आज कोरोना वायरस महामारी के दौर में बुद्धं शरणं गच्छामि... की प्रार्थना को चरितार्थ करते हुए पूरा विश्व एक बार फिर ‘भैषज्यगुरु’ – ‘मेडिसिन बुद्धा’ की शरण में है। दुनिया में एक बार फिर ‘युद्ध नहीं, बुद्ध’ की चेतना जाग्रत हुई है। बुद्ध मानव के लिए हमेशा प्रासंगिक रहे हैं, फिर भी आज उनकी प्रासंगिकता की तीव्रता का अनुभव विश्वव्यापी है। रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के मानवीय कष्ट से दुखी होकर 2,600 साल पहले राजकुमार सिद्धार्थ गौतम जब राजमहल से घटाटोप रात में मनुष्य के जरा-मरण-रोग से मुक्ति का उपाय ढूंढ़ने निकल पड़े, तब वह बुद्ध नहीं थे। कठिन तपस्या और एकांतवास के बाद जब उनमें बोधगया (बिहार) में पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न स्थिति में ज्ञान की ज्योति का ‘शक्तिपात’ हुआ, वह राजमहल का त्याग करने वाले राजकुमार से ‘बुद्ध’ हो गए।
बुद्धत्व प्राप्ति के बाद बुद्ध ने मानवमात्र के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करते हुए 12 प्रतिज्ञाएं कीं। ये सभी प्रतिज्ञाएं मानव कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करने की प्रतिज्ञाएं थीं। इनमें बुद्ध की छठीं तथा सातवीं प्रतिज्ञाएं आज उन्हें और भी प्रासंगिक सिद्ध करती हैं। बुद्ध ने छठी प्रतिज्ञा की- बीमार, अशक्त, विकलांग सभी पूर्ण स्वस्थ हों और जो मेरी शरण में आएंगे, वे रोग-शोक से मुक्त होंगे। सातवीं प्रतिज्ञा में उन्होंने कहा, मैं समस्त रोगियों, असहाय लोगों और गरीब लोगों को हर प्रकार के कष्ट और पीड़ा से मुक्ति दूंगा। बौद्ध महायान परंपरा में भगवान बुद्ध के आठ अवतारों में सातवां अवतार ‘भैषज्यगुरु’ का अवतार है। तिब्बत में बुद्ध के मंजुश्री, अमिताभ, पद्मसंभव आदि रूपों की मान्यता के साथ ‘मेडिसिन बुद्ध’ भी पूजित हैं। बौद्ध परंपरा के मूल ग्रंथ त्रिपिटक में बुद्ध को ‘शल्यकत्तो अनुत्तरो’ अर्थात शल्यक्रिया में निपुण, उत्कृष्ट, अद्वितीय सर्जन की मान्यता है। पृथ्वी पर उनका प्रादुर्भाव ही मानवमात्र के कल्याण और दुख निवारण के लिए हुआ।
उन्होंने धर्म के आचरण को कष्ट, पाप एवं पीड़ा के निवारण का मार्ग बताया। बौद्ध ग्रंथों में भगवान बुद्ध के हर रूप में उनकी रोगशमन शक्ति की महिमा का विशेष उल्लेख है। गिरिमानंद सुत्त में वर्णित एक चर्चित प्रसंग के अनुसार, राजगीर में बुद्ध के एक भिक्षु गंभीर रूप से बीमार हो गए। दूसरे भिक्षु आनंद ने भगवान बुद्ध को जब इस बारे में बताया, तो उन्होंने बीमार भिक्षु के लक्षण पूछे, फिर रोग के लक्षणों के आधार पर निदान किया तथा उपचार बताया कि साफ-सफाई के साथ रहकर एक सप्ताह बैठकर साधना करना है। ऐसा करने पर सातवें दिन ही बीमार भिक्षु पूर्ण स्वस्थ होकर बुद्ध के चरणों में पहुंचे।
महायान-बौद्ध परंपरा के अनुयायी जापान, चीन, तिब्बत, मंगोलिया, वियतनाम आदि देशों के बौद्धों का पारंपरिक विश्वास है कि केवल बुद्ध की मूर्ति के स्पर्श या उनके नामोच्चारण से ही अनेक रोगों का उपचार हो जाता है। कुछ जटिल रोगों के उपचार के लिए बौद्ध धर्म की ‘भैषज्यगुरु’ परंपरा में अनेक कठिन पूजा-उपचार पद्धतियां हैं। महायान संप्रदाय में अनेक मुद्राओं में भैषज्यगुरु की प्रतिमाएं हैं। जापान के नारा शहर में आठवीं सदी के विश्वप्रसिद्ध कोफूकूजी मंदिर में अत्यंत सुंदर बुद्ध प्रतिमा के एक हाथ में औषधिपात्र तथा दूसरा हाथ भूमि स्पर्श मुद्रा में है, जिसकी अनेक धार्मिक, आध्यात्मिक एवं तात्विक विवेचनाएं
बौद्ध साहित्य में मिलती हैं। इसी मंदिर में आठवीं सदी में जापान के बीमार सम्राट के स्वास्थ्य लाभ के लिए पूजन, उपचार किया गया। वे पूर्ण स्वस्थ हो गए।
मंदिर की प्राचीन मान्यता के अनुसार, बौद्ध चिकित्सा परंपरा का आधार सूर्यप्रभा एवं चंद्रप्रभा हैं, जो किरणों का प्रभाव है और दोनों प्रकाश के प्रतीक हैं। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में भी बौद्ध चिकित्सा परंपरा के अनुसार, कोरोना के दुष्प्रभाव से मुक्ति के लिए सूर्योदय के दर्शन के महत्व की चर्चा की है। वर्तमान कोरोना के प्रसार से उपजे दुख और आपदा काल में बुद्ध मानवमात्र के लिए आशा की किरण हैं।
-लेखक नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय, प्रयागराज के कुलपति हैं।