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बड़ा सवाल: समृद्धि से लोकतंत्र की ओर बढ़ेगा चीन?

आर विक्रम सिंह
Updated Sun, 30 Jun 2019 04:19 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर

जून 1989 में थियानमेन स्क्वायर बीजिंग में लोकतंत्र की मांग कर रहे करीब चार हजार छात्रों के नरसंहार की पृष्ठभूमि में देखें, तो चीन के लिए प्रस्तावित हांगकांग के प्रत्यार्पण विधेयक का जबरदस्त जनप्रतिरोध अकल्पनीय है। 75 लाख की आबादी में से 20 लाख लोग सड़क पर हैं। लोकतंत्र के लिए हांगकांग का संघर्ष नया नहीं है। 2014 में ‘अम्ब्रेला आंदोलन’ के नाम से लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जोशुआ वांग, नाथन ला, एलेक्स चाऊ जैसे सामान्य छात्रों के नेतृत्व में सशक्त आंदोलन चलाया गया था।

इस विधेयक के कानून बन जाने पर हांगकांग के नागरिकों को चीन में लंबित मुकदमों में चीन प्रत्यर्पित किया जा सकता है। यह हांगकांग के लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए बुरी खबर है। यह आंदोलन चीन की अधिनायकवादी सोच को हांगकांग की जनता का जवाब है। अब इसका हमारे लिए क्या निहितार्थ है? चीन यदि लोकतांत्रिक देश रहा होता, तो आज तिब्बत की यह दशा न होती। भारत के साथ फर्जी सीमा विवाद न खड़ा किया गया होता। ‘पंचशील’ समझौते का सम्मान होता।



भारत को घेरने की ‘स्टिंग आफ पर्ल्स’ की रणनीति न होती। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव के जरिये वैश्विक संसाधनों पर नियंत्रण का अभियान न चलता। वैश्विक विरोध के बावजूद चीन सागर पर वर्चस्व कायम न किया जाता। हमने देखा है कि साम्यवादी सोवियत रूस के विखंडन के बाद यह दुनिया एक बेहतर दुनिया हुई है। चीन का लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने को बाध्य होना विश्व के लिए एक शुभ समाचार है।

लोकतंत्र की आहट चीन को उसकी नीतियों के नकलीपन से अवश्य मुक्त कर देगी। तब भारत-चीन संबंध भी यथार्थ के धरातल पर खड़े हो सकेंगे। भारत को पड़ोसियों से उलझाये रखना व उसकी भूमिका को सीमित करना चीनी कूटनीति के लक्ष्य हैं। आज पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, म्यानमार और मालदीव चीन के आर्थिक प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित हो चुके है। श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह का संचालन चीनी एजेंसी कर रही है। चीन ने अर्थ का साम्राज्य कायम किया है। बहुत से देश चीनी कर्ज के बोझ के तले, श्रीलंका के समान अपनी राष्ट्रीय परिसम्पत्तियों को गिरवी रखने को बाध्य हो रहे है।

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जून 1989 में थियानमेन स्क्वायर बीजिंग में लोकतंत्र की मांग कर रहे करीब चार हजार छात्रों के नरसंहार की पृष्ठभूमि में देखें, तो चीन के लिए प्रस्तावित हांगकांग के प्रत्यार्पण विधेयक का जबरदस्त जनप्रतिरोध अकल्पनीय है। 75 लाख की आबादी में से 20 लाख लोग सड़क पर हैं। लोकतंत्र के लिए हांगकांग का संघर्ष नया नहीं है। 2014 में ‘अम्ब्रेला आंदोलन’ के नाम से लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जोशुआ वांग, नाथन ला, एलेक्स चाऊ जैसे सामान्य छात्रों के नेतृत्व में सशक्त आंदोलन चलाया गया था।

इस विधेयक के कानून बन जाने पर हांगकांग के नागरिकों को चीन में लंबित मुकदमों में चीन प्रत्यर्पित किया जा सकता है। यह हांगकांग के लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं के लिए बुरी खबर है। यह आंदोलन चीन की अधिनायकवादी सोच को हांगकांग की जनता का जवाब है। अब इसका हमारे लिए क्या निहितार्थ है? चीन यदि लोकतांत्रिक देश रहा होता, तो आज तिब्बत की यह दशा न होती। भारत के साथ फर्जी सीमा विवाद न खड़ा किया गया होता। ‘पंचशील’ समझौते का सम्मान होता।

भारत को घेरने की ‘स्टिंग आफ पर्ल्स’ की रणनीति न होती। बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव के जरिये वैश्विक संसाधनों पर नियंत्रण का अभियान न चलता। वैश्विक विरोध के बावजूद चीन सागर पर वर्चस्व कायम न किया जाता। हमने देखा है कि साम्यवादी सोवियत रूस के विखंडन के बाद यह दुनिया एक बेहतर दुनिया हुई है। चीन का लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने को बाध्य होना विश्व के लिए एक शुभ समाचार है।

