जून 1989 में थियानमेन स्क्वायर बीजिंग में लोकतंत्र की मांग कर रहे करीब चार हजार छात्रों के नरसंहार की पृष्ठभूमि में देखें, तो चीन के लिए प्रस्तावित हांगकांग के प्रत्यार्पण विधेयक का जबरदस्त जनप्रतिरोध अकल्पनीय है। 75 लाख की आबादी में से 20 लाख लोग सड़क पर हैं। लोकतंत्र के लिए हांगकांग का संघर्ष नया नहीं है। 2014 में ‘अम्ब्रेला आंदोलन’ के नाम से लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जोशुआ वांग, नाथन ला, एलेक्स चाऊ जैसे सामान्य छात्रों के नेतृत्व में सशक्त आंदोलन चलाया गया था।
इस विधेयक के कानून बन जाने पर हांगकांग के नागरिकों को चीन में लंबित मुकदमों में चीन प्रत्यर्पित किया जा सकता है। यह हांगकांग के लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए बुरी खबर है। यह आंदोलन चीन की अधिनायकवादी सोच को हांगकांग की जनता का जवाब है। अब इसका हमारे लिए क्या निहितार्थ है? चीन यदि लोकतांत्रिक देश रहा होता, तो आज तिब्बत की यह दशा न होती। भारत के साथ फर्जी सीमा विवाद न खड़ा किया गया होता। ‘पंचशील’ समझौते का सम्मान होता।