इस साल का मानसून अब पूरे सबाब पर पहुंच गया है और इसके साथ ही अतिवृष्टि तथा बादल फटने की घटनाओं की शुरुआत के साथ ही भूस्खलन का खतरा हिमालयी क्षेत्रों सहित देश के पहाड़ी इलाकों पर मंडराने लगा है। कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भूस्खलन सबसे अधिक मारक आपदाओं में गिना जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण जल आपदाओं की आवृत्ति में वृद्धि के साथ ही भूस्खलन आपदाओं में भी वृद्धि देखी जा रही है।
हालांकि, भूकम्प जैसी आपदाओं में अभी तक सटीक और पर्याप्त समयावधि के लिए पूर्व चेतावनी तंत्र संभव नहीं हो सका है। लेकिन भूस्खलन के मामले में ऐसा नहीं है। इसलिए सटीक पूर्व चेतावनी से एक विश्वसनीय बचाव तंत्र अवश्य ही विकसित किया जा सकता है। नैनीताल, शिमला और जोशीमठ जैसे कई विख्यात नगर मानवीय हस्तक्षेप और दबाव के कारण पहले ही गंभीर खतरे में हैं इसलिए लगभग सभी पहाड़ी नगरों के लोगों को अत्यधिक सतर्कता की जरूरत है।
अग्रणी दैवी आपदाओं में गिना जाता है भूस्खलन
भूस्खलन का खतरा दैवी आपदाओं से संबंधित विनाशकारी खतरों में अग्रणी गिना जाता है। भूस्खलन भारत के पर्वतीय क्षेत्र के बड़े हिस्से में सामान्य गतिविधियों में व्यवधान से लेकर बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि और विनाश के कारण जीवन और आजीविका के लिए खतरा पैदा करते हैं। हिमालय और भारत के अन्य पहाड़ी क्षेत्र भूस्खलन गतिविधियों से हर साल बड़े पैमाने पर प्रभावित होते हैं।
अतीत में कट्रोपी-2017 (हिमाचल प्रदेश), लपटप प्रदेश), पंपारे-2017 (अरुणाचल प्रदेश), मिरिक-2015 (पश्चिम बंगाल), मालिन-2014 (पुणे), दसलगांव-2007 (महाराष्ट्र), वरुणावत पर्वत-2003 (उत्तराखंड), अंबूरी-2001 (केरल), मालपा भूस्खलन-1998 (उत्तराखंड) आदि घटनाओं के कारण जनधन धन की बहुत अधिक हानि हुई है। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए भूकम्प के बाद भूस्खलन सबसे बड़ी त्रासदी है। भूकम्प तो कभी-कभी ही आते हैं। लेकिन भूस्खलन की मुसीबत हर साल की है।
भारत का 12.6 प्र.श. भूभाग भूस्खलन की जद में
एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 42 हजार वर्ग किमी या 12.6 प्रतिशत भूमि भूस्खलन की जद में है। इसमें से 18 हजार वर्ग किमी दार्जिलिंग और सिक्किम हिमालय सहित उत्तर पूर्व हिमालय में पड़ता है और 14 हजार वर्ग किमी प्रभावित क्षेत्र उत्तर पश्चिम हिमालय (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर) में पड़ता है।
पश्चिमी घाटों और कोंकण पहाड़ियों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र) में 9 हजार वर्ग किमी और 1 हजार वर्ग किमी भूस्खलन का स्थानिक वितरण शेल-सैंडस्टोन-मेटासेडिमेंट्स द्वारा नियंत्रित होता है,जो विच्छेदित पहाड़ियों और घाटियों को उत्पन्न करता है। उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्य में हर साल भूस्खलन से भारी धन-जन की हानि होती है। इस पहाड़ी राज्य में औसतन सौ लोग हर साल इस आपदा में जानें गंवा बैठते हैं। कुछ लोग मकान तो कुछ खेती बाड़ी से हाथ धो बैठते हैं। भूस्खलन से बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय क्षति होती है जैसे कि मिट्टी के कटाव के कारण तलछट के निर्वहन में वृद्धि और हर साल मानव जीवन का नुकसान।
सर्वाधिक संवेदनशील हैं हिमालयी राज्य
हिमालय में भूस्खलन विभिन्न भूगर्भीय कारणों से हो सकता है, जिनमें टेक्टोनिक गतिविधि एक कारण है। विदित है कि हिमालय उत्तर की ओर यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स से टकरा रहा है। इस विवर्तनिक गतिविधि के परिणामस्वरूप क्षेत्र में कई भं्रश, मोड़ और जोर बनते हैं। इन भूगर्भीय संरचनाओं के साथ जमा भूगर्भीय ऊर्जा के अचानक बाहर निकलने से भूकंप और भूस्खलन हो सकता है। ऐसी हलचलें मुख्य केन्द्रीय भ्रंश (एमसीटी) के आसपास ज्यादा अनुभव की गई हैं। हिमालय की विशेषता बेहद खड़ी ढलानों की है, जो भूस्खलन के लिए काफी संवेदनशील होती हैं।
हिमालय के गर्भ में नाजुक चट्टानें हैं। जैसे शेल और मिट्टी, जो आसानी से प्रभावित और नष्ट हो जाती हैं। भारी वर्षा के साथ मिलकर, कमजोर या लूज मिट्टी वाली ढलानों पर जमा मलबा तेज वर्षा या वर्षा जल के दरारों में घुसने से नीचे खिसक या लुड़क जाता है। ग्रेनाइट जैसी मजबूत चट्टानों की तुलना में कमजोर चट्टानें, जैसे कि शेल और सिल्टस्टोन, भूस्खलन के लिए अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। बेडिंग प्लेन और ज्वाइंट सेट जैसे भूगर्भीय असंतुलन भी भूस्खलन की संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं।
