भाषाओं का संकट- छोटी मछलियों को निगलती बड़ी मछलियां
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हीन भावना भी मार रही बोलियों को
बोली-भाषा और संस्कृति के प्रति हीन भावना के चलते सबसे ज्यादा खतरे में हमारी दूध बोलियां ही हैं। इनके खतरे का असली कारण मुख्य धारा की संस्कृतियों के आगे क्षेत्रीय संस्कृतियों को कमतर या पिछड़ी मानना है। बोली या भाषा हमारे संस्कृति की अभिन्न अंग होती हैं। ये संस्कृतियां भी एक साल-दो साल में नहीं बल्कि हजारों सालों में विकसित हो कर अपना आकार लेती हैं। जब हम मुख्यधारा की संस्कृति के सामने अपनी संस्कृति को पिछड़ी या घटिया मान लेंगे तो जाहिर है कि हम अपनी बोली को भी पिछड़ेपन की निशानी मानकर उसे सार्वजनिक तौर पर प्रकट करने में संकोच करेंगे।
वर्ष 2011 की भारत की जनगणना के आकड़ों पर ही गौर किया जाए तो उसमें -
कुल 19,569 बोलियां और भाषाएं दर्ज हुई हैं, जिनके बोलने वाले 121 करोड़ बताए गए हैं। इनमें भी 121 भाषाएं 10 हजार से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली थीं। लेकिन चिंता की बात है कि हमारे देश की 10 भाषाएं ऐसी हैं जिनको बोलने वाले 100 से भी कम लोग बचे हैं। वहीं 81 भारतीय भाषाएं संवेदनशील की श्रेणी में रखी गई हैं, जिनमें मणिपुरी, बोडो, गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी, लद्दाखी, मिजो, शेरपा और स्पिति शामिल हैं।
दुनिया की संकटापन्न भाषाओं के यूनेस