इस साल जनवरी के अंत में सबसे पहले केरल में ही देश में कोविड-19 का मामला सामने आया था। अब जब छह महीने बाद वायरस ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपने पैर पसार लिए हैं, लाखों लोग संक्रमित हुए और हजारों लोग मारे गए हैं, तब केरल ने खासकर दक्षिण भारत में सबसे पहले कोरोना की बीमारी को हराया है।
जबकि इसके पड़ोसी राज्य-तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मामले चिंताजनक ढंग से बढ़ रहे हैं। तमिलनाडु में बृहस्पतिवार तक कुल संक्रमित मरीजों की संख्या 1,22,400 को पार कर गई थी। राजधानी चेन्नई सहित मदुरई और सलेम में हर रोज मामले बढ़ रहे हैं।
राज्य में संक्रमित होने वाले विधायकों की संख्या एक दर्जन से ऊपर है, जिनमें दो मंत्री भी शामिल हैं। एक विधायक की पहले ही मौत हो चुकी है। अब तक राज्य में 1,700 से ज्यादा की मौत हो चुकी है। कोरोना से मुकाबला करने के मामले में तमिलनाडु देश के सबसे बदतर राज्यों में है, हालांकि मुख्यमंत्री का कहना है कि सूबे में कोरोना का सामुदायिक प्रसार नहीं हुआ है। लेकिन उनके रवैये से साफ है कि इससे निपटने के मामले में उनके पास बहुत विकल्प नहीं हैं।
तेलुगू भाषी राज्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, क्योंकि देश भर में लॉकडाउन में छूट दे दी गई है। तेलंगाना में कुल कोविड संक्रमितों की संख्या 27,612 है और अब तक 313 लोगों की मौत हो चुकी है। कम परीक्षण के लिए तेलंगाना सरकार की लगातार आलोचना हो रही है। आंध्र प्रदेश में संक्रमित मामलों की संख्या 22,259 पर पहुंच गई है और अब तक 252 मरीजों की मौत हो चुकी है। पूर्वी गोदावरी, कुरनूल, अनंतपुरम और गुंटूर जिलों में 2,000 से अधिक मामले हैं।
कर्नाटक में संक्रमितों की संख्या 28,877 है और अब तक 470 मौत हो चुकी है। बृहत बंगलूरू महानगरपालिका द्वारा जारी बुलेटिन के मुताबिक, बंगलूरू में 3,181 कोन्टेंमेंट जोन सक्रिय हैं। अगर ये दोनों एक राज्य होते, जैसे कि कुछ साल पहले तक थे, तो कोरोना से जुड़े आंकड़े बेहद भयावह होते। यह बताने का यहां मतलब सिर्फ इतना है कि केरल को छोड़कर दक्षिणी राज्यों ने कोविड-19 से निपटने में अब तक बेहद चलताऊ रवैये का परिचय दिया है।
जहां तक केरल की बात है, तो वहां अब तक 6,195 मामलों की पुष्टि हो चुकी है और 27 लोगों की मौत हुई है। केरल एक छोटा राज्य है। लेकिन किसी भी पैमाने पर दक्षिण के अन्य राज्यों की तुलना में केरल में स्थिति बेहतर और नियंत्रण में है। यह कैसे संभव हुआ? यह सरकार की प्रभावी रणनीतियों, अधिकारियों की कार्य कुशलता और जनता के सहानुभूतिपूर्ण सहयोग के कारण संभव हुआ। कोरोना से निपटने में केरल की सफलता का महत्व इसलिए भी है कि आंकड़ों के आईने में यह बताया जा रहा है कि उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण की स्थिति बेहद खराब है।
इस पर भी लोगों के विचार बंटे हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण भारत में अधिक संक्रमण ज्यादा और सघन जांच का नतीजा है, जबकि आलोचक मानते हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग और दूसरे नियमों के मामले में व्याप्त उदासीनता के कारण दक्षिण भारत की स्थिति बदतर है। लेकिन तेलंगाना में संक्रमितों की संख्या में ज्यादा इजाफा पिछले तीन सप्ताहों में हुआ है। और इसी दौरान वहां जांच का दायरा भी बढ़ा है। तमिलनाडु में संक्रमण की दर भयावह है, लेकिन वहां भी हाल के दौर में जांच का दायरा बढ़ाया गया है। इसलिए उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण में संक्रमण की बढ़ती दर को कोविड-19 से निपटने में नाकामी मानना वस्तुतः जल्दबाजी होगा।
हालांकि केरल का उदाहरण बताता है कि अगर समय पर दूरदर्शिता का परिचय दिया जाता, तो दूसरे दक्षिणी राज्यों की स्थिति ऐसी नहीं होती। केरल की स्वास्थ्य मंत्री, 63 वर्षीय केके शैलजा, ने वायरस के प्रसार को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उनके काम की अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा सराहना की जा रही है। उनके द्वारा की गई पूर्ववर्ती कार्रवाई, दिशा-निर्देशों का निर्णायक क्रियान्वयन और उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल के चलते राज्य में कोरोना से तीस से भी कम मौतें हुईं।
सूत्रों का कहना है कि अपने मंत्रिमंडल सहयोगी शैलजा और उनकी टीम को खुली छूट देते हुए मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने चीजों की बारीकी से निगरानी की और नियमित रूप से प्रगति की समीक्षा की, इस प्रकार स्वास्थ्य विभाग को ठोस परिणाम देने पर दबाव बनाया गया। लेकिन इसका श्रेय केवल अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि जनता को भी दिया जाना चाहिए। लोगों ने नियमों का पालन किया और शायद ही कोई घर से निकलता था। मुख्यमंत्री रोज मीडिया को संबोधित करते थे।
घर से काम करने वाले लोगों की मांग पूरा करने के लिए उन्होंने इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को प्रेरित किया, हैंड सैनिटाइजर और फेस मास्क का उत्पादन बढ़ाया, मुफ्त भोजन योजना पर निर्भर स्कूली बच्चों को भोजन वितरित किया और मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन स्थापित किया। उनके कामकाज ने लोगों के डर को भगाया और उनमें भरोसा जगाया।
घातक महामारी से लड़ने का यह केरल का पहला अवसर नहीं था। 2018 में केरल निपाह वायरस से भी निपटा था। केरल का स्वास्थ्य-देखभाल तंत्र भारत में बेहतर माना जाता है। और राज्य की जीवन प्रत्याशा भी देश में सबसे ऊंची है। केरल में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक हैं और एक बड़ी आबादी प्रवासी है, जो विदेश आती-जाती रहती है और जिनके भेजे धन से राज्य की अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
लेकिन राज्य शुरू से सतर्क रहा है। इसने राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की घोषणा से एक दिन पहले ही लॉकडाउन की घोषणा कर दी। स्वास्थ्य कर्मचारियों ने विशेष जरूरत वाले लोगों और बुजुर्गों की सहायता की। इसलिए इसे देवताओं का अपना देश कहा जाता है।