दिलचस्प है कि इनमें से कई असाधारण अफगान खिलाड़ियों ने पहली बार बल्ला तब पकड़ा था, जब वे पेशावर में शरणार्थी शिविर में रह रहे थे। दक्षिण एशिया के अन्य मुल्कों की तरह पाकिस्तान में भी ज्यादातर लड़कों द्वारा क्रिकेट न केवल अभिजात क्लबों और खास मैदानों में, बल्कि लगभग हरेक मोहल्ले और गलियों में खेला जाता है। क्रिकेट की तरह दूसरा कोई भी खेल इतना लोकप्रिय नहीं है।
अफगानिस्तान पर सोवियत कब्जे के दौरान पेशावर में शरणार्थी शिविर ऐसे युवा अफगान लड़कों से भरे हुए थे, जो आपस में या पाकिस्तानी लड़कों के साथ क्रिकेट खेलते थे। एक समय में पाकिस्तान ने दुनिया की सबसे बड़ी शरणार्थी आबादी की मेजबानी की थी। ईरान के विपरीत पाकिस्तान में तीन लाख अफगान शरणार्थियों पर केवल शिविरों तक सीमित रहने पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया, वे पूरे पाकिस्तान में यात्रा करते थे। काबुल के विश्वविद्यालय में एक बार बैठक में प्रोफेसरों ने मुझे बताया कि कोई भी बता सकता है कि कौन-सा अफगान शरणार्थी पाकिस्तान या ईरान से लौटा है। 'ईरान की तुलना में पाकिस्तान से लौटे शरणार्थियों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं तक बेहतर पहुंच प्राप्त हुई है।'
वास्तव में जब मैं 1990 के दशक में शोध कर रही थी, तो एक बुजुर्ग अफगान से मिली, जिन्होंने मुझसे कहा कि वे तभी अफगानिस्तान लौटेंगे, जब उनकी बेटियों को वहां पढ़ने का मौका मिलेगा। आज 2023 में भी तालिबान के कठोर शासन में अफगानिस्तान में लड़कियों को शिक्षा का हक नहीं है। दुनिया भर के मुल्कों ने तालिबान से आग्रह किया कि वे लड़कियों को शिक्षा की इजाजत दें, क्योंकि यह अफगानिस्तान की संस्कृति एवं परंपरा है तथा इस्लाम लड़कियों को शिक्षा से वंचित नहीं करता है। लेकिन वे किसी की नहीं सुनते।
अब पिछले एक महीन से पाकिस्तान में भी अफगान शरणार्थियों के लिए चीजें बदल गई हैं, जहां नई नीति के अनुसार, अवैध रूप से रहने वाला कोई भी विदेशी अब यहां नहीं रह सकता है। जिन लोगों को जबरन पाकिस्तान छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, उनमें से कई शिकायत कर रहे हैं कि अन्य तमाम समस्याओं के साथ एक समस्या यह भी है कि उनकी बेटियों को अफगानिस्तान में शिक्षा का हक हासिल नहीं है।
पाकिस्तान में अवैध अप्रवासियों में सबसे बड़ी संख्या अफगानों की है, खासकर सिंध के कराची जैसे शहरों में, जहां दूसरे मुल्कों के लोग भी रहते हैं। कराची अफगान शरणार्थियों एवं दूसरे मुल्कों के हजारों लोगों से भरी हुई है। जब ये अवैध अप्रवासी अपने मुल्क लौट रहे थे, तो पाकिस्तान के एक मंत्री ने कहा, 'पाकिस्तान कोई अंतरराष्ट्रीय अनाथालय नहीं है।' शरणार्थियों एवं स्थानीय लोगों के बीच झगड़े हमेशा आर्थिक कारणों से होते रहे हैं। खैबर पख्तुनख्वा के मेरे गांव पीर पियाई में बीती सदी के अस्सी के दशक में अफगान शरणार्थियों का स्वागत किया गया था। उनका मजहब, भाषा, संस्कृति और परंपरा पाकिस्तानी पख्तूनों की तरह ही है। लेकिन जब हजारों शरणार्थी अपने साथ मवेशियों को लेकर आए, तो जल्दी ही पानी को लेकर झगड़ा होने लगा, क्योंकि इलाके में पानी की कमी थी। पेशावर जैसे बड़े शहरों में नौकरियां भी खतरे में थीं, क्योंकि अफगान जीवित रहने के लिए कोई भी नौकरी करने को तैयार थे और रोजगार बाजार में नौकरियां पर्याप्त नहीं थीं।
इसके अलावा विभिन्न देशों एवं एजेंसियों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र द्वारा दी जाने वाली विदेशी सहायता दशकों से बंद हो गई। ऐसे में तीन लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थियों का भरण-पोषण करना पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो गया। ये शरणार्थी विभिन्न चरणों में पाकिस्तान आए। पहले चरण में बीती सदी के अस्सी के दशक में सोवियत कब्जे के दौरान ज्यादातर ग्रामीण इलाकों से शरणार्थी आए। बाद में मैंने अफगान शरणार्थियों के एक नए समूह का इंटरव्यू लिया, जिसमें डॉक्टर, शिक्षक जैसे उच्च शिक्षित लोग थे, जिन्हें पाकिस्तान में आसानी से नौकरी मिल जाती थी। अफगानिस्तान में दशकों तक युद्ध जारी रहने और यहां तक शांति काल में भी वहां से शरणार्थियों का आना बंद नहीं हुआ। कुछ लोग चिकित्सा सहायता के लिए भी आए, जिनमें से कुछ तालिबान के घायल लड़ाके थे।
पाकिस्तान से अवैध अफगानों को निकालने का फैसला एक दिन में नहीं लिया गया। पाकिस्तान वर्षों से काबुल से कहता रहा है कि अफगानों की सम्मान एवं गरिमा के साथ वापसी सुनिश्चित की जाए। पर जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया और तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को संरक्षण देना शुरू किया, जो पाकिस्तान में आतंकी हमले करते थे, तो नए सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने कहा कि बस, अब बहुत हो चुका। टीटीपी के कई लड़ाके शरणार्थी शिविर में रहते थे और आसानी से उनमें शामिल हो गए। पाकिस्तान ने टीटीपी से बातचीत भी की थी, पर उनकी शर्तें पाकिस्तान के संविधान और कानून के खिलाफ थीं।
इस हफ्ते बलूचिस्तान के चमन शहर में भारी प्रदर्शन हुआ, जिसकी सीमा अफगानिस्तान से सटी हुई है। सीमा के दोनों तरफ से मांग हो रही थी कि पहले की तरह बिना पासपोर्ट और वीजा के एक-दूसरे मुल्क में प्रवेश की इजाजत मिले। इस मानसिकता को बदलना होगा और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर बिना दस्तावेजों के यात्रा करने वालों पर प्रतिबंध लगाना होगा। अफगानिस्तान का कहना है कि उसे पाकिस्तानियों के बिना दस्तावेजों के आने से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन पाकिस्तान राजी नहीं है। क्या ये अफगान बिना दस्तावेज के ईरान में प्रवेश कर सकते हैं? सीमा पर ईरानी सुरक्षा बल इतने सख्त हैं कि वे पहले गोली चलाते हैं, फिर सवाल पूछते हैं।