वर्तमान विज्ञान संदर्भों के आधार पर चलता है। हम जब तक संदर्भ नहीं रखेंगे। स्वीकार्यता नहीं होगी। कालगणना कितनी महत्वपूर्ण है और इसे कैसे किया जाए?
उत्तर- इसे एक उदाहरण से समझिए। शतपथ ब्राह्मण में एक उल्लेख मिलता है। कृतिका नक्षत्र मंडल, ठीक पूरब में उदय होता है। ज्योतिष में सायण और निर्यण जिसे आसान भाषा में रात और दिन बराबर होता है से समझ सकते हैं। ये वो काल था जिसमें कृतिका नक्षत्र मंडल ठीक पूरब में होता था लेकिन आज नहीं होता। इन दोनों के बीच के काल की गणना की जा सकती। इसी तरह अयन भ्रमण का चक्र 25 हजार वर्ष में पूरा होता है। पुनः उसी जगह पर पृथ्वी आ जाती है। 25 हजार वर्ष में क्या स्थितियां थी इसे भी इस गणना से समझा जा सकता है।
अब महत्वपूर्ण बात ये भी है कि भारतीय संस्कृति सिर्फ 25 हजार वर्ष की ही नहीं, उससे पीछे जाती है। आधुनिक इतिहासकार इसे समझ ही नहीं पाते तो इतना पीछे जाएंगे कैसे। आधुनिक काल गणना के तरीकों से भी यही परिणाम मिलेंगे तो इस बात को सिद्ध करने में कोई समस्या ही नहीं है कि वैदिक शास्त्रों की काल गणना कितनी सटीक है और उनके आधार पर समय का निर्धारण किया जा सकता है। इसीलिए इतिहासकारों को गृहों और नक्षत्रों की आकाशीय गणना करना आना चाहिए। नहीं तो वे इस महत्वपूर्ण विषय के ज्ञान के अभाव में कभी भी सही गणनाएं कर ही नहीं पाएंगे। ग्रंथों में जहां जहां आकाशीय गणनाओं का वर्णन है उनके आधार पर ठीक ठीक उन घटनाओं के सही काल तक पहुंच सकते हैं।
पुराणों को कपोल कल्पनाएं कह देते हैं जबकि इसमें राजवंशों की जानकारियां हैं। कितने महत्वपूर्ण हैं पुराण? और ये इतिहास को जानने में कैसे सहायक हो सकते हैं?
उत्तर- पुरा नवम, जितनी पुराना है उतना नवीन प्रतीत होता है। पुराणों का लेखन सामान्य जनों के लिए हुआ। वैदिक ज्ञान उत्कृष्ट ज्ञान था। इसे सिर्फ उत्कृष्ट मस्तिष्क के विद्वान ही समझ सकते थे। अबोध जनता के लिए वैदिक ज्ञान और उपनिषदों की शिक्षा और आधार को सामान्य जन तक पहुंचाने के लिए पुराणों की रचना की गई। इसीलिए उसमें राजवंश, सर्ग प्रतिसर्ग सभी कुछ आया। भूगोल, इतिहास, वेदों का ज्ञान, बड़े रहस्यों को कथानक भाव से रखा। अब उस कथा के पीछे वैज्ञानिक आधार में न जाकर, हम सिर्फ कहानियों तक उलझ कर रह जाएंगे तो पुराण कैसे समझ पाएंगे। यही कारण रहा कि पुराणों को इतिहासकारों ने हल्के में उड़ा दिया।
एक उदाहरण से बात समझिए बच्चा अपनी माता से कहे कि मुझे चंद्रमा दे दे। मां बहुत समझदार है वो एक थाली में चांद दिखाती है। बच्चा चांद को पकड़ने लगता है। मां बहुत बुद्धिमति है पर बच्चा अबोध है। बच्चा उस ज्ञान को नहीं समझ पाता। मां जानती है चांद नहीं ला पाऊंगी और ये और रोएगा। इसीलिए मां बीच का रास्ता निकालती है और ये प्रयोग करती है। अभिप्राय ये नहीं की चांद थाली में आ गया, लेकिन एक तरह से बच्चे के लिए वो वहां है भी। इसी तरह पुराणों की कहानियां हैं, जिनमें महत्वपूर्ण रहस्यों को कथानक भाव के साथ रख दिया गया। कई रहस्य आज भी वैज्ञानिक धरातल पर सही साबित होते हैं।
सुश्रुत, पाणिनि, कणाद, कपिल मुनि बहुत से ऋषि हैं। इनके समय की भी सही कालगणना की कोशिश होती है। ये नाम कितने महत्वपूर्ण हैं इनसे क्या जानकारियां मिलती हैं। इनक समय काल की सही गणना कैसे हो?
