महात्मा गांधी-सावरकर के बीच तीसरी मुलाकात और वैचारिक असहमति
- फोटो : Facebook/German Consulate General Bengaluru
गांधी जी यह ठीक से जानते थे कि जिस हिंसक राजनीति और चुनिंदा राजनीतिक हत्याओं में दामोदर सावरकर और उनके अनुयायियों का भरोसा है, उससे उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। इस हिंसक राजनीति के प्रतिरोध स्वरूप ही गांधी जी ने लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज में 13 नवम्बर से 23 नवम्बर के बीच 1909 में 'हिन्द स्वराज' की रचना की। इस दौरान 21 दिसंबर 1909 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में अंग्रेज मजिस्ट्रेट एम टी जैक्सन की हत्या, एक सोलह साल के नौजवान अनंत कन्हारे ने किया। इस हत्या में प्रयुक्त ब्राउनिंग रिवाल्वर लंदन से विनायक सावरकर ने भेजी थी।
अनन्त कन्हारे ने अदालत में स्वीकार किया कि उसने सावरकर के बड़े भाई की सजा का बदला लेने के लिए जैक्सन की हत्या की है। सावरकर के बड़े भाई बारबरा राव पर जैक्सन ने देशद्रोह का अभियोग लगाया था। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा सुनायी गई थी। इस अभियोग में ही दामोदर सावरकर को लंदन से पकड़ कर भारत लाया जा रहा था। पेरिस में अपनी गुप्त योजना के मुताबिक सावरकर ने समुद्र में कूद कर भागने का भी प्रयत्न किया। पर उनकी योजना इसलिए असफल हुई कि उनके बुलाये मित्र समय पर पोर्ट नहीं पहुंच सके।
सावरकर को फिर गिरफ्तार किया गया। भारत में उन्हें कालापानी की सजा के लिए कुख्यात पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल में जून 1911 से सन 1921 के बीच दस साल तक रहना पड़ा। सावरकर को पचास साल की सजा सुनायी गई थी। इस जेल में सावरकर ने एक साल की सजा पूरा होने के बाद सन 1913 में एक याचिका दायर किया जिसमें कहा गया कि-
मेरे संवैधानिक रास्ते पर आने पर भारत और भारत के बाहर सारे भटके हुए नवयुवक सही रास्ते पर आ जाएंगे, जो मुझे मार्ग दर्शक समझकर मेरी ओर देखते हैं। मुझे जेल में रखकर कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता, जो मुझे मुक्त कर के प्राप्त किया जा सकता है। जो शक्तिशाली होता है, वहींदयावान होने का सामर्थ्य रखता है।
इसलिए एक भटका हुआ बेटा माई-बाप सरकार के अभिभावकीय द्वार के अलावा और कहां लौट सकता है।" यहां यह याद दिलाना जरूरी है जब सावरकर की ओर से दया याचिका दायर की गई उस वक्त उनसे उम्र में चौदह साल बड़े महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में भारतीय और एशियाई समुदायों पर बरती जा रही तमाम तरह की जुल्म-ज्यादतियों के विरुद्ध निर्णयाक लड़ाई लड़ रहे थे।
दक्षिण अफ्रीका में हाल ही में प्राप्त सत्याग्रह अस्त्र के बूते। सन 1915 में भारत लौटने के बाद देश की आजादी में भी वे इसी आजमाए अस्त्र का इस्तेमाल करने वाले थे। सावरकर और उनके अनुयायियों को ऐसे सत्याग्रही अस्त्रों का प्रयोग कतई रास आने वाला नहीं था। ऐसा भी नहीं है कि गांधी जी यह काम लुक- छिपकर ,गोपनीय तरीके से करने वाले थे।
महात्मा गांधी-सावरकर के बीच तीसरी मुलाकात और वैचारिक असहमति
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किसी काम को अंजाम देने का यह गांधी का तरीका नहीं था, न हो सकता हैं। 13 मार्च 1915 को कलकत्ता में उग्रवादी छात्रों की एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए गांधी जी ऐलान करते है कि-
