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दिलीप कुमार: यूसुफ से दिलीप बनने का अनसुना किस्सा..!

सार

मुझे तो होश नहीं आप ही मशविरा दीजिए,
कहां से छेड़ूं फसाना कहां तमाम करूं-

"सब्सेटेंस फॉर द शेडो" अंग्रेजी का एक बहुत पुराना मुहावरा है जो है वो नहीं दिखना। दिलीप कुमार का पूरा अस्तित्व ही इसी शैडो में था यही वजह है कि उनकी ऑटो बायोग्राफी, जिसे उनसे बातचीत के बात उदयतारा नायर ने लिखा का टाइटल, दिलीप कुमार- द सब्सटेंस एंड द शैडो रखा गया।

निश्चित तौर पर इसमें उनके असल और सतही दोनों पहलुओं को रखने की बात दिखती है। दुनिया उन्हें हर दिल अजीज अदाकार के रूप में जानती है तो वो भीतर से बहुत से समझौते करने वाले इंसान भी रहे।

इसमें सबसे बड़ा समझौता तो अपनी पहचान को बदलने का ही था। ये किस्सा सभी जानते हैं कि देविका रानी ने उनका ये नामकरण किया था लेकिन इसकी हकीकत पर उनकी बायोग्राफी भी पूरी तरह से प्रकाश नहीं डाल पाती।

नाम बदलने की मजबूरी को समझने के लिए उनके देविका रानी से जुड़ने और उस समय की परिस्थितियों को भी समझने की जरूरत है।

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दिलीप कुमार एक संपन्न परिवार से थे और फिल्मों से उनका नाता नया नहीं था। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मुझे तो होश नहीं आप ही मशविरा दीजिए,

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कहां से छेड़ूं फसाना कहां तमाम करूं।

 

इस शेर के साथ दिलीप साहब अपनी आत्मकथा की शुरुआत करते हैं। निश्चित तौर पर जब भी अपने विषय में कुछ लिखा जाता है तो एक कसक बाकी रह जाती है। क्या कहूं क्या ना कहूं। कुछ कहने से किसी का दिल तो नहीं दुखेगा या कुछ कहने से बात तो नहीं भटक जाएगी। यूं तो कला किसी मजहब की गुलाम नहीं, लेकिन कला और व्यवसाय के तालमेल में बहुत से समीकरण होते हैं।

दरअसल, कई लोग शायद न जानते हों लेकिन दिलीप कुमार एक संपन्न परिवार से थे और फिल्मों से उनका नाता नया नहीं था। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजकपूर जिनके पिता उस वक्त के स्थापित अभिनेता थे, दिलीप साहब के बचपन के मित्र थे।

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ये बात सच है कि फिल्मों में जाने को लेकर उनके पिता लाला गुलाम सरवर खान बहुत सख्त थे। उस वक्त फिल्मों में हीरो बनने के लिए संघर्ष कम था क्योंकि उर्दू की जानकारी, खूबसूरत चेहरा-मोहरा और ठीक-ठाक हाव भाव भी योग्यता के दायरे में आते थे।


ये काबिलियतें दिलीप साहब के पास थीं। बस डर था पिता की नाराजगी का। 1940 के दशक में दो घटनाएं एक साथ हुईं, लेकिन कम ही लोगों ने इन्हें साथ में जोड़कर देखा। हम सभी जानते हैं कि फिल्मी दुनिया में आपसी खींचतान की पुरानी कहानी है। ऐसे में इन दो घटनाओं को जोड़कर देखे जाने की जरूरत है।


एक तरह से युसुफ खान का फिल्मी दुनिया में पदार्पण और देविका रानी द्वारा उनका नाम परिवर्तित कर दिलीप कुमार करने का इन दोनों घटनाओं से संबंध हैं। दो संदर्भों के जरिए इसे आसानी से समझा जा सकता है। ये दोनों ही दिलीप साहब के बायोग्राफिकल नोट्स हैं। एक उनकी ऑटो बायोग्राफी और दूसरा उनके ऊपर लिखा गया एक बायोग्राफिकल आर्टिकल।


अपनी ऑटोबायोग्राफी में दिलीप साहब देविका रानी से उनकी मुलाकात के बारे में बताते हैं-

देविका ने मुझसे कहा- यूसुफ, मैं तुम्हे एक अभिनेता के तौर पर लॉन्च करने के बारे में सोच रही हूं और मुझे लगता है कि अगर तुम अपना स्क्रीन नेम बदल लो तो यह कोई बेकार आइडिया नहीं है। एक ऐसा नाम जिससे आप जाने जाएंगे और जो आपके दर्शकों के लिए बहुत उपयुक्त होगा।

एक ऐसा नाम जो कि स्क्रीन पर दिखने वाली आपकी रोमांटिक छवि के अनुरूप होगा। मुझे लगता है कि दिलीप कुमार एक अच्छा नाम है। यह मेरे दिमाग में तब आया जब मैं आपके लिए उपयुक्त नाम के बारे में सोच रही थी। यह आपको कैसा लगता है?