उत्तर- यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है। हम वर्तमान संस्कृत के धरातल को समझना होगा। आज संस्कृत को मात्र भाषा तक सीमित करके देखा जाता है। संस्कृत भाषा आती है, तो सबकुछ आता है, ऐसा मानना गलत होगा। संस्कृत भाषा के साथ ही विशिष्ट विषय की जानकारी भी होना आवश्यक है। रसायन शास्त्र को लिखने वाले ऋषि के कार्य को समझने के लिए भाषा के जानकार की तो आवश्यकता है ही, साथ ही रसायन शास्त्र का जानकार होना भी आवश्यक है। आज संस्कृत का जानकार भाषा को तो समझता है लेकिन विषय को नहीं। इसी तरह विषय का जानकार अपने विषय को तो जानता है लेकिन संस्कृत को नहीं।
जब तक विषय और भाषा दोनों के ज्ञानी साथ नहीं आते या दोनों का ज्ञान किसी विद्वान को नहीं होता, तब तक सही अर्थों में इन पुरातन वैज्ञानिकों के कार्य को नहीं समझा जा सकता। संस्कृत के काव्य और नाटकों भर को समझकर और मूलभूत व्याकरण के ज्ञान से भी संस्कृत भाषा समझी जा सकती है। संस्कृत सीखना उतना जटिल नहीं जितना इसे प्रचारित किया गया। दरअसल ये एक सोच समझा प्रयास था। संस्कृत की शिक्षा पर मैकाले ने प्रतिबंध लगाया था। वो इस बात को जान गया था कि भारत की संस्कृति और धर्म शास्त्रों पर आधारित है और शास्त्र संस्कृत में हैं। वहीं अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार किया गया। संस्कृत सीखने पर टैक्स लगाया गया और अंग्रेजी को मुफ्त किया गया।
ये प्रयास ही बताता है कि आधुनिक शिक्षाशास्त्री वैदिक संस्कृति के सत्य से कितने भयग्रस्त थे। इससे वैदिक संस्कृति का बहुत नुकसान हुआ। संस्कृत की शिक्षा को सिर्फ भाषा तक सीमित कर दिया गया। लोग ऐसा मानने लगे कि संस्कृत जानने वाला हमें आयुर्वेद भी बता देगा, ज्योतिष भी बता देगा, गणित बता देगा और फिलॉसफी भी बता देगा। चित्रकला, आभियांत्रिकी, शिल्पकला आदि विषयों के विषय में भी यही बात है। जबकि ये संभव नहीं है। सिर्फ भाषा का ज्ञान विषयों का ज्ञान नहीं दे सकता। सुश्रुत आयुर्वेद के, भास्कर खगोल के, आर्यभट्ट गणित के आचार्य हैं, संस्कृत के साथ इन विषयों को भी पढ़ेंगे तभी इन ऋषियों को समझा जा सकता है।
डॉ. प्रफुल्ल चंद्र रे ने हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमेस्ट्री लिखी। ये ठीक वहीं प्रयास था जिसका आपने अभी जिक्र किया। आज के दौर में इस चुनौती से कैसे निपटा जाए?
उत्तर- भारतीय भाषाओं में संस्कृत प्राचीनतम है। सबकुछ संस्कृत में लिखा गया। संस्कृत को जानने मात्र से विषय तक नहीं पहुंच सकते। इन आचार्यों को सही सही जानने के लिए दोनों का ज्ञान होना चाहिए। परंपरागत आयुर्वेद का ज्ञान और संस्कृत का ज्ञान दोनों सुश्रुत को जानने के लिए जरूरी है। सिर्फ संस्कृत के ज्ञान से बात नहीं बनेगी। आधुनिक शिक्षा में इसे डालना बहुत जरूरी है। उदाहरण के लिए कणाद ने भौतिकि में बहुत काम किया। उनके भौतिक शास्त्र पर लिखे गए अतुलनीय शास्त्रों को समझने के लिए संस्कृत और भौतिकी दोनों का ज्ञान होना आवश्यक है।
उन्होंने दर्शन शास्त्र को भी समझा था। यानी तब भी ऋषि मुनि विभिन्न विषयों के जानकार होते थे। आधुनिक भौतिकी के नियमों के आधार पर यदि कणाद के नियमों का अध्ययन हो तो पता चलेगा कि वैदिक शास्त्र या संस्कृत में लिखे गए इन महान वैज्ञानिकों के ग्रंथ कितने महत्वपूर्ण हैं। गति के नियम से लेकर हर विषय में सबकुछ लिखा जा चुका है। सिर्फ भाषा के आधार पर, कणाद को हम आज पढ़ तो लेते हैं लेकिन उनका मूल उद्देश्य समझ नहीं पाते हैं।
गणित, रसायन, भौतिकी सभी के विषय में यही बात है। संस्कृत विषय को जब तक मूल विषय नहीं बनाया जाएगा, इन वैज्ञानिकों के कार्य नहीं समझे जा सकते। आधुनिक शिक्षा पध्दति में किस तरह के प्रयास किए जाने चाहिए?
