कभी कहा जाता होगा दृश्य जगत को प्रकृति, अब तो न्यूज चैनलों को प्रकृति कहा जाता है। उषा, संध्या, वन, नदी आदि चैनलों पर उपलब्ध हैं। हर मुल्क में आने वाले मेघ हमारे देश में भी आ गए, पर उनका मान मर्दन हो रहा है। जब मेघों का मान मर्दन हो, तो हम किसी उज्जैनी से उम्मीद नहीं कर सकते कि वह एक अदद कालिदास हमें दे देगी।
इधर कवियों ने जो बरसात की है, उसमें न पानी है और न गुड़ धानी। जाहिर है कि ये कवि 'सु' विशेषण वाले नहीं हैं। अब तो काव्य जगत में 'झंझा झकोर गर्जन चहुं ओर' दिखाई दे रहा है। पहली बरसात की सोंधी खुशबू का एहसास इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि कोरोना ने सूंघने की हमारी शक्ति पर हमला कर दिया है।
काली घटा को वेणी कहने वाले कवि वेबिनार के कार्यक्रमों में उलझे हैं। पावस के अंधियारे तब डराएं, जब उन्हें कोई देखे। अभी जायसी के बारहमासी की तर्ज पर कोरोना का बारहमासी रचा जा रहा है। पर राग मेघ मल्हार की तासीर है। जब कोई इसे मन प्राण से गाता है, तो पानी बरसता है।
कहा जाता है, तानसेन कई बार इसी तरह बरसात करवा देते थे। राग मेघ मल्हार मध्यकाल के कवियों की रचनाओं में बहुतायत में पाया जाता है। कबीर के पदों में चौबीस राग खोज लिए गए हैं। ये कवि संगीत के विशेषज्ञ भी थे। अब ऐसा नहीं है, इसलिए मेघ अक्सर रूठ जाते हैं।
कई देशों में आर्टिफिशियल बरसात करवाई जाती है। ठीक है, खेतों को फायदा होगा, पर इस बरसात में कबीर के पद कैसे गाए जाएंगे? तानसेन किसी हरिदास को कैसे संगीत में उतारेंगे? कृत्रिम बरसात में आप बिजली का कड़कना कहां से लाओगे? और फिर इंद्रधनुष?
आप प्रयोगशाला के डार्क रूम में प्रिज्म से प्रकाश की किरण गुजार कर वहां इंद्रधनुष बना देते हो, पर आसमान में तो नहीं बना सकते। चातक, मोर, पपीहे कृत्रिम नहीं हो सकते। झूला पड़ा कदम की डारी, झूले कृष्ण मुरारी या बाजे नगाड़ा इंदरगढ़ बाजे जैसे लोकगीत कहां से लाओगे? राग मल्हार कहां से लाओगे?
अब पावस ऋतु का दृश्य यह है कि गगन में गर्जना है। प्रकृति विपश्यना कर रही है। सियासत हमेशा की तरह बारिश के स्वागत में अल्पना उकेर रही है। उसके लिए बारिश आंकड़ों को अद्यतन करने का उत्सव है। स्कूलों में रेनी डे कई महीने पहले घोषित हो गया था। अस्पतालों में जिंदगी चाहने पर नहीं, इत्तफाक पर मयस्सर है। मास्क बांधे लोग प्रतीकों और बिंबों के संकेत समझने लगे हैं।
जागरूकता फैलाने वाले थक-हारकर खुद ही फैल गए हैं! बरसात की फुहारों में सड़क के किनारे भीड़ में गोल गप्पे खाने वाले को लगता है, जिंदगी तो फानी है, गोल गप्पे का पानी ही असली कहानी है! अब दुम का न होना भी आदमी को आदमी प्रमाणित करने में सक्षम नहीं है।
ऐसा नहीं है कि इनको मास्क मयस्सर नहीं है, ये लोग वायरस का वाहक बनने से पहले खुद ही वायरस थे! इस बीमारी ने उन्हें भी मार दिया है, जो मरने से ऐन पहले तक शाश्वतता की लोरी गा रहे थे! इस चालू फिल्म को देखकर नयन शर्मिंदा हैं। इस संगीत को कान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे।
लापरवाहियों का आलम पूरे देश में तारी है। तमाम राग और तोड़ी, वाद्य यंत्रों के साथ खूंटी पर टंगे हैं। लोग डरे हुए हैं, कहीं इनमें भी वायरस न घुस आया हो। जो लोग मानते थे कि मुखौटों को गढ़ना अहं को गढ़ना है, वे भी मास्क लगाए हुए हैं।
ऐसे वक्त में पावस के घन कौन देखता है? कवियों की बात अलग है, वे बादल को मास्क पहनाने की बात करते हैं, गो अपने आसपास के लोगों को मास्क पहनाने में विफल रहे हैं। जब मामला पैसों का हो, तो दो गज की दूरी कैसे रह सकती है? बैंक की लाइनों में सटकर खड़े पैसे निकालने को उद्दाम लोग खुद ही जन-धन खाते में तब्दील हो गए हैं!
संशय और संदेह के बादल मानसून पर भारी पड़ रहे हैं। लापरवाही हर गली और रेड जोन में मल्हार गा रही है। इस बीमारी से सामान्य एटिकेट्स की अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर देश की चिकित्सा व्यवस्था से हर एक को उम्मीद रहती है। लेकिन उनकी संवेदनाएं भी काठ हो गई हैं।
इस बार सारे चरागाह पथरीली जमीन में तब्दील हो गए हैं। बरसात से हरी घास उग जाएगी, इसकी उम्मीद नहीं है। ऐसे में संगीत और उसके राग को वैराग्य ही शोभा देता है। अतः मन को तसल्ली देते हुए मान लें, मेघ आए ही नहीं।