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पितृ दिवस विशेष: पुरुष का ममतामयी होना चुनौतीपूर्ण मुद्दा, समाज उनके कोमल गुणों का बनाता है मजाक

सार

एक तथ्य है कि पितृ दिवस 6 दिसम्बर 1907 को मोनोंगाह, पश्चिम वर्जीनिया में एक खदान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं के सम्मान में श्रीमती ग्रेस गोल्डन क्लेटन द्वारा सर्वप्रथम मनाया गया था। किन्तु इसे किसी भी दस्तावेज में दर्ज नहीं किया गया।
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happy fathers day - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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20 जून 2021 को विश्व के कई देशों में पिता दिवस मनाया जा रहा है। इसे जून के तीसरे रविवार को मनाने की परंपरा रही है। मातृ दिवस के पूरक उत्सव के रूप में पिता दिवस दुनियाभर के पिताओं के सम्मान में मनाया जाता है। यह एक तरह से पितृत्व के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पिता होने तथा उनकी सत्ता को एक गौरव का विषय मानकर उनके लिए भोज, एवं पारिवारिक गतिविधियां आयोजित की जाती है। इसके साथ ही कई अन्य रोचक बातें भी इससे संबंधित हैं।

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इसे मातृ दिवस का पूरक इसलिए माना गया क्योंकि इससे पहले पितृ दिवस का अस्तित्व नहीं था। जिस प्रकार स्त्री श्रम के सम्मान हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्त्री दिवस तथा मातृदिवस में मां होने के गौरव को सम्मानित करने के लिए एक दिवस आयोजित हुए उसी प्रकार इसकी भी शुरुआत हुई।

कैसे हुई शुरुआत

एक और तथ्य यह है कि पितृ दिवस 6 दिसम्बर 1907 को मोनोंगाह, पश्चिम वर्जीनिया में एक खदान दुर्घटना में मारे गए 210 पिताओं के सम्मान में श्रीमती ग्रेस गोल्डन क्लेटन द्वारा सर्वप्रथम मनाया गया था। किन्तु इसे किसी भी दस्तावेज में दर्ज नहीं किया गया। इसलिए प्रथम फादर्स डे स्पोकाने, वॉशिंगटन के सोनोरा स्मार्ट डोड के प्रयासों द्वारा दो वर्ष बाद 19 जून 1910 को सर्वप्रथम मनाए जाने की जानकारी प्राप्त होती है। जबकि प्रथम फादर्स डे जिस चर्च में ग्रेस गोल्डन क्लेटन द्वारा आयोजित हुआ था वह आज भी सेन्ट्रल यूनाइटेड मेथोडिस्ट चर्च के नाम से फेयरमोंट में मौजूद है।
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सवाल यह नहीं है कि फादर्स डे किसने पहले मनाया और क्यों मनाया बल्कि सवाल यह है कि पिता के कर्तव्य, उनकी बच्चों तथा घर को चलाने में की गई मेहनत के स्थान पर उनकी सत्ता को स्थापित करने और उसे महिमामंडित करने का इतिहास रहा है।

हालांकि श्रीमती डोड ने अपने पिता और सभी पिताओं को सम्मान दिलाने का प्रयास इसलिए किया क्योंकि उनके सैनिक पिता ने अपनी पत्नी के कम उम्र मे गुजर जाने के बाद छ: बच्चों की परवरिश अकेले की तथा कभी विवाह नहीं किया। अत: उनके जीवन संघर्ष को सम्मानित करना लाजिमी है, क्योंकि जिस समाज में पुरुष को मर्द और मेसकुलीन बनना सिखाया जाता है, उसे नम्र की जगह कठोर, सहनशील की जगह उग्र तथा दयालु की जगह क्रूर बनने का समाजीकरन बचपन से होता है, वैसे समाज में एक पुरुष का ममतामयी होना बहुत ही चुनौतीपूर्ण मुद्दा है। यह चुनौतीपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि समाज पुरुषों के इन कोमल गुणों का मजाक बनाता है।