उत्तर- ये बहुत महत्वपूर्ण विषय है। आधुनिक गणित के विद्यार्थी जब संस्कृत की ओर देखते हैं, तो वे सोचते हैं, गणित और संस्कृत के मेल का क्या अभिप्राय हो सकता है? संस्कृत में तो गणित लिखी ही नहीं जा सकती है। भाषा और विषय के मेल के अभाव में इस तरह का भाव आता ही है। जबकि गणित के आधारभूत ग्रंथों, सिध्दांतों की विवेचना इन्हीं संस्कृत ग्रंथों के आधार पर हुई है। परिधि व्यास संबंध को पाई कह दिया, गुरुत्वाकर्षण का सिध्दांत हो, शून्य और अनंत की खोज, अंकों की खोज सभी भारत की देन है। अब संस्कृत जानने वाला गणित की प्रक्रिया को न समझे तो कैसे इन ग्रंथों और इनके ज्ञान को समझ पाएगा? ऐसा ही इन विषयों के जानकारों के बारे में भी है, यदि वे संस्कृत नहीं जानेंगे तो उन्हें कभी पता ही नहीं चलेगा कि इनमें लिखा क्या गया है।
ज्योतिषिय गणना और फलित ज्योतिष को भी आज बहुत सस्ते तौर पर बाजार में बेचा जा रहा है। कालगणना के लिए ज्योतिषिय गणना को वैज्ञानिक रूप से उपयोग करने की बात आप कह रहे हैं। इन दोनों परिस्थितियों पर क्या कहेंगे आप?
उत्तर- ज्योतिष एक ऐसा शास्त्र है जो वैदिक काल की ‘फेकल्टी ऑफ साइंस’ है। ज्योतिष का अनुवाद आज बहुत सस्ता है जबकि ये सभी विज्ञानों का आधार है। इसमें सभी विज्ञानों की चर्चा है। चाहे वो भौतिकी हो, गणित या रसायन शास्त्र। मौसम विज्ञान, जल विज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, धातु विज्ञान सभी तक ज्योतिष की पहुंच है। आज हमने ज्योतिष को कुंडली विज्ञान तक ही सीमित कर दिया है। कुंडली को बांचने भर में इसका प्रयोग हो रहा है। हम ज्योतिष की सही परंपरा नहीं समझ रहे हैं। सामान्य लोग भी ज्योतिष को इतना ही समझ रहे हैं। ज्योतिष काल का विधान और व्यवस्था करने वाला विज्ञान है। आधुनिक विज्ञान की बात करें तो एस्ट्रो ज्योग्राफी भी यही कर रहा है। समय का निर्धारण आज इसी से हो रहा है। भारतीय ज्योतिष वर्तमान विज्ञान से अधिक सटीक काल की गणना और निर्धारण करता है। दिग देश काल इन तीन बिंदुओं को जैसे भारतीय ज्योतिष ने रखा है किसी और ने नहीं।
भारतीय वैदिक शास्त्र में गणित की प्रमुखता है। ज्योतिषिय गणनाएं, खगोल विज्ञान में हम बहुत आगे रहे। आज हम अपने ही ग्रंथों का सही सही काल निर्धारण क्यों नहीं कर पाते हैं। काल निर्धारण कर भी लेते हैं तो उसे आधुनिक विज्ञान में स्थापित क्यों नहीं कर पाते हैं?
