 2017 10:36 AM IST
प्रशांत दीक्षित
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प्रशांत दीक्षित
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पर्यटन के लिहाज से मौसम के अनुकूल होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर की स्थिति जटिल और कठिन है। देश के इस हिस्से में जिस तरह की घटनाएं घटती रही हैं, उससे मौजूदा दौर अलग नहीं है। कश्मीर में हम अशांति, पत्थरबाजी, संघर्ष विराम उल्लंघन और बड़े पैमाने पर घुसपैठ की कोशिशों के गवाह रहे हैं। भारतीय सेना की पंद्रहवीं कोर के कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन कहते हैं कि 'पिछले दो हफ्ते में नियंत्रण रेखा के आसपास घुसपैठ की इतने प्रयास देखने को मिले, जितने मैंने हाल के समय में नहीं देखे थे।' 
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पाकिस्तान के नए सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखती है। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान फिर से कश्मीर घाटी को बहस के केंद्र में लाना चाहता है, जहां पाकिस्तान 'हिट ऐंड रन ऑपरेशंस', छोटे स्तर के गुरिल्ला हमले और आतंकी कार्रवाइयों के जरिये कश्मीर में जारी अशांति का समर्थन करता है। इसकी पुष्टि गैर पारंपरिक क्षेत्रों के जरिये घुसपैठ के कई प्रयासों से होती है। उसका इरादा अमरनाथ यात्रा से पहले घाटी में ज्यादा से ज्यादा घुसपैठियों को भेजने का है, जिसके पीछे बड़े आतंकी हमलों को अंजाम देने की साजिश हो सकती है।  

निस्संदेह सीमावर्ती क्षेत्र में पाकिस्तान की सक्रियता बढ़ी है। वास्तव में यह उसकी हताशा को दिखाता है। पहली बात तो यह है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख मोटे तौर पर भारत की बहुप्रचारित सर्जिकल स्ट्राइक से उपजे असंतोष के किसी भी संकेत को दबाने के लिए अपने कोर कमांडरों पर अपनी पूरी पकड़ दिखाना चाहते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक एक ऐसी घटना है, जिसे सार्वजनिक तौर पर पाकिस्तान ने कभी स्वीकार नहीं किया, लेकिन सैन्य प्रतिष्ठान के भीतर उसको लेकर बेहद नाराजगी है। पद संभालने के तुरंत बाद सैन्य जवानों के साथ नियंत्रण रेखा का उनका दौरा एक विस्तृत घुसपैठ के लिए जमीन तैयार करने के इरादे से ही हुआ था। 
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पाकिस्तान में सेना पर अंकुश लगाने की लोकतांत्रिक शासन की क्षमता कभी नहीं थी और न अब है। पनामा पेपर्स लीक्स में मनी लॉन्डरिंग के आरोपों ने नवाज शरीफ सरकार की विश्वनीयता को निचले स्तर पर पहुंचा दिया है, जो शायद लोगों का ध्यान दूसरी तरफ बंटाने के लिए पाकिस्तानी सेना द्वारा प्रशिक्षित आंतवादियों की घुसपैठ को पूरी ताकत के साथ बढ़ावा दे रहे हैं। उनके आकलन के मुताबिक, यह अपने खिलाफ उभरते प्रतिकूल प्रचार से ध्यान हटाने में बेहद सफल है। 

हाल में घाटी में दो आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन में आठ आतंकवादी मारे गए। भारतीय सेना द्वारा मारे गए आतंकवादियों में हिजबुल मुजाहिद्दीन का कमांडर सब्जार अहमद भट्ट भी था। यह मानना बिल्कुल सही और उचित है कि भारतीय सेना द्वारा पहले बुरहान वानी और अब भट्ट को मार गिराए जाने के बाद पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठियों को विरोध जताने के लिए मजबूर कर पीछे हटने की अनुमति दिए बिना उसे समर्थन दिया होगा। 

कश्मीर के संबंध में पाकिस्तानी शासन के लिए सबसे बड़ा नुकसान यह है कि भारतीय नेशनल इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी (एनआईए) के छापे से अलगाववादी हुर्रियत की विश्वसनीयता गिर गई है। घाटी और दक्षिण श्रीनगर में बड़े पैमाने पर हुर्रियत के सदस्यों को भीख (चंदे) और पाकिस्तान के वित्तीय समर्थन पर जीने वाले अय्याश के रूप में देखा जाता है। पाकिस्तानी शासन की नजर में हुर्रियत की प्रासंगिकता खत्म होने पर जम्मू-कश्मीर में उसके प्रचार की गति वास्तव में घट जाएगी।

इसकी पुष्टि इस खबर से भी होती है कि कश्मीर के युवा बड़ी संख्या में जम्मू-कश्मीर पुलिस और भारतीय सेना में शामिल होने के इच्छुक हैं, क्योंकि घाटी में हुर्रियत की लोकप्रियता और स्वीकृति घट गई है। फिर भी पकिस्तान के योजनाकार सीमा पार से जोरदार घुसपैठ कराकर सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा देने और घाटी में अराजकता फैलाने का मंसूबा पाले हुए हैं, क्योंकि यह भारतीय प्रतिष्ठानों में शामिल होने के इच्छुक युवाओं के ज्वार को रोकने के लिए एक स्थापित पद्धति है। भारत में कश्मीर के युवा जहां पुलिस एवं सेना में शामिल होने के इच्छुक हैं, वहीं पाकिस्तान में स्थिति इसके ठीक उलट है, जहां पुलिस एवं सेना में भर्ती बिना भ्रष्टाचार के संभव नहीं है। 

 पाकिस्तान अपने बारे में बढ़ती विफल राष्ट्र की अवधारणा को कम करने के लिए भी कश्मीर मुद्दे का इस्तेमाल करना चाहता है। वह तालिबान के कट्टरपंथी इस्लामी कार्रवाइयों और इस्लामिक स्टेट की ताकत से तो जूझ ही रहा है, अब उसके लिए बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन से निपटना भी जरूरी हो गया है, जो अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और अपनी सामाजिक स्थिति को बेहतर बनाने की उसकी शानदार योजनाओं में हस्तक्षेप कर रहा है।

इस संदर्भ में पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को जीवन रक्षक मानता है। लेकिन विडंबना यह है कि पंजाब प्रांत को छोड़कर शेष पाकिस्तान में इस परियोजना को उनकी जीवन-शैली को प्रभावित करने वाली चीनी उपनिवेशवादी योजना के रूप में देखा जा रहा है। गिलगिट और स्कार्दु और फिर ग्वादर बंदरगाह के आसपास के बलूच क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर चीन ने आधिपत्य जमा लिया है और वहां निर्माण कार्य जारी है। पाकिस्तानी सेना इन दोनों आंदोलनों के दबाने में लगी हुई है। लेकिन बलूच क्षेत्र में क्रूर दमन के बावजूद वे आंदोलन को दबाने में सक्षम नहीं हो पाए हैं, हालांकि उन्होंने गलियारे की सुरक्षा के लिए सेना की एक टुकड़ी वहां तैनात कर दी है। 
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 इसलिए पाकिस्तान के भविष्य को संभालने वाली ताकतें हताशा में जम्मू-कश्मीर से खेलती हैं। 
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