चुनौतियां और समाधान-
भारत को इन चुनौतियों को संबोधित करने के लिए एक मजबूत दिवाला कानून की आवश्यकता है। आईबीसी के तहत हाल ही में रिकवरी का ह्रास (गिरावट) एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। CRISIL रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2019 से सितंबर 2023 के बीच रिकवरी रेट 43% से गिरकर 32% हो गयी है। इसके अतिरिक्त, औसत समाधान (settlement) का समय भी 324 से बढ़कर 653 दिन हो गया है, जो आईबीसी के उद्देश्यों के विपरीत है, कि ऐसे मामलों में तीव्रता से समाधान हो।
फरवरी 2024 में स्टेन्डिग कमिटी ऑन फाइनेन्स ने पाया कि दिवाला प्रक्रिया में समाधान निर्धारित समय से बहुत ज्यादा समय तक विलंबित हो रहा है। और वास्तविक रिकवरी भी केवल 25-30% तक हो रही है।
इन देरी के कई कारण हैं-
- मामलों का प्रवेशः राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के समक्ष मामलों का प्रवेश अक्सर बहुत लंबा समय लेता है। अनावश्यक अपीलें भी देरी का कारण बनती हैं।
- उच्च लंबितता NCLT में 20,000 से अधिक लंबित मामले हैं।
- समर्पित पीठ IBC मामलों के लिए एक समर्पित पीठ होने से प्रक्रिया को निर्धारित समय के भीतर पूरा करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष-
आईबीसी में वर्तमान कमियों को दूर करने के लिए कानून में सुधार आवश्यक है, जिसमें कॉस बॉर्डर और सामूहिक दिवालियापन प्रावधान शामिल हैं। इस प्रकार के मामलों में कुल मिलाकर जल्दी फैसले करना ताकि एसेट्स में कम से कम मूल्यह्रास हो और लेनदारों को ऋण की अधिकतम वापसी हो सके।
एडमिशन में तेजी को सुनिश्चत करना, जल्दी और समयबद्ध फैसला होना, अनावश्यक अपीलों को कम करना, अत्यधिक लम्बितता को कम करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाना और एक समर्पित आईबीसी पीठ (bench) स्थापित करना, जैसे (Green Tribunal) होते हैं। ये आईबीसी की प्रभावशीलता को बढ़ा सकता है और इसमें निर्धारित उद्देश्यों को जल्दी प्राप्त कर सकते हैं।
-----------------
परिचय- धनेन्द्र कुमार-विश्व बैंक में भारत के भूतपूर्व कार्यकारी निदेशक, प्रथम चेयरमैन सीसीआई रहे हैं और वर्तमान चेयरमैन कम्पटीशन एडवाइजरी सर्विसेज हैं। रिसर्च में सहायता वरूण सिंह द्वारा)
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।