खेद का विषय यह है कि देश में डायन हत्या का चलन अभी भी खत्म नहीं हुआ।
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कानून के मुताबिक डायन हत्या का मामला गैरजमानती, संज्ञेय और समाधेय है। इसकी सजा 3 साल से लेकर आजीवन कारावास या 5 लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों हो सकती है। किसी को डायन ठहराया जाना अपराध है और इसके लिए कम से कम 3 साल और अधिकतम 7 साल की सजा हो सकती है। वहीं, डायन बताकर किसी पर अत्याचार करने की सजा 5-10 साल तक की है।
किसी को डायन बताकर बदनाम कर दिए जाने के कारण अगर कोई आत्महत्या कर लेता है तो आरोपी का जुर्म साबित होने पर 7 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। किसी को डायन बताकर उसके कपड़े उतरवाने की सजा 5-10 साल की कैद तय की गई है। किसी बदनीयती से डायन करार दिए जाने की सजा 3-7 साल और डायन बताकर गांव से निष्कासित किए जाने की सजा 5-10 साल की तय की गई है। कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां डायन हत्या की रोकथाम के लिए विशेष कानून बनाया गया है। ऐसे राज्यों में राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़ और असम के नाम आते हैं।
खेद का विषय यह है कि देश में डायन हत्या का चलन अभी भी खत्म नहीं हुआ। ऐसे में सवाल तो यह भी है कि जिन राज्यों में कानून मौजूद है, वहां भी इन अपराधों में गिरावट नहीं आंकी जा रही हैं। सवाल है कि क्या महज कानून बनाने से अंधविश्वास का अंत हो सकेगा? हमें उन सभी बाबाओं व तांत्रिकों पर शिकंजा कसना होगा, जो आस्था के नाम पर अंधविश्वास की दुकान चलाते हैं। लोगों को मालाएं, अंगूठी, ताबीज, रत्न पहनाकर उनके कष्ट दूर होने का झूठा झांसा देकर उन्हें लूटने का काम करते हैं। बतौर इसके लिए लोगों में जागरूकता लायी जानी चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रमों में अंधविश्वास की पोल खोलने वाले अध्यायों को शामिल किया जाना चाहिए। अंधविश्वास के नाम पर हो रहे कर्मकांडों को लेकर सार्वजनिक रूप से जनहित में जागृति लाने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है।
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