हमारा समाज और पिता की भूमिका 

समाज केवल स्त्री को ही स्त्री नहीं बनाता बल्कि एक पुरुष को भी पुरुष बनने और बने रहने को बाध्य करता है। एक सुडो पुरुषत्व के कारण एक पुरुष दहाड़ मारकर रो नहीं सकता, सिसक नहीं सकता, गृहस्थी में हाथ बंटा नहीं सकता, बच्चों और अपनी पत्नी के प्रति प्रेम की अभिवयक्ति खुलकर नहीं कर सकता क्योंकि इसकी इजाजत उसे समाज नहीं देता। समाज पुरुष को कठोर बने रहने, भावनाओं को काबू मे करने, परिवार को, समाज को यहां तक की देश को नियंत्रण मे रखने की शिक्षा देता है। 

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happy fathers day - फोटो : Amar Ujala

इसका उदाहरण है कि भारत मे इन्दिरा गांधी के बाद भी कोई महिला प्रधानमंत्री आजतक नहीं बन पाई है, क्योंकि हमारे देश में आज भी यह रूढ़िवादी मानसिकता है कि किसी बड़े देश, वर्ग तथा बड़े काम को संभालने का हुनर केवल पुरुषों के पास है। यही हाल सेना, बड़े कार्पोरेट जगत, फिल्म, मीडिया तथा साहित्य में विद्यमान है। लेकिन सकारात्मक बात यह है कि ये रूढ़ियां अब धीरे-धीरे टूट रही हैं।

अब महिलाओं को भी इन संस्थानों मे जगह मिल रही है। लेकिन यह सब इतनी आसानी से नहीं हो रहा है बल्कि इसके लिए महिलाओं ने खुद को साबित करके दिखाया है। एक लंबे संघर्ष का इतिहास रहा है जब महिलाओं को कमजोर मानने की परंपरा को चुनौती मिल रही है। लेकिन चीजें अभी और बदलनी बाकी हैं।

पुरुष को पितृसत्तात्मक बनाने में सामाजीकरण का बहुत योगदान है। बचपन से ही जेंडर के आधार पर स्त्री पुरुष में किए गए भेदभाव, स्त्री को घर के कामकाज में प्रमुखता दिया जाना और पुरुषों को ब्रेड वीनर मानना इसकी जड़ों में है। यहां तक की किताबों, विज्ञापनों और रोजमर्रा के वयवहार मे स्त्री की हीनता की बातें दुहराई जाती हैं। आभूषण, रंग, प्रतीकों, कपड़े तथा खिलौने भी स्त्री और पुरुष के लिए अलग अलग हैं। इस स्थिति में बड़ा हो रहा बच्चा यह मानने के लिए मजबूर हो जाता है कि स्त्री तथा पुरुष के बीच में भेदभाव है।

उदाहरण के लिए छोटी कक्षाओं की पुस्तकों में चित्र के माध्यम से दिखाया जाता है कि मां रोटी बना रही है और पिता अटैची लेकर काम पर निकल रहे हैं। खिलौने भी अलग-अलग हैं। छोटी बच्चियों को जहां गुड़िया, किचन सेट आदि दिया जाता है वहीं पुरुष बच्चों को बंदूक, गाड़ी, गेम आदि । कुछ परिवारों में लड़कियों को चौदह वर्ष के बाद बाहर खेलना, लड़कों से बात करना आदि से वंचित कर दिया जाता है।

पिता की भूमिका और हमारा समाज 

रंग भी अलग हैं ,लड़कियों का गुलाबी और लड़कों का नीला। कई चीजों में यह देखने को मिलता है कि सीमित वस्तुएं गुलाबी रंग की होती हैं और असीमित वस्तुएं नीले रंगों की। यदि प्रतीकों के माध्यम से वस्तुओं की महानता का बंटवारा है तो भेदभाव बनना लाजिमी है। आकाश नीला है, समुद्र नीला है यहाँ तक की पौरुष से भरे हुए देवताओं का रंग नीला है।

आकाश अनंत है और समुद्र विशाल अत: रंगों के चयन में विशालता और महानता के लिए इस रंग को चुन लिया गया जबकि इनका नीला दिखना एक रासायनिक क्रिया है। अत: सभ्यता की शुरुआत में ही पुरुष प्रधानता के लिए नीले का चयन किया गया न कि गुलाबी का।

