आज पितृत्व दिवस है। समाज और परिवार में पिता की भूमिका और उसके महत्व को प्रतिपादित करने का दिन। कोरोना काल में पिता और माता दोनों की ही भूमिका में बदलाव आए हैं। मां जहां महामारी के इस संकट मेंं परिवार का प्रमुख केंद्र बनकर उभरी है वहीं पिता के दारोमदार और जिम्मेदारी में बदलाव और बढ़ोतरी दोनों हुई है।
अक्सर पितृत्व दिवस पर बात करते हुए हम पितृ सत्तात्मक पक्ष को सामने लाते हैं और उसकी आलोचना व समालोचन में लग जाते हैं, लेकिन इस कार्य और नसीहतों के लिए पूरा साल पड़ा होता है, जबकि एक दिन पिता और परिवार के प्रति संवदेनशीलता को याद किया जा सकता है।
बहरहाल, पिता और उसके प्रति सारी सहाुनभूति व संवदेनशीलता इस समय सोशल मीडिया पर जाहिर हो रही है। जहां एक ओर ‘बेस्ट डैड एवर’ वाले पोस्ट की भरमार है तो वहीं दूसरी ओर यह ट्रेंड कर रहा है कि “आपके पिता बेहतरीन हैं तो उनसे अन्तर्जातीय विवाह, जातिवाद या लिंगभेद पर बात करके देखिए फ़िर आप जानेंगे कि आप कितने सही हैं ?”
दूसरी बात लिखते समय हम बहुत हद तक एकपक्षीय हो जाते हैं। याद रखिए कि ये पितृसत्तात्मक सोच आज या कल की नहीं है, इसका एक बहुत लम्बा इतिहास है और हम एक दिन में क्रान्ति क्यों चाहते हैं? अगर इस सोच से आगे निकलकर आज हमारे पिता अपनी पत्नी को कोई ‘चीज़’ ना मानकर उनकी छोटी-छोटी खुशियों का ख्याल रख रहे हैं, उनकी परेशानियों को समझ रहे हैं और बेटियों को खुला आसमान दे रहे हैं तो हमें इसका सम्मान करना चाहिए ना कि सेक्सुअलिटी पर बात ना कर पाने के कारण उन्हें पितृसत्तात्मक सोच का कह कर निकल जाना चाहिए।
मेरे पिता ने समाज की बातों को दरकिनार कर के मुझे वो सब दिया जो मुझे चाहिए था लेकिन मैं इसे छोड़कर सिर्फ़ अन्तर्जातीय विवाह पर बात ना कर पाने के कारण उन्हें पितृसत्ता को ढोने का दोषी ठहरा दूं?
यद्यपि हमारा संविधान किसी भी बालिग को उसकी मर्ज़ी से विवाह करने का पूरा अधिकार देता है, लेकिन हमारा समाज अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ जो इसे स्वीकार कर लेl यक़ीन मानिए ज़्यादातर मां-बाप हमारे उचित पसंद को खुद स्वीकार करते हुए भी समाज के तथाकथित ‘इज़्ज़त’ की बलि चढ़ जाते हैंl
जहां तक मुझे लगता है कि किसी भी पिता के लिए उसके बच्चों की खुशी से बढ़कर कुछ भी नहीं होता पर हमारा समाज पितृसत्तात्मक है और हमारे पिता भी उसी समाज से हैं। हमारे समाज में अन्तर्जातीय विवाह को ‘इज़्ज़त की फ़ज़ीहत’ का नाम दिया जाता है और ऐसे में हमें हमारे पिता से यह उम्मीद रखना कि उन्हें समाज से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, बेवक़ूफी है।