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दुनिया ना जीत पाओ तो..!

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क्या सचमुच कैफ़े कॉफी डे के मालिक और प्रणेता वी.जी सिध्दार्थ इतने लोकप्रिय थे? - फोटो : ट्विटर
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एक चुप सी लगी है। सन्नाटा सा खिंचा है। लोग सहम भी गए और सोचने भी लगे। सोशल मीडिया पर संदेशों का सैलाब। ऐसा क्या हुआ? अरे वो आदमी तो ऐसा नहीं लगता था! किसी से बात ही हो जाती! क्या इस देश में उद्यमी होना ही गुनाह है? देखो पैसे और चमक-दमक के परे कैसी गहन उदासी वाली काली दुनिया है! दुनिया में रसूख और पैसा ही सबकुछ नहीं है - ऐसे कई संदेश व्हॉट्स एप, ट्विटर और फेसबुक की परिक्रमा करने लगे।

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हर कोई इस हादसे को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द चाह रहा था। पर ये बात इतनी बढ़ी क्यों? क्या सचमुच कैफ़े कॉफी डे के मालिक और प्रणेता वी.जी सिध्दार्थ इतने लोकप्रिय थे? क्या वो इतना बड़ा नाम थे कि देश भर से यूं प्रतिक्रिया आती? नहीं। उद्योग जगत् और कुछ राजनीतिक गलियारों में ज़रूर वो अपनी पहचान रखते थे। वित्तीय सेवाओं से शुरू कर एक कॉफी चेन शुरू कर देने के कारण उद्योग जगत् में उनकी पहचान बनना स्वाभाविक था। इस पहचान को और बड़ा किया उनके रिश्ते ने। वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे एस. एम. कृष्णा के दामाद थे।
 

वी जी सिद्धार्थ सपनों का पीछा करने वाली शख्सियत थे। - फोटो : फाइल फोटो

राजनीति और उद्योग के मिलन से पहचान और रसूख दोनों ही बढ़ जाते हैं। हालांकि राजनीति और उद्योग के मिलन से उपजने वाली आसुरी शक्तियों के जबर्दस्त दोहन करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति वीजी सिद्धार्थ की पहचान नहीं थी। उद्योग जगत् उन्हें सपनों का पीछा करने वाले उद्यमी के रूप में ज़्यादा जानता था।

एक शख़्स जो अपने पिता की व्यापारिक विरासत संभालने की बजाय 5 लाख रुपए लेकर बेंगलुरू से मुम्बई चला गया। प्रशिक्षु के रूप में नौकरी की। वापस लौटकर वित्तीय सेवाओं का काम शुरू किया। और फिर अपने ऐसे सपने को पूरा करने में जुट गया जो उसकी व्यावसायिक यात्रा का परिचय कलश बना। और यही वो परिचय है जिसके कारण समाज से भी इतनी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।  जी, हां, वी.जी सिद्धार्थ को आम आदमी नहीं जानता था। उनके गायब होने, चिट्ठी सामने आने और फिर उनकी ख़ुद्कुशी की ख़बर आने तक तो बहुतों ने उनका नाम तक नहीं सुना होगा। पर, हां लोग उनके नाम से नहीं, काम से परिचित थे।

लाल पृष्ठभूमि में उद्धरण चिन्हों के साथ बना वो नाम बहुत लोकप्रिय है, जाना-पहचाना है– कैफ़े कॉफी डे – सीसीडी। एक ऐसा नाम जिसने महानगरों से शुरू कर छोटे शहरों और कस्बों में तक अपनी पहचान बना ली। ब्रांडेड कपड़े पहनने वाली और चमक-दमक के पीछे भागती नई पीढ़ी को अड्डा जमाने के लिए एक ब्रांड दिया।

भारत का स्टारबक्स। जैसे हमें मोहल्ले के किराने की बजाय मॉल पसंद आने लगे, जैसे अपने दर्जी से 80 रुपए मीटर के कपड़े को 100 रुपए सिलाई देकर बनवाने की बजाय हमें बड़े शो रूम में टंगा पंद्रह सौ रुपए का ब्रांडेड शर्ट पसंद आने लगा, आंख पर चढ़े चश्मे से लेकर जुराबों और जूतों तक सब ब्रांडेड ही चाहिए था वैसे ही हमें इंडियन कॉफी हाउस में बैठकर या एमजी रोड के काका की एस्प्रेसो पीने की बजाय कैफे कॉफी डे की ढाई सौ रुपए की कॉफी पसंद आने लगी। 