उत्तर- इसके दो पक्ष हैं। जो लोग इस विषय के लेखन में हस्तक्षेप करते हैं या जो लोग हमारे बारे में लिख रहे हैं, उन्हें हमारे वेदों और वैदिक साहित्य का कोई ज्ञान नहीं। वे इन्हें कभी पढ़ते ही नहीं। पूर्व में जो कुछ लोगों ने लिख दिया, उसी के आधार पर इस साहित्य को मानते रहते हैं। षड्दर्शन और वेदांग तक उनकी पहुंच ही नहीं। आंग्ल भाषा में विदेशियों ने जो कुछ लिख दिया, वही उनके शोध का स्त्रोत बना हुआ है। यदि भारतीय ज्ञान को समझना है, तो मूल स्त्रोत को पढ़ें, इसके लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है।
दूसरी तरफ जो संस्कृत पढ़ने वाले लोग हैं, जो इस ज्ञान को समझते हैं, वे आधुनिक विज्ञान की पध्दतियों को नहीं जानते हैं। यही वजह है कि सही ज्ञान लोगों के समक्ष नहीं आ पाता है। वे आधुनिक शिक्षा पध्दति में जो कुछ दूसरी भाषाओं में लिखा जा रहा है, उसको भी नहीं समझ पाते हैं। ऐसे में ये दोनों धाराएं बिलकुल अलग अलग हो जाती हैं। दोनों एक दिशा में आ जाएं तो सार्थक प्रयास हो सकते हैं। इससे दुनिया और संस्कृत दोनों का लाभ होगा।
आधुनिक शिक्षा पध्दति के अपने मानक तय कर दिए गए हैं। उसमें संदर्भों के भी मानक तय कर दिए हैं। आप जो शोध करते हैं, क्या वे वहां जगह पा पाते हैं? दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न ये कि आधुनिक संदर्भों के मानकों में जगह पाना कितना महत्वपूर्ण है?
उत्तर- हम जो भारतीय पध्दतियों से शोध लिखते हैं, उन्हें आधुनिक संदर्भ शास्त्री स्वीकार नहीं करते हैं। इसका अभिप्राय ये है कि आप उनकी तरह चलें तो ही बात स्वीकार की जाएगी। मेरा पक्ष ये है, कि आधुनिक शोधकर्ताओं के समक्ष भी जब साक्ष्य के रूप में ये ज्ञान प्रस्तुत होता है, तो वे इस ज्ञान के समक्ष स्वयं नतमस्तक हो जाते हैं। वे स्वयं चुप हो जाएंगे। शास्त्र का प्रमाण और मूल ज्ञान रखना आवश्यक है। गुरुत्वाकर्षण के नियम को न्यूटन ने रखा, जबकि उनसे 500 वर्ष पहले भास्कराचार्य इसे अपने ग्रंथ में लिख चुके थे।
ऐसे ही कई नियम आज भी इन ग्रंथों में लिखे हुए हैं। आधुनिक गणितज्ञ जब तक इनका गहराई से अध्ययन नहीं करेंगे, वे इन्हें समझ ही नहीं पाएंगे। स्वीकारोक्ति का ही अभाव दिखाई देता है। वे देखते हुए न मानना चाहें, तो ये विज्ञान के लिए कैसे अच्छा हो सकता है? वे अपनी पूर्व में कही हुई बातों को झुठलाना नहीं चाहते हैं, क्योंकि प्राचीन ग्रंथों के संदर्भ स्थापित हुए तो उनके पुराने मानक बदल जाएंगे और वो ऐसा नहीं चाहते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में भी स्वयं को उत्कृष्ट दिखाने की ये होड़ आधुनिक विज्ञान ने शुरू की है।
पाश्चात्य लेखक वैदिक सभ्यता और भारतीय परंपरा को झुठलाना क्यों चाहते हैं?
