कोटा कोचिंग छात्रों का सुसाइड
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फिर आखिर समाधान क्या है? लाखों रुपये खर्च करके बच्चा कोटा कोचिंग में दाखिला लेता है और साल भर कोचिंग करने के बाद यदि उसका दाखिला नहीं होता है तो वह क्या करे? दूसरा कोचिंग के अंदर भी एक ऐसा कंपटीशन क्रिऐट हो जाता है कि बच्चा कम नंबर लाने पर अवसाद में चला जाता है। अधिकांश आत्महत्याओं के पीछे यह एक बड़ा कारण बताया जा रहा है।
बहुत सारे बच्चे अपनी रुचि या इच्छा के विपरीत परिवार के दबाव में कोटा भेज दिए जाते हैं, जो पढ़ाई के दबाव को झेल नहीं पाते। कुछ बच्चों में फेल होकर परिवार के पास लौटने का साहस नहीं होता और वो आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लेते हैं।
कैसे रुकेंगे आत्महत्या के मामले?
बच्चे अपनी जीवन लीला समाप्त न करें, इसके लिए सरकार के साथ कोचिंग संस्थानों को भी रास्ता निकालना पड़ेगा। अभिभावकों को इस दिशा में सकारात्मक रूप से सोचना होगा। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना बिल्कुल उचित है कि कोई आईआईटी कर लेगा तो खुदा नहीं बन जाएगा।
आज देश में आईआईटी और मेडिकल के अलावा बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जहां बच्चे अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं। अच्छे पैसे बना रहे हैं। बेहतर तो यही होगा कि स्कूल के स्तर पर बच्चों की रुचि का पता लगाया जाए और बच्चा अपनी फील्ड चुन सकें। इस दिशा में सरकार की बनाई नई शिक्षा नीति में कई बदलाव किए गए हैं, जिनका दूरगामी असर देखने को मिलेगा।
कोटा कोचिंग में यह भी देखने को मिलता है कि अभिभावक बच्चों को दसवीं कक्षा के बाद कोचिंग में डाल देते हैं। कोचिंग सेंटर डमी स्कूलों से बारहवीं की कक्षा करवाते हैं। सरकार कम से कम ऐसे डमी स्कूलों की व्यवस्था को तो तत्काल रुकवा सकती है।
समाज के स्तर पर भी इस दिशा में बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है। जरूरत तो थ्री इडियट्स जैसी फिल्में लगातार बनाने की है, ताकि अभिभावकों को समय-समय पर ध्यान दिलाया जा सके कि करियर से कहीं ज्यादा उनके बच्चे का जीवन अनमोल है।
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