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अंधविश्वास की आड़ में कब तक होते रहेंगे अपराध? हम क्यों बाहर नहीं निकल पा रहे इस गर्त से

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चिंताजनक है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारा समाज अंधविश्वास के गर्त से बाहर नहीं निकल पाए हैं। - फोटो : pixabay
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अंधविश्वास के नाम पर दी जाने वाली नरबलियों और डायन-बिसही के नाम पर किए जाने वाले उत्पीड़न-हत्याओं की खबरें आए दिन मीडिया में छायी रहती हैं। देश के तमाम हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आती रहती हैं। हाल में ही ओडिशा के गंजम जनपद में एक ऐसा ही मामला सामने आया। जहां जादू-टोना करने के शक में कुछ लोगों ने 6 दलित बुजुर्ग व्यक्तियों के दांत तोड़ दिए और उन्हें मानव मलमूत्र खाने को मजबूर किया।

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वहीं थोड़े दिनों पहले ओडिशा में ही एक गरीब महिला को चुड़ैल कहकर मौत के घाट उतार दिया गया था। एक ओर हमारा देश न्यू इंडिया के नारे के साथ तरक्की के नए सोपान तय कर रहा है, तो दूसरी ओर देश में महिला सशक्तिकरण के बावजूद महिलाओं को डायन बताकर मारने व पीटने से लेकर उनकी हत्या करने तक की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। समाज का दोहरा मापदंड है कि एक ओर तो वह नारी को देवी बताकर उनकी पूजा करते नहीं थकता, तो दूसरी ओर डायन बताकर उनके साथ दुर्व्यवहार करने से भी पीछे नहीं हटता। सच्चाई है कि समाज एक तबका आज भी पुराने जमाने के जादू-टोने की गलफत भरी दुनिया में ही जी रहा है। 

आजादी के सात दशक बाद भी हम अंधविश्वास की गर्त से बाहर नहीं निकल पाए
चिंताजनक है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारा समाज अंधविश्वास के गर्त से बाहर नहीं निकल पाए हैं। कहने को तो हमारे देश की साक्षरता 74 प्रतिशत है लेकिन इसके विपरीत आए दिन अंधविश्वास के नाम पर घटित होने वाली प्रताड़ना व मारपीट की घटनाएं हमारे देश के खोखले विकास की पोल खोलकर रख देती है। ये अजीब कशमकश है जिसमें हमारा समाज और देश पीसता जा रहा है।
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सोचने की बात तो यह है कि समय के साथ विज्ञान के विकास के बाद जिस आडंबर और अंधविश्वास का अंत होना चाहिए था, वो अब तक नहीं हो सका है। दुःख इस बात का है कि आधुनिक व शिक्षित पीढ़ी भी इसका अंधानुकरण करती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि 2001 से लेकर 2014 तक देश में 2290 महिलाओं की हत्या डायन बताकर कर दी गई। 2001 से 2014 तक डायन हत्या के मामलों में 464 हत्याओं में झारखंड अव्वल रहा तो ओडिशा 415 हत्याओं के साथ दूसरे स्थान पर है। वहीं 383 हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, 1987 से लेकर 2003 तक 2556 महिलाओं की हत्या डायन के शक पर कर दी गई है। रिपोर्ट बताती है कि हर साल कम से कम 100 से लेकर 240 महिलाएं डायन बताकर मार दी जाती हैं। 
 

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खेद का विषय यह है कि देश में डायन हत्या का चलन अभी भी खत्म नहीं हुआ। - फोटो : pixabay
कानून के मुताबिक डायन हत्या का मामला गैरजमानती, संज्ञेय और समाधेय है। इसकी सजा 3 साल से लेकर आजीवन कारावास या 5 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकती है। किसी को डायन ठहराया जाना अपराध है और इसके लिए कम से कम 3 साल और अधिकतम 7 साल की सजा हो सकती है। वहीं, डायन बताकर किसी पर अत्याचार करने की सजा 5-10 साल तक की है।

किसी को डायन बताकर बदनाम कर दिए जाने के कारण अगर कोई आत्महत्या कर लेता है तो आरोपी का जुर्म साबित होने पर 7 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। किसी को डायन बताकर उसके कपड़े उतरवाने की सजा 5-10 साल की कैद तय की गई है। किसी बदनीयती से डायन करार दिए जाने की सजा 3-7 साल और डायन बताकर गांव से निष्कासित किए जाने की सजा 5-10 साल की तय की गई है। कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां डायन हत्या की रोकथाम के लिए विशेष कानून बनाया गया है। ऐसे राज्यों में राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ और असम के नाम आते हैं।

खेद का विषय यह है कि देश में डायन हत्या का चलन अभी भी खत्म नहीं हुआ। ऐसे में सवाल तो यह भी है कि जिन राज्यों में कानून मौजूद है, वहां भी इन अपराधों में गिरावट नहीं आंकी जा रही हैं। सवाल है कि क्या महज कानून बनाने से अंधविश्वास का अंत हो सकेगा? हमें उन सभी बाबाओं व तांत्रिकों पर शिकंजा कसना होगा, जो आस्था के नाम पर अंधविश्वास की दुकान चलाते हैं। लोगों को मालाएं, अंगूठी, ताबीज, रत्न पहनाकर उनके कष्ट दूर होने का झूठा झांसा देकर उन्हें लूटने का काम करते हैं। बतौर इसके लिए लोगों में जागरूकता लायी जानी चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रमों में अंधविश्वास की पोल खोलने वाले अध्यायों को शामिल किया जाना चाहिए। अंधविश्वास के नाम पर हो रहे कर्मकांडों को लेकर सार्वजनिक रूप से जनहित में जागृति लाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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