पिता ने समाज के विकास के साथ ही अपने रूप में भी परिवर्तन किया है। आज से साठ साल पहले के पिता समाज से इतना डरते थे कि अपने बच्चे को प्रेम करने पर भी उन्हें कई बातें सुना दी जाती थी। बच्चों के साथ उन्हें एक दवाबयुक्त संबंध बनाकर रखना पड़ता था क्योकि बच्चों में उनका भय बना रहे। विशेष रूप से जवान हो रहे पुत्र और पुत्रियों में। पुत्र पर दवाब इसलिए कि आगे चलकर उनकी संपत्ति को संभालने के काबिल बन सके, अगली पीढ़ी का वायक्ति बनकर लोगों पर वर्चस्व स्थापित कर सके। पिता अपने पुत्र और पुत्री की शिक्षा, व्यवसाय, वस्तुएं यहां तक की उनके सपनों पर भी दखल देते थे।

बच्चों पर वर्चस्व स्थापित हासिल की गई सहमति से अपनी मूंछ पर ताव दिया करते थे कि बच्चे उनके चुनाव की इज्जत करते हैं। जबकि एंटोनियोन ग्राम्शी कहते हैं कि, ‘शक्तिशाली लोगों द्वारा वर्चस्व स्थापित करके हासिल की गई सहमति गैर बराबरी के संबंधों पर आधारित है’। उस समय के पिता अपनी पत्नियों से भी अपने माता-पिता के समक्ष प्रेम, सम्मान आदि अभिवक्त नहीं कर सकते थे क्योकि उनका उपहास उड़ाया जाता था।

स्त्रियों के किसी कार्य में मदद करना तो दूर की बात थी। इससे उस स्त्री का दोहरा शोषण होता था। एक तो ससुराल के लोगों द्वारा और जाने-अनजाने खुद के पति द्वारा जो कठोर वयवहार को अपना पौरुष समझते थे। बेटे तो कई बार पिता को अनसुना भी कर जाते हैं लेकिन इसका उल्टा प्रभाव बेटियों पर पड़ता है। पिता उन्हें इज्जत और अपने सम्मान से जोड़ देते हैं कि यदि उनकी पुत्री ने खुद की मर्जी से विवाह कर लिया, प्रेम कर लिया या कोई अलग राय स्थापित कर ली तो इससे पिता की नाक कट जाएगी। नाक सदियों से स्त्री के आचरण से ही कटता आया है पुरुष चाहे कुछ भी अवांछित और असभ्य ही क्यों न कर ले।

हैप्पी फादर्स डे - फोटो : सोशल मीडिया

परिवारों में आया बदलाव और पिता की भूमिका 

आज से तीस वर्ष पहले के पिता ने अपने परिवारों में थोड़ी सी क्रांति लाई। इसके साथ ही एकल परिवार, शहरीकरण, रोजगार, आधुनिकता, बदलता साहित्य, सिनेमा ने भी उस पिता के आचरण में एक बदलाव लाया। विषेशरूप से एकल परिवार ने पुरुषों को थोड़ी छूट दी कि वे बच्चों तथा अपनी स्त्री के प्रति अपनी भावनाओं की अभिवायक्ति कर सकें। कुछ परिवारों की मजबूरी भी रही इस परिप्रेक्ष्य में।

वर्तमान समय के पिता का रूप काफी बदल गया है। पिता बनना आज सिर्फ एक जैविक क्रिया न होकर एक सामाजिक क्रिया भी हो चुकी है। एकल मां की तरह अब समाज में एकल पिता का भी विचार आ चुका है। अब एकल पिता अपने बच्चों का न केवल ख्याल रखते हैं बल्कि उन्हें मां की कमी पूरी नहीं होने देते हैं। गे पिता भी अब समाज में अपनी जगह बनाने लगे हैं। ये पिता भले जैविक पिता नहीं हो सकते लेकिन भावनाओं की अभिवयक्ति में ये जैविक पिताओं से थोड़े भी उन्नीस नहीं हैं।

एक महत्वपूर्ण क्रांति आधुनिक जैविक पिताओं में भी देखी जा रही है। ये पिता बच्चों को दूध पिलाने से लेकर उसके डायपर, नैपी तक बदल रहे हैं वो भी पूरी खुशी, प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ। कुछ तो समाज की नई बयार ने भी मदद की है जिसमें पति पत्नी दोनों कामकाजी हैं। पहले ऐसा माना जाता था कि मां ही बच्चों के अधिक नजदीक होती हैं क्योंकि बच्चों की अधिक देखभाल करती है।