लोकतंत्र की आहट चीन को उसकी नीतियों के नकलीपन से अवश्य मुक्त कर देगी। तब भारत-चीन संबंध भी यथार्थ के धरातल पर खड़े हो सकेंगे। भारत को पड़ोसियों से उलझाये रखना व उसकी भूमिका को सीमित करना चीनी कूटनीति के लक्ष्य हैं। आज पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, म्यानमार और मालदीव चीन के आर्थिक प्रभाव क्षेत्र में सम्मिलित हो चुके है। श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह का संचालन चीनी एजेंसी कर रही है। चीन ने अर्थ का साम्राज्य कायम किया है। बहुत से देश चीनी कर्ज के बोझ के तले, श्रीलंका के समान अपनी राष्ट्रीय परिसम्पत्तियों को गिरवी रखने को बाध्य हो रहे है।

मोदी सरकार के आने से स्थितियां बदलनी प्रारंभ हुई है। बांग्लादेश की हसीना सरकार भारत चीन मामले में तटस्थ है। श्रीलंका की सिरिसेना सरकार पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे की तुलना में भारत की भूमिका को विशेष महत्व दे रही है। मालदीव से भी चीन के पक्षधर राष्ट्रपति चुनाव हार कर जा चुके है। जरूरी हो रहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप के हमारे पड़ोसी और सुदूर पूर्व के देशों को चीनी प्रभाव क्षेत्र से बाहर ले आने के लिए अमेरिका भारत जापान की धुरी के साथ बिमस्टेक व आसियान के देशों का एक सशक्त आर्थिक संगठन अस्तित्व में आए।

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहाराव के जमाने में, अपनाई गई ‘लुक ईस्ट’ की नीति प्रधानमंत्री मोदी के अंतर्गत ‘ऐक्ट ईस्ट’ की सक्रिय सहयोग की नीति में बदल रही हैं। हमारे सामने रास्ता तो यह है कि हम अपनी ‘ऐक्ट ईस्ट’ नीति को एक प्रभावी आर्थिक सांस्कृतिक पहल में बदलने का कार्य करें। चीन की अंतरराष्ट्रीय राजमार्गों की योजना के समान यदि वियतनाम, कम्बोडिया, थाइलैंड तक के सभी देशों को विशाल राजमार्गों द्वारा भारत से जोड़ दिया जाए, तो इन देशों के आर्थिक हित व्यापार व पर्यटन के माध्यम से सीधे भारत से जुड़ जाएंगे। ये सभी रामायण संस्कृति के देश हैं। रामकथा भिन्न भिन्न रूपों में यहां की संस्कृतियों में रची बसी हैं।

जब राष्ट्रों में समृद्धि आती है, तो व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं में वृद्धि के साथ अधिनायकवादी तंत्र का नकार होने लगता है। चीन समृद्धि की ओर बड़ी तीव्र गति से बढ़ रहा देश है। जो यात्रा एक कठोर साम्यवादी शासन तंत्र से प्रारंभ हुई थी वह आज पूंजीवाद के चरम पर पहुंच रही है। हांगकांग का यह जन आंदोलन मिस्र में हुए स्प्रिंग आंदोलन की याद दिलाता है, जब काहिरा के तहरीर चौक पर लाखों आंदोलनकारियों ने आवाज उठाई थी। इस आंदोलन ने होस्नी मुबारक की सरकार को बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

अभी अभी जेल से छूटे छात्र नेता जोशुआ वांग के मुताबिक इस आंदोलन का कोई एक नेता नहीं है। थियानमेन स्क्वायर और 2014 के छात्र आंदोलन से जगी की आजादी और लोकतंत्र की भावना अभी जिंदा है, मरी नहीं है। आंदोलनकारी लिबरेट हांगकांग का प्लेकार्ड लिए जी 20 देशों के दूतावासों में ज्ञापन देते घूम रहे थे कि ओसामा सम्मेलन में यह मुद्दा उठाया जाए। हालांकि चीन कभी नहीं चाहेगा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाया जाए।

लोकतांत्रिक चीन अभी बहुत दूर की परिकल्पना है। लेकिन विचारों की शक्तियों को एक सीमा से अधिक नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होता। जनआंदोलन अपनी विराटता में बहुत कुछ समेट लेते है। हमारे सामने वह घट जाता है जिसकी किसी भविष्यवक्ता ने कल्पना भी नहीं की होती। हांगकांग, व्यवस्था परिवर्तन की राह का एक महत्वपूर्ण मोड़ है जिसके निहितार्थ भी बहुत बड़े है।
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