ये धनाढ्य और नव-धनाढ्य वर्ग के लिए एक नई विभाजक रेखा, नया पाला बन गया। पाले के उस तरफ वो जो हमेशा इस तरफ आने के ख़्वाब देखते रहते हैं। पाले के इधर वो जो अपने इस तरफ होने पर गर्व भी कर सकते हैं और घमंड भी। कुछ वो भी जो कभी-कभी पाला बदल कर उधर से इधर चले आते हैं, खुद को भरोसा देने के लिए कि इतना खर्च तो अपन भी कर सकते हैं! तो ये एक सपनों की दुनिया थी। जो गढ़ी गई। पैसा कॉफी का नहीं था। पैसा माहौल का है। एम्बियंस।

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इस खुद्कुशी ने कॉफी के झाग पर बने उस दिल को झकझोर दिया जिसमें सपने पल रहे थे। - फोटो : फाइल फोटो

सुकून के वो लम्हे जिन्हें तलाशते हुए आप पुराने बिना एसी वाले कॉफी हाउसों की गजबजाहट से निकल कर यहां चले आए हैं। यहां जहां शानदार सोफे और कुर्सियों पर बैठकर आप गपियाते हुए कॉफी पी सकते हैं। प्रेमिका के साथ घंटों बिता सकते हैं। सपने देख सकते हैं। बिजनेस प्लान बना सकते हैं। नए स्टार्टअप पर विचार कर सकते हैं। सुकूनतलाशी और ब्रांड के सम्मिलन का नया अड्डा। सुंदर से कॉफी मग में झाग पर बना दिल। दिल में पलते सपने। कॉफी के धुंए के साथ परवान चढ़ते अरमान। चुस्कियों के साथ हलक में उतरती कुछ कर दिखाने की ऊष्मा। संबंधों की बर्फ पिघलाती कोल्ड कॉफी। ये ही सब तो होता रहा है वहां..!

तो फिर वी.जी. सिध्दार्थ की मौत ने क्या बदला? इस खुद्कुशी ने कॉफी के झाग पर बने उस दिल को झकझोर दिया जिसमें सपने पल रहे थे। नव-उद्यमियों के सपने। फर्श से अर्श तक झटपट पहुंच जाने के सपने। अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने के सपने।

दरअसल, सिध्दार्थ की मौत में लोगों को इन सपनों की टूटन सुनाई दी है।

सिध्दार्थ ने एक सपना देखा और उसे परवान चढ़ाया, पर मंजिल तक पहुंचने से पहले ही वो टूट गए। जिन्होंने उनके या ऐसे ही किसी अन्य कॉफी हाउस में बैठ कर सपने देखे थे वो सहम गए। ये आत्महत्या दरअसल उस असुरक्षा और अवसाद को आवाज़ देती है जिसे दिलों में लिए आम आदमी घूम रहा है। उससे लड़ते हुए। उसे पीछे धकेलते हुए। उस पर भी कर्ज़ा है। उसे भी बहुत चिंता है। पर वो लड़ रहा है। वो जी रहा है। 

तो क्या इस देश में उद्यमी होना गुनाह है? क्या सपने देखना अपराध है? वो माल्या नीरव और मेहुल तो पैसे लूटकर भाग गए और ये पैसे लौटाने में लुट गया! ऐसा क्यों? क्या हमें हमेशा कॉफी हाउस की बीस रुपए की कॉफी में ही खुश रहना चाहिए? क्या कभी सपनीले संसार में नहीं जाना चाहिए? ऐसे बीसियों सवाल घुमड़ रहे हैं इस आत्महत्या को लेकर। नहीं। हमें सपने देखने कभी भी बंद नहीं करना चाहिए।

पाश ने तो कहा ही है कि सबसे बुरा है अपने सपनों का मर जाना। पर ये भी ध्यान रखना पड़ेगा की – ‘हम न समझे थे बात इतनी सी, ख्वाब शीशे के दुनिया पत्थर की।‘ और अपने ख्वाबों को मंज़िल तक पहुंचाने के लिए पत्थर की दुनिया से टकराने की मुकम्मल तैयारी भी चाहिए। दिल में पलने वाले सपने को मजबूती से थामना होगा।

यकीनन कॉफी के झाग पर बना सपना तो है ही क्षणभंगुर। और ये भी की सुकून तो बीस रुपए की कॉफी में भी मिल सकता है, दम तो सपने में होना चाहिए और उसे मुकाम तक पहुंचाने और चुनौतियों को झेलने की कूवत भी चाहिए। सपना पूरा ना भी हो तो भी उसके लिए किए श्रम का सुकून और उसे पूरा ना कर पाने की नाराज़ी के साथ जीना भी आना ही चाहिए।

जैसा कि निदा फाजली साहब कह भी गए हैं – 

दुनिया ना जीत पाओ तो, हारो ना खुद को तुम 
थोड़ी बहुत तो जेहन में नाराजगी रहे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।            

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