आज बच्चे अपने पिताओं से भी बहुत दोस्ताना संबंध बनाने लगे हैं क्योकि ये आधुनिक पिता बहुत लोकतान्त्रिक व्यवहार वाले हैं। यह बच्चों पर दबाव नहीं बनाते। बच्चों का भविष्य अच्छा वही सोच सकते हैं, इस बात पर बच्चों का शोषण नहीं करते। यदि बेटियों ने भी खुद की मर्जी से विवाह, शिक्षा या व्यवसाय चुनने की बात की तो गंभीरता से विचार करते हैं न कि उनका ऑनर कीलिंग कर देते हैं। सबसे ध्यान देने की बात कि आज के कई पिता एकल बालिका शिशु के अभिभावक बनने में भी गर्व महसूस करते हैं। उन्हें वंश बनाने और बढ़ाने के लिए बालक शिशु को प्रधानता देने का कोई कारण नजर नहीं आता।

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हैप्पी फादर्स डे - फोटो : सोशल मीडिया

पुरुष का आचरण और परिवार 

हमारे समाज में एक पुरुष का आचरण बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है। समाज में संवेदनशीलता और जागरूकता लाने में एक अच्छी पहल कर सकता है। एक ही काम यदि स्त्री और पुरुष दोनों करते हैं तो वही काम पुरुषों के लिए सम्मानित हो जाता है जिसे वह बहुत खुशी से करते हैं। महिलाओं के लिए वही काम रोज का बोझिल काम हो जाता है। उदाहरण के लिए महिलाओं द्वारा रोज भोजन पकाना आम बात है जिसकी कोई प्रसंशा और वाहवाही उन्हें नहीं मिलती है जबकि पुरुष अगर एक दिन भोजन बना दें तो वह बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

संजीव कपूर और रणवीर बरार, अमित खन्ना आदि को सेलिब्रिटी शेफ के रूप में लोकप्रियता हासिल है जबकि महिला शेफ अमृता रायचंद, पंकज कपूर आदि को कितने लोग जानते हैं। महान नारीवादी विद्वान ग्लोरिया स्टीनम ने अपने प्रसिद्ध व्यंग्य निबंध "इफ मेन कुड ` मेनस्ट्रुएट" में लिखा है कि यदि पुरुषों को महवारी आती तो इसे एक बहुत अमूल्य गुण माना जाता तथा कार्यस्थल और समाज में उनके द्वारा कई रियायतें मांगी जाती’। किन्तु हमारे समाज में यह भी एक टेबू है क्योकि यह महिलाओं से जुड़ा हुआ मामला है।

तात्पर्य यह है कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों का निर्णय, उनका वर्चस्व आज भी हर स्थान पर कायम है ऐसी स्थिति में एक पिता का स्थान समाज को बदलने में बहुत महत्वपूर्ण है। समाज और पूरी दुनिया उनके हर काम को महत्व देती है जिसके लिए स्त्रियां आज भी लालायित हैं। अत: आज दुनिया के सभी पिताओं का यह कर्तव्य है कि समाज में जेण्डर के आधार पर गैर बराबरी रोकने का प्रयास अपने घरों से करें। क्योकि उनके व्यवहार को एक छोटा बच्चा न केवल देख रहा है बल्कि उससे सीख भी रहा है। आगे चलकर वह भी अपने पिता का अनुरसरण करेगा।

आज पिता को बच्चों का दोस्त और अपनी पत्नियों का साथी बनने की परम आवश्यकता है। पिता का बेटे-बेटियों के साथ किया गया व्यवहार बहुत हद तक परिवार और समाज पर आसर डालता है। आज हमें ऐसे पिता की जरूरत नहीं जो वर्चस्व स्थापित करके हमसे सहमति लेते हैं बल्कि ऐसे पिता की आवश्यकता है जो हमारे विचारों और इच्छाओं को न केवल प्रमुखता देते हैं बल्कि हमारे सपनों को उड़ान भरने की ताकत भी देते हैं।

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