राजनीतिक हत्याएं " भारत में पूरी तरह विजातीय है। जो लोग ऐसा कर रहें हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि मैं उनके खिलाफ खड़ा होऊँगा। अगर राजनीतिक हत्या के पैरोकारों के सामने देश के लिए कोई योजना है, तो उसे जनता के सामने रखना चाहिए। राजद्रोह के पक्ष में खुलकर बोलना चाहिए और उसके नतीजों के लिए तैयार रहना चाहिए।"
10 मार्च 1922 को गांधी जी गिरफ्तारी बतौर पत्रकार 'यंग इंडिया' में लिखें गए उनके तीन लेखों की वजह से होती है। जज ब्रुम्फील्ड ने गांधी जी को छह साल की सजा मुकर्रर किया। वहीं सज़ा , जो उनके पहले बाल गंगाधर तिलक को 'केसरी' अखबार में लिखें तीन लेखों के लिए दिया गया था। उस वक्त गांधी जी को यरवदा जेल में रखा जाता है।
संयोग देखिये कि सेलुलर जेल से रिहा होने के बाद सावरकर को पहले कुछ समय के लिए रत्नागिरी जेल में रखा गया। फिर सन 1923 में उन्हें यरवदा जेल भेजा दिया गया। उसी जेल में जहां गांधी देश द्रोह की सज़ा भुगत रहे थे। सावरकर अपने संस्मरण में लिखते है कि-
"मैंने गांधी के तमाम अनुयायियों की तीख़ी आलोचना की ताकि उनके आँखों पर पड़ा पर्दा हट जायें। यह कि चरखा कातकर, स्वराज हासिल करना, हिंदुओं के कर्तब्य के रूप में मुसलमानों के ख़िलाफ़त आंदोलन का समर्थन करना और अहिंसा की हास्यास्पद परिभाषाएं, इन सबकी अकाट्य तर्कों से (मैनें) धज्जियां उड़ा दी।
सावरकर को 6 जनवरी 1924 को यरवदा जेल से रिहा किया गया। अपनी इस रिहाई की तुलना सावरकर ने भगवान कृष्ण से की है, जो इस बात पर राजी हो गए थे कि वे पूरे युद्ध के दौरान अस्त्र नहीं उठाएंगे और उनके इस समझौते को अपमानजनक नहीं माना गया है। सावरकर की रिहाई की तुलना उनके अनुयायियों ने राम के वनवास से की है। यह बताते हुए कि राम ने रावण का वध अपने वनवास के के दौरान किया।
इसके जवाब में सावरकर अपने संस्मरण में लिखते है कि "
मुझे भी देश निकाला दिया गया। अनेक पीड़ाओं को झेला। लेकिन रावण अभी भी जिंदा है। एक दिन वह काम भी हो जाएगा। तब आप इस फर्क को समझ जाएंगे और वह घटना आपको बहुत पीड़ा पहुँचायेगी।" गांधी की हत्या के दो वर्ष बाद सावरकर का यह संस्मरण प्रकाशित हुआ।
गांधी जी फिर भी 1927 में रत्नागिरी में दामोदर राव सावरकर से दोस्तना मुलाकात करने गये। इस मुलाकात में गांधी जी कहते हैं कि-
मैं जानता हूं कि कई मामलों में आपके और मेरे विचारों में काफी अंतर हैं। आपके और हमारे रास्ते अलग-अलग हैं, फिर भी देश के लिए मैं एक प्रयोग कर रहा हूँ।
जवाब में सावरकर कहते हैं कि-
देश के साथ यह प्रयोग करने की छूट आपको बहुत दिनों तक नहीं दी जा सकती।
मुलाकात के बाद जब गांधी वहां से निकल रहें थे, तो उन्होंने सावरकर से कहा-
आप जो भी प्रयोग कर रहें है, उसकी कीमत राष्ट्र को चुकानी पड़ेगी।"
महात्मा गांधी और विनायक दामोदर राव सावरकर की यह अंतिम मुलाकात थी। हरिजनों के मंदिरों में प्रवेश के अलावा इन दोनों महापुरुषों के बीच सहमति का कोई ठोस आधार नहीं है। फिर भी दोनों देश की आजादी के 75वें साल में हमारे राष्ट्रीय विमर्श में अपने-अपने ढंग से हमारे राष्ट्रीय भी जिंदा हैं। तो यही कहा जा सकता है -
चर्चे हमेशा कामयाबी के हों, हमेशा ये जरूरी तो नहीं,
बरवादियां भी वक़्त को मशहूर किया करती हैं।
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