देविका रानी को दिलीप कुमार नाम पसंद था।
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नाम बदलने के और भी हैं किस्से
दरअसल, ये सिर्फ उनकी पसंद ही नहीं उस वक्त की जरूरत भी थी। उस जरूरत के बारे में बताएं उससे पहले दिली साहब की बायोग्राफी से एक और किस्सा जानने को मिलता है।
दिलीप साहब का ये भी कहना था कि पिटाई के डर से उन्हें अपना नाम बदलना पड़ा। एक इंटरव्यू के दौरान दिलीप कुमार ने खुलासा किया था कि उन्होंने पिटाई के डर से अपना नाम बदला था।
उन्होंने कहा था- मेरे वालिद फिल्मों के सख्त खिलाफ थे। उनके एक बहुत अच्छे दोस्त थे, जिनका नाम था- लाला बंसी शरनाथ। इनके बटे पृथ्वीराज कपूर फिल्मों में एक्टिंग किया करते थे। मेरे पिता जी अक्सर उनसे शिकायत किया करते थे कि ये तुमने क्या कर रखा है। तुम्हारा नौजवान और इतना सेहतमंद लड़का देखो क्या काम करता है।
इस बात ये भी स्पष्ट होता है कि कपूर खानदान से दिलीप साहब का परिवार जुड़ा हुआ था। दूसरी महत्वपूर्ण बात उनके वालिद फिल्मों के खिलाफ थे। दादा साहेब फालके की पूरी जीवनी फिल्मों के खिलाफ समाज की सोच से अटी पड़ी है। उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा था। दिलीप साहब के समय तक हालात बदल गए थे। फिल्में लोकप्रिय हो रही थी और अच्छे कलाकारों की जरूरत थी। अब इस समय काल परिस्थिति को भी समझिए।
कपूर खानदान से दिलीप साहब का परिवार जुड़ा हुआ था।
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दिलीप साहब की कामयाबी की यात्रा
1944 में दिलीप साहब की पहली फिल्म ज्वार भाटा आई थी। यानी आजादी से पहले लेकिन ये वो दौर था जब आजादी की आहट शुरू हो गई थी और साथ ही बंटवारे की भी। जिन्ना और नेहरू के खेमे आमने-सामने थे। 1940 में दिलीप कुमार पहली बारी देविका रानी से मिले थे। 24 मार्च 1940 को ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का लाहौर अधिवेशन हुआ था। जहां पहली बार 'पाकिस्तान रिजोलूशन' प्रस्तावित किया गया विधिवत पारित किया गया था।
जिन्ना और मुस्लिम लीग ने यहां पहली बार खुले तौर पर भारतीय मुसलमानों के लिए एक अलग मातृभूमि की मांग की थी। भारत में वैमनस्यता के इतने गंभीर बीज इससे पहले नहीं बोए गए थे, लेकिन अंग्रेजों की चाल और जिन्ना की सियासी भूख ने पूजा पध्दति की दूरियों को और भयानक दूरियों में परिवर्तित कर दिया था।
निश्चित तौर पर उस समय भारत में हिंदू जनमानस में किसी मुस्लिम कलाकार की स्वीकार्यता कम न हो जाए इसकी चिंता देविका रानी को थी। ये एक महत्वपूर्ण वजह थी कि उन्होंने यूसुफ खान का नाम उनकी पसंद के जहांगीर रखने के बजाए दिलीप कुमार रखने पर जोर दिया।
अशोक कुमार की देविका रानी से अनबन हो गई थी, देविका रानी अशोक कुमार के सब्सिट्यूट को ढूंढऩे के लिए बेकरार थीं।
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हालांकि इसकी एक और महत्वपूर्ण व्यवसायिक वजह थी जिसके बारे में कम लोग जानते हैं और ये आपके लिए चौंकाने वाली भी हो सकती है। वो वजह है अशोक कुमार। जी हां अशोक कुमार उस समय हिंदी फिल्मों, खास तौर पर हिंमाशू रॉय और देविका रानी के बॉंबे टॉकीज का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा थे।
अशोक कुमार की देविका रानी से अनबन हो गई थी जिसके कारण स्पष्ट नहीं है, लेकिन वो बॉंबे टॉकिज का साथ छोड़ चुके थे। यही वो समय था जब देविका रानी अशोक कुमार के सब्सिट्यूट को ढूंढऩे के लिए बेकरार थीं।
इधर, एक परिचित डॉक्टर के जरिए युसूफ और देविका रानी की पहली मुलाकात हुई थी। जिसमें दिलीप कुमार की भाषा पर पकड़, उनका अंदाज और एक्टिंग में आने की उनकी ललक देविकारानी को पसंद आ गई थी। इसके बाद नाम परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई और दिलीप कुमार ने अपनी पहली फिल्म ज्वार भाटा की जो 1944 में रिलीज हुई थी।
यूं तो उनके नाम परिवर्तन पर कई थ्योरीज रखी जाती हैं लेकिन सत्यापित संदर्भों से ये स्पष्ट है कि उस समय हिंदू मुस्लिम समुदायों में एक वैमनस्यता का माहौल पैदा हो रहा था। अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग परवान चढ़ रही थी। वहीं देविकारानी अशोक कुमार का रिप्लेसमेंट ढूंढ रही थी। यही वजह रही कि उन्होंने हिंदू नाम युसूफ खान को दिया और वो भी अशोक कुमार से मिलता जुलता यानी दिलीप कुमार।
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