मानवीय कारण भी हैं भूस्खलन के लिए दोषी
चूंकि हिमालय समुद्र से चले मानसून को रोकता है, इसलिए मानसून अपने अंदर की जलराशि को हिमालय पर ही उंडेल देता है। इसके अलावा बादल फटने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं जो कि भूस्खलन और त्वरित बाढ़ आपदा का मुख्य कारण होती हैं। स्थानीय स्थलाकृति, भूमि उपयोग प्रथाओं और मानव हस्तक्षेप, जैसे कि वनों की कटाई और निर्माण गतिविधियां भी इस क्षेत्र में भूस्खलन की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार हिमालय पर 30° से 45° के ढाल वाली पहाड़ियों पर 750 से लेकर 1000 मिमी के बीच वर्षा होने पर भूस्खलन अधिक होते हैं।
उत्तराखण्ड सर्वाधिक संवेदनशील राज्य
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा तैयार भारत का भूस्खलन मानचित्र या एटलस-2023, हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड की डरावनी तस्बीर दिखा रहा है। इस एटलस में हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट तक देश के 17 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों को भूस्खलन-संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल किया है। इनमें उत्तराखंड के दो जिले रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल को सबसे ऊपर रखा गया है।
यह एटलस उपग्रह से लिए गए चित्रों पर आधारित है। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि देश में रुद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, राजौरी, त्रिशूर, पुलवामा, पलक्कड़, मालाप्पुरम, दक्षिण सिक्किम, पूर्वी सिक्किम और को झिकोड में भूस्खलन का खतरा सब से ज्यादा है। राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर द्वारा यह रिपोर्ट या एटलस 1988 से 2022 के बीच रिकॉर्ड किए गए 80,933 भूस्खलनों के आधार तैयार की गया है। रिपोर्ट के अनुसार 1988 से 2022 के बीच भूस्खलन की सबसे ज्यादा 12,385 घटनाएं मिजोरम में दर्ज की गई हैं।
इसके बाद उत्तराखंड में 11,219, त्रिपुरा में 8,070, अरुणाचल प्रदेश में 7,689, जम्मू और कश्मीर में 7,280, केरल में 6,039 और मणिपुर में 5,494,जबकि महाराष्ट्र में भूस्खलन की 5,112 घटनाएं दर्ज की गई थीं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार सन् 1990 से लेकर 2022 तक भूस्खलन की घटनाओं में 19,316 लोगों की जानें गई हैं।
हिमाचल के 12 में से 11 जिले संवेदनशील
एटलस के भूस्खलन जोखिम विश्लेषण में 147 जिलों में हिमाचल के 11 जिले शामिल हैं जिनमें भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा मंडी जिले को बताया गया है। खतरे के हिसाब से इस जिले की रैंक 16वीं है। इसी तरह हिमालयी राज्यों में से जम्मू और कश्मीर के 14 जिले जोखिम की सूची में शामिल हैं। इनमें राजौरी देश का चैथा और पुंछ छठा सबसे अधिक भूस्खलन संवेदनशील जिला है। संवेदनशील जिलों की सूची में केरल के कुल 10 जिले हैं जिनमें 3 जिलों को सर्वाधिक जोखिम में रखा गया है।
सावधानी सबसे बड़ा बचाव
सावधानी और रोकथाम में ही सबसे सहज बचाव होता है। इसलिए भूस्खलन के मामले में भी आम नागरिक और खास कर पहाड़ी क्षेत्र के लोग सजग रहें तो काफी हद तक जानमाल को बचाया जा सकता है। आपदा प्रबंधकों के अनुसार भूस्खलन की स्थिति में अशांत और व्यग्र रहने के बजाय शांत तथा सतर्क एवं जागरुक रहना जरूरी होता है। मानसून सीजन में मौसम केंद्र से जारी होने वाली भारी बारिश तथा दीर्घावधिक बारिश की चेतावनी को ध्यान से सना जाना चाहिए।
यदि आपका घर मलबे से ढके इलाके से नीचे की ओर स्थित हो तो सुरक्षित स्थान पर चले जाएं। चट्टान गिरने की आवाजों, मलबा खिसकने, पेड़ों के टूटने अथवा जमीन में पड़ने वाली दरारों अथवा किसी भी हलचल की आवाज को ध्यान से सुनें। रात के लिए एक बैटरी चालित टॉर्च हमेशा साथ रखें। अगर भूस्खलन हो रहा हो तो तत्काल रेस्क्यू टीम को बुलाएं तथा उनकी मदद करें।
पेयजल बर्तनों, प्लास्टिक सहायता थैला तथा अनिवार्य दवाइयों के साथ तैयार रहें और क्षतिग्रस्त मकानों में घुसने से बचें। यदि आप नदी या नाले के पास रहते हों तो बाढ़ के पानी का ख्याल रखें, उन लोगों विशेष रूप से बुजुर्ग, बच्चे तथा महिलाएं जिन्हें खास तौर पर सहायता की जरूरत है, की मदद करें। क्षतिग्रस्त मकानों, सड़कों आदि के पुनर्निर्माण के लिए स्थानीय प्राधिकरणों से सलाह मांगें।
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