राजनीति के खेल में जनता हमेशा ठगी जाती है।
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नासमझी में ही समझदारी
सवाल वाजिब हो सकता है कि क्या चुनाव के समय ही जनता हांकी जाती है? क्या खेल में जोतने से पहले जनता से उसकी मर्जी पूछी गई थी? क्या जनता की जीत-हार कहीं है? क्या दौड़ में किए गए प्रदर्शन से किस्मत बदलने की संभावनाएं हैं? और भी बहुतेरे होंगे, पर जवाब एक ही है - ना! हांकना, दौड़ना पृथ्वी पर जीवन की पहली सांस संग आया था। अंतिम तक जारी रहता है। यह भी जान लो कि पृथ्वी अक्षर जानती, समझदारी सीख लेती तो दूसरों के अस्तित्व के लिए स्वयं का दौड़ना रोक देती। यानी कि नासमझी में ही समझदारी है।
और क्यों ना दौड़ें? पैर नहीं हाेंगे, हाथों के बल दौड़ना होगा। हाथ भी नहीं रहेंगे तो सिर के बल। मजमून यह है कि दौड़ने वाले वे हैं जिन्हें चुनने का मौका मिला तो जन्म से ही परिस्थतियों में फर्क करने की काबिलियत नहीं सीखने और निरंतर दौड़ते आने के कारण एक बार फिर दौड़ लिए। और, दौड़ाने वाले वे हैं, जो या तो मुंह में घोड़ों की रस्सी लेकर जन्मे थे, या जिन्होंने हर पल बस दौड़ाना सीखा।
दरअसल, इसे आप "मेट्रिक्स' कहें, नियति कहें, विधि का विधान कहें, आपकी मर्जी। नहीं तो, बता दो कि हाल के कुछ वर्षों में आपने किसी उद्यमी, राजनेता के वारिसों को दौड़ाना छोड़के दौड़ते देखा है? गलतफहमी भी मत पालिए कि चने छाेड़कर रेस्टोरेंट में सप्ताह में दो बार काजू पनीर खा लेंगे तो घोड़े नहीं रहेंगे। गधे और कहलाएंगे, जगहंसाई भी करवाएंगे।
सवाल संभव है कि क्या घोड़ा बनाकर दौड़ाना लोकतंत्र की हत्या है? यह तो धंधा है, कहां का लोक हो और कहां का तंत्र। तो, उस आभासी व्यक्तित्व को कैसे अपनाएंगे और कैसे मारेंगे? वैसे भी जो चारों तरफ घोटाले, भ्रष्टाचार कराके, तुम्हारे लिए योजनाएं बनाके और फिर उन्हें पचाकर डकार भी ना ले रहे हों, वे चिरकुटिया आरोपों और हत्या से कैसे घबराएंगे? हर ओर बोलियाें का शोर है। तुम जानो, क्या तुम बचपन से अपनी बोली नहीं लगाते आए हो? पास हो गए तो ये, जन्मदिन पे ये, नौकरी इतने में, पत्नी व बच्चे?
अब बस! ज्यादा सवाल करके बेलगाम मत होवो। यह मौजूदा दुनिया में स्वयं के प्रति किया जाने वाला सबसे बड़ा अपराध है। यहां कोई दाल काली नहीं, सब उजाली है। खुश होओ कि बदीउज्जमा के "चूहे' नहीं हो, ना ही जॉर्ज आरवेल के "बिग ब्रदर प्रशंसक'। जश्न मनाओ कि घोड़ों की रेस में दौड़ने की किस्मत मिली। कोल्हू के बैल नहीं हो और ना ही ईंटे ढो रहे गधे। गुर्राओ नहीं, घास खाओ और दुम नहीं है तो भी हिलाओ। सारे पाप कट जाएंगे।
भीतर क्रांति रहने दो, पर बाहर देखो कितनी शांति है। नेताओं को देखकर ये भ्रांति मत पाल लेना कि वे भी हम में से ही तो एक हैं क्योंकि घोड़े को खुद को उनमें से एक साबित करने से रोकना ही उनकी सच्ची कारीगरी है। यह सामने लगे आइनों में अपना अक्स देखना होगा, जिसे भूल माना जाएगा। और वे जोर से लगाम खींचकर अपने बारे में बता देंगे, पर तुम्हारा मुंह पहले से अधिक कसैला हो जाएगा।
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