गलती समझकर, गलती सुधारकर अब वादी में अगर वो खुले दिल से अपने कश्मीरी पंडित भाई बहनों की वापसी का स्वागत कर पाएं, तब असली शांति बहाल होगी।
मेरी किताब 'रिफ्यूजी कैंप 'के नायक अभिमन्यु की ही तरह मेरा भी ये विश्वास है कि किसी भी समाज में शांति उस समाज के लोग ही ला सकते हैं, न सरकार, न पुलिस इसमें कोई बड़ी भूमिका निभा सकती है।
कोई संदेह नहीं कि इन दिनों हिंदुओं, सिखों और गैर कश्मीरी नागरिकों के खून से सना कश्मीर, शांति की डगर सांकेतिक आयोजनों और उत्सवों के सहारे नहीं, आपसी मेल मिलाप, समझ और विमर्श के सहारे ही चल सकता है। जब तक इस बात को नहीं समझ लिया जाता तब तक गाते रहिये, 'कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं ,बातों का क्या।'
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