उत्तर- वेदों को लेकर लिखे गए पाश्चात्य लेखकों के भाष्यों से ही ये बात पता चलती है कि उनका उद्देश्य भारतीय शास्त्रों को झुठलाना था। उनका प्रयास यही था कि वे किसी तरह ये बात स्थापित करें कि वेदों में कोई खास बात नहीं है। जिस काल में ये लिखे गए तब इसी तरह का उद्देश्य स्पष्ट तौर पर उनका रहा होगा। इन्हीं लेखकों के ग्रंथों के आधार पर आधुनिक संदर्भ शास्त्र को खड़ा कर दिया गया। इन्हें गडरिया के गीत तक कह कर ये संदर्भ लिखे गए। अब नए शोधार्थी जब इन बातों को पढ़कर शोध के लिए जाते हैं तो वे पूर्वाग्रही हो जाते हैं। जब भी पूर्वाग्रह आपके भीतर डाल दिया जाता है तो आप खींचतान कर अपने इन्हीं विचारों के इर्द गिर्द पहुंचने का प्रयास करते रहते हैं।
यहां स्वतंत्र विचारों के बजाए पूर्वाग्रह को प्रमाणित करने के प्रयास अधिक दिखते हैं। मैक्समूलर आदि लोगों ने वेदों के जो भाष्य लिखे उनका मकसद वेदों के वैशिष्ट्य को कम करके दिखाना था। वे वैदिक संस्कृत और सामान्य संस्कृत का भेद ही नहीं समझे या जानबूझकर समझना नहीं चाहा। वैदिक संस्कृत और सामान्य संस्कृत के शब्दों में बड़ा अंतर है। यहां अर्थ ही बदल जाते हैं। वैदिक व्याकरण की जानकारी के बिना किए गए भाष्यों से गलत संदेश जाते हैं। हां एक बात जरूर हुई कि इनकी वजह से कम से कम ये ज्ञान अन्य लोगों तक गया और इससे कई अन्य लोगों में भी मूल साहित्य को पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ी।
पाणिनी ने संस्कृत व्याकरण पर बहुत काम किया, लेकिन उनके बाद संस्कृत में उतना काम नहीं हो पाया? ये मेरी जानकारी का अभाव भी हो सकता है लेकिन पाणिनी के पहले बहुत वैयाकरण देखने को मिलते हैं उनके बाद नहीं। ऐसा क्यों?
उत्तर- पाणिनी व्याकरण के पहले इंद्रादि 14 अन्य वैयाकरणों का कार्य मिलता है। पाणिनी का बहुत बड़ा शोध रहा। उन्होंने सभी वैयाकरणों के कार्य को एक साथ रखा। समग्र वैयाकरणों का भ्रमण करते हुए उन्होंने सभी का निचोड़ एक जगह रखा। उन्होंने बहुत अध्ययन किया। पाणिनी के बाद महर्षि पतंजलि और कात्यायन इन दो वैयाकरणों ने भी बहुत शोध किया। उत्तर वर्ती
काल में व्याकरण में जो मौलिक शोध होना चाहिए था वो नहीं हुआ, ये बात सही है। इसका कारण ये है कि, 11 वीं शताब्दी तक संस्कृत शोध बहुत लोकप्रिय थे, लेकिन बाद में ये बहुत सीमित हो गया। जो लोग राजाश्रयों में रहकर कार्य कर रहे थे, उन्हीं तक ये सीमित हो कर रह गया। इसके पूर्व या ईसा के पूर्व हमारे यहां विश्वविद्यालय हुआ करते थे। नालंदा तक्षशिला तो हम जानते ही हैं, इनके अलावा विक्रम आदि विश्वविद्यालयों में भी लगातार शोध हो रहे थे। यहां के आचार्यों ने बड़े बड़े शोध किए।
जैसे आर्यभट्ट ने अपने ग्रंथ ऐसे ही विश्वविद्यालयों में रहते हुए लिखे। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ग्रहण की प्रक्रिया को समझाया। ग्रहों के लिए गणितीय गणनाओं का प्रावधान दिया। सूर्य-चंद्रमा के भ्रमण पथ को लेकर भी उन्होंने वैज्ञानिक प्रक्रिया दी। यह उदाहरण बताता है कि सिर्फ संस्कृत ही नहीं अन्य विषयों का भी शोध इन विश्वविद्यालयों में हो रहा था। इनके ध्वंस के बाद और आक्रमणों के चलते शोध का ये कार्य भारत में बाधित हो गया। इसके बाद अन्य संस्कृतियों के आक्रमण और आधुनिक समय में अंग्रेजों के अपने शिक्षा पध्दति को थोपने के बाद संस्कृत भाषा में अन्य विषयों पर शोध और संस्कृत व्याकरण का अपना शोध दोनों ही बाधित हो गए।
आधुनिक विज्ञान और पौराणिक शास्त्र में क्या साम्य है? क्या पौराणिक शास्त्र भी आधुनिक विज्ञान के मानकों के आधार पर सही काल गणना कर सकते हैं?