इससे पहले भी अपने इंटरव्यूज में वो इस किस्से का जिक्र कर चुके थे। जिन्हें अलग-अलग तरह से छापा गया। इसी में एक किस्सा ये भी है कि उनके सामने तीन नामों का प्रस्ताव था, जहांगीर, वासुदेव और दिलीप कुमार और निजी तौर पर उन्हें जहांगीर नाम पसंद आया था, लेकिन देविका रानी को दिलीप कुमार नाम पसंद था।
 

देविका रानी को दिलीप कुमार नाम पसंद था। - फोटो : social media

नाम बदलने के और भी हैं किस्से 
दरअसल, ये सिर्फ उनकी पसंद ही नहीं उस वक्त की जरूरत भी थी। उस जरूरत के बारे में बताएं उससे पहले दिली साहब की बायोग्राफी से एक और किस्सा जानने को मिलता है।
 

दिलीप साहब का ये भी कहना था कि पिटाई के डर से उन्हें अपना नाम बदलना पड़ा। एक इंटरव्यू के दौरान दिलीप कुमार ने खुलासा किया था कि उन्होंने पिटाई के डर से अपना नाम बदला था।

उन्होंने कहा था- मेरे वालिद फिल्मों के सख्त खिलाफ थे। उनके एक बहुत अच्छे दोस्त थे, जिनका नाम था- लाला बंसी शरनाथ। इनके बटे पृथ्वीराज कपूर फिल्मों में एक्टिंग किया करते थे। मेरे पिता जी अक्सर उनसे शिकायत किया करते थे कि ये तुमने क्या कर रखा है। तुम्हारा नौजवान और इतना सेहतमंद लड़का देखो क्या काम करता है।


इस बात ये भी स्पष्ट होता है कि कपूर खानदान से दिलीप साहब का परिवार जुड़ा हुआ था। दूसरी महत्वपूर्ण बात उनके वालिद फिल्मों के खिलाफ थे। दादा साहेब फालके की पूरी जीवनी फिल्मों के खिलाफ समाज की सोच से अटी पड़ी है। उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा था। दिलीप साहब के समय तक हालात बदल गए थे। फिल्में लोकप्रिय हो रही थी और अच्छे कलाकारों की जरूरत थी। अब इस समय काल परिस्थिति को भी समझिए।

कपूर खानदान से दिलीप साहब का परिवार जुड़ा हुआ था। - फोटो : social Media

दिलीप साहब की कामयाबी की यात्रा 
1944 में दिलीप साहब की पहली फिल्म ज्वार भाटा आई थी। यानी आजादी से पहले लेकिन ये वो दौर था जब आजादी की आहट शुरू हो गई थी और साथ ही बंटवारे की भी। जिन्ना और नेहरू के खेमे आमने-सामने थे। 1940 में दिलीप कुमार पहली बारी देविका रानी से मिले थे। 24 मार्च 1940 को ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन हुआ था। जहां पहली बार 'पाकिस्तान रिजोलूशन' प्रस्तावित किया गया विधिवत पारित किया गया था।


जिन्ना और मुस्लिम लीग ने यहां पहली बार खुले तौर पर भारतीय मुसलमानों के लिए एक अलग मातृभूमि की मांग की थी। भारत में वैमनस्यता के इतने गंभीर बीज इससे पहले नहीं बोए गए थे, लेकिन अंग्रेजों की चाल और जिन्ना की सियासी भूख ने पूजा पध्दति की दूरियों को और भयानक दूरियों में परिवर्तित कर दिया था।


निश्चित तौर पर उस समय भारत में हिंदू जनमानस में किसी मुस्लिम कलाकार की स्वीकार्यता कम न हो जाए इसकी चिंता देविका रानी को थी। ये एक महत्वपूर्ण वजह थी कि उन्होंने यूसुफ खान का नाम उनकी पसंद के जहांगीर रखने के बजाए दिलीप कुमार रखने पर जोर दिया।

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अशोक कुमार की देविका रानी से अनबन हो गई थी, देविका रानी अशोक कुमार के सब्सिट्यूट को ढूंढऩे के लिए बेकरार थीं। - फोटो : फाइल फोटो

हालांकि इसकी एक और महत्वपूर्ण व्यवसायिक वजह थी जिसके बारे में कम लोग जानते हैं और ये आपके लिए चौंकाने वाली भी हो सकती है। वो वजह है अशोक कुमार। जी हां अशोक कुमार उस समय हिंदी फिल्मों, खास तौर पर हिंमाशू रॉय और देविका रानी के बॉंबे टॉकीज का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा थे।


अशोक कुमार की देविका रानी से अनबन हो गई थी जिसके कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन वो बॉंबे टॉकिज का साथ छोड़ चुके थे। यही वो समय था जब देविका रानी अशोक कुमार के सब्सिट्यूट को ढूंढऩे के लिए बेकरार थीं।


इधर, एक परिचित डॉक्टर के जरिए युसूफ और देविका रानी की पहली मुलाकात हुई थी। जिसमें दिलीप कुमार की भाषा पर पकड़, उनका अंदाज और एक्टिंग में आने की उनकी ललक देविकारानी को पसंद आ गई थी। इसके बाद नाम परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई और दिलीप कुमार ने अपनी पहली फिल्म ज्वार भाटा की जो 1944 में रिलीज हुई थी।


यूं तो उनके नाम परिवर्तन पर कई थ्योरीज रखी जाती हैं लेकिन सत्यापित संदर्भों से ये स्पष्ट है कि उस समय हिंदू मुस्लिम समुदायों में एक वैमनस्यता का माहौल पैदा हो रहा था। अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग परवान चढ़ रही थी। वहीं देविकारानी अशोक कुमार का रिप्लेसमेंट ढूंढ रही थी। यही वजह रही कि उन्होंने हिंदू नाम युसूफ खान को दिया और वो भी अशोक कुमार से मिलता जुलता यानी दिलीप कुमार।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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