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आर्मेनिया-अजरबैजान युद्ध से बहुत कुछ सीख सकता है भारत  

राम यादव Published by: राम यादव Updated Sun, 20 Dec 2020 03:26 AM IST
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आर्मीनिया और अजरबैजान के बीच लड़ाई - फोटो : PTI

आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच अक्तूबर-नवंबर 2020 में केवल छह सप्ताह चले युद्ध में कुछ ऐसी बातें भी थीं, जिनसे भारत बहुत कुछ सीख सकता है। नगोर्नो काराबाख से जुड़े चिरकालिक विवाद को लेकर आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच जो आकस्मिक युद्ध हुआ, अमेरिका और यूरोप ने शुरू में उसे गंभीरता से नहीं लिया। भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर अक्सर होने वाली झड़पों की तरह ही इसे दो छुटभैयों के बीच की आपसी चखचख माना गया। किंतु इस संक्षिप्त युद्ध में आर्मेनिया की भारी हार और हार के रणनीतिक व तकनीकी कारणों के बारे में मिल रही जानकारियों से अब पश्चिमी जगत भी सन्न है। अमेरिकी नेतृत्व वाले 30 देशों के 'उत्तर अटलांटिक संधि संगठन' (नाटो) के मुख्यालय में इन जानकारियों का पिछले दिनों गहन अध्ययन किया गया।



विचार-विमर्श का एक ऐसा ही दौर दिसंबर के आरंभ में, बर्लिन में जर्मनी के रक्षा मंत्रालय में भी हुआ। उसमें इंटरनेट पर गोपनीयता बनाये रखने की इन्क्रिप्शन विधि के द्वारा अमेरिका के तकनीकी विशेषज्ञों ने भी ऑनलाइन भाग लिया। बैठकें गोपनीय थीं, इसलिए मीडिया को कुछ नहीं बताया गया। जर्मन रक्षा मंत्रालय के निचले स्तर के एक अधिकारी ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर, कुछ पत्रकारों से इतना ही कहा कि 'यदि हम अब तक की तरह ही काम करते रहे, तो सब-कुछ खो बैठेंगे।'


कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युद्ध ने नाटो की दशकों से चल रही रणनीति, सामरिक तैयारी और उसके अस्त्र-शस्त्र भंडारों की भावी उपयोगिता के प्रति संदेह पैदा कर दिया है। नाटो चकित है कि विशाल तोपों-टैंकों जैसे भारी-भरकम हथियार भी आकाश में उड़ते मानवहीन स्वचालित ड्रोनों की मार के आगे बेकार साबित हो सकते हैं। उसके सैन्य विशेषज्ञ इस युद्ध को अब दुनिया का पहला 'ड्रोन-युद्ध' बताने लगे हैं। 


आर्मेनियाई सेना वास्तव में एक ऐसी अनुशासित और सुगठित सेना मानी जाती थी, जिसके पास बड़ी संख्या में बहुत अच्छे टैंक और वाहन थे। लेकिन तेल की आय से अजरबैजान ने इस बीच तुर्की और इस्राइल से कई प्रकार के बहुत सारे ड्रोन खरीदे हैं। चालकरहित इन ड्रोनों ने अपने हवाई हमलों द्वारा आर्मेनियाई तोपों, टैंकों और सैन्य वाहनों की धज्जियां उड़ा दीं। 


अजरबैजान ने आर्मेनिया के संभवतः 175 टैंक ध्वस्त कर दिए। उसका साथ दे रहे तुर्की ने अपने कई एफ-16 युद्धक विमान अजरबैजान में तैनात कर रखे थे। दूसरी ओर आर्मेनिया को कुछ ही महीने पहले रूस से आठ सुखोई-30  युद्धक विमान मिले थे। किंतु वह इन विमानों का ड्रोनों या एफ-16 युद्धक विमानों के विरुद्ध उपयोग कर ही नहीं पाया, क्योंकि रूस नहीं चाहता था कि उसके विमानों और अजरबैजान को तुर्की से मिले अमेरिकी एफ-16 विमानों का कोई सीधा आमना-सामना हो।  


रूस ने हवाई हमलों से बचाव के लिए आर्मेनिया को जो साजो-सामान और मिसाइल दी थी, वे भी 1980 के दशक के थे। उनके इलेक्ट्रॉनिक सेंसर अधिक ऊंचाई पर तेजगति के विमानों को पहचान कर मार गिराने की क्षमता तो रखते हैं, पर कम ऊंचाई पर मंडराते धीमी गति के ड्रोनों इत्यादि को पहचान नहीं पाते। आर्मेनिया के पास ऐसा कोई 'जैमर' भी नहीं था, जो उसके आकाश में उड़ते ड्रोनों और अजरबैजान से उन्हें निर्देशित कर रहे केंद्रों के बीच इलेक्ट्रॉनिक संवाद के सिग्नलों को जाम कर सकता।


अजरबैजान 'लॉइटरिंग ड्रोन' कहलाने वाले बिल्कुल नए इस्राइली ड्रोन-अस्त्र भी इस्तेमाल कर रहा था, जो बहुत छोटे होते हैं। वे किसी पक्षी की तरह मंदगति से हवा में मंडराते हुए बिना किसी बाहरी निर्देश के अपना लक्ष्य स्वयं ही पहचान कर उस पर टूट पड़ते हैं और विस्फोट से उसे नष्ट कर देते हैं। इसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा स्वचालित युद्ध की दिशा में पहला कदम भी कहा जा सकता है। भारत में लद्दाख जैसे दुर्गम मोर्चों के लिए उन्हें बहुत ही उपयोगी माना जा सकता है।
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आर्मेनिया-अजरबैजान युद्ध से जो नई सीखें मिलती हैं, विशेषज्ञों के अनुसार वे हैं-मानव-रहित ड्रोनों के जमाने में तोप, टैंक और बख्तरबंद वाहन युद्ध नहीं जिता पाएंगे; जमीनी हथियारों की मारक शक्ति और ड्रोनों की बहुपक्षीय उपयोगिता को आपस में पिरोना होगा; हवाई हमलों से बचाव में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग प्रणालियों को भी शामिल करना होगा; युद्ध का स्तर ऐसा रखना होगा कि शत्रुपक्ष अंधाधुंध अति पर न उतर आए; अपनी रणनीति में प्राकृतिक भूसंरचना की भूमिका का भविष्य में भी ध्यान रखना होगा।


भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि वह ड्रोनों के निर्माण में अपने मित्र इस्राइल की आश्चर्यजनक दक्षता का लाभ उठाते हुए उससे जल्द ही न केवल उच्च कोटि के ड्रोन प्राप्त करे, बल्कि उनके स्वदेशी निर्माण की भी अतिशीघ्र चिंता करे। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की भूसंरचना आर्मेनिया-अजरबैजान के पहाड़ों से बहुत भिन्न नहीं है। चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध की यदि नौबत आई, तो वहीं आएगी। नवीनतम समाचार भी यही है कि भारतीय सेना इस्राइल से 'लॉइटरिंग ड्रोन' सहित कई प्रकार के ड्रोन प्राप्त करना चाहती है।

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