उत्तर- आधुनिक इतिहासकार भी विकास के सिध्दांत को ठीक वैसे ही समझते हैं, जैसे हमारे पौराणिक ग्रंथ। डारविन के विकासवाद के सिध्दांत को पहले पुराणों में बताया गया है। विष्णु के दशावतार की तरह ही डारविन का विकासवाद जल से थल की ओर जाता है। इन्हें विस्तार से पढ़ें तो आधुनिक सिध्दांत और पौराणिक सिद्धांत में स्पष्टतः साम्य स्थापित होता दिखता है। कालगणना में भी आधुनिक इतिहासकार पूर्व में, ईसा के पहले जाने में घबरा जाते थे। वे हर चीज को शुरुआत से ही ईसा के बाद स्थापित करने के उद्देश्य से आगे बढ़ते रहे।
जब वे अन्य संस्कृतियों खासतौर पर भारत जैसी संस्कृतियों तक पहुंचे तब उन्हें ईसा के पीछे भी जाने की आवश्यकता महसूस हुई। ईसा के पीछे जाने में भी वे बहुत पीछे नहीं जा पाते हैं। कलयुग की आयु द्वापर के बाद 5000 वर्ष से कुछ अधिक हो चुकी है। ये कलयुग की आयू स्पष्टतः है, लेकिन इतना पीछे जाना उनके लिए संभव नहीं होता। इसका कारण ये है उन्हें अन्य पध्दतियों पर निर्भर रहना पड़ता है, इसमें भी वे पूरी तरह सिर्फ पुरातात्विक साक्ष्यों तक ही सिमटे हुए हैं। उन्हें कोई और पद्धति मिलती नहीं है। भगवान कृष्ण की भूमि द्वारिका को भी वे पहले मानने को तैयार नहीं थे। अब धीरे धीरे वे पुरातात्विक समुद्र में मिले साक्ष्यों के आधार पर ये मानने लगे हैं कि यहां कोई साम्राज्य था, जो जल प्लावन की वजह से समाप्त हो गया। यही बात हमारे यहां पहले से लिखी हुई है और सर्व सामान्य में मान्य भी है।
आधुनिक इतिहास के मानकों पर वेद पुराणों का इतिहास जानने की पध्दति बहुत कमजोर है। जब हमें कुछ मिले तो उसके आधार पर हम कल्पना करें और कल्पना के आधार पर हम कोई कहानी बनाएं। भारतीय पौराणिक ग्रंथों और शोध शास्त्रों में इन्हीं बातों को व्यवस्थित तरीके से पहले ही लिख दिया गया था। नक्षत्रों की गति और कालगणना के आधार पर हम बहुत सटीक जानकारियां निकाल सकते हैं। इससे स्पष्टतः एक संबंध ये आता है कि जो कुछ आधुनिक विचारक अपने शोध से पता लगाते हैं वो इस पद्धति से भी सिध्द हो जाता है। इस पद्धति से उन्हें बहुत लाभ मिल सकता है लेकिन वो इसका इस्तेमाल करते ही नहीं हैं।
वैदिक संस्कृति के बाद बुध्द महावीर का आना और फिर इनके बाद दोबारा वैदिक संस्कृति की पुनर्स्थापना को आप कैसे देखते हैं?
उत्तर- जब पूरा विश्व ज्ञान विज्ञान के चरम पर पहुंच जाएगा और सर्व सामान्य ज्ञान विज्ञान से परिपूर्ण हो जाएगा। दो दोबारा विश्व वैदिक संस्कृति तक पहुंच जाएगा। वैदिक संस्कृति का अर्थ ही है सभी का ज्ञान विज्ञान से परिपूर्ण हो जाना। ये एक समवेत संस्कृति थी जहां निर्णय समितियों में लिए जाते थे। बहुत से ऋषि मुनियों ने परस्पर मिलकर अपने शोध किए और इन शास्त्रों की रचना की। वैदिक संस्कृति कभी भी व्यक्ति विशेष के पीछे नहीं चली। यहां हमेशा समाज का और सभी के योगदान का महत्व रहा है। वेद व्यक्ति का समर्थन नहीं करता है। इसीलिए वहां सहना भवतु, सहनौ भुनक्तु.. की बात आपको मिलेगी। वसुधैव कुटुंबकम की बात वहां पर मिलेगी। समिति समानाः यानी सभी मिलकर निर्णय लेते थे। वैदिक का अर्थ है सबको साथ लेकर चलना, सभी की बात को सुनना वहां एक व्यक्ति के पीछे चलने का प्रावधान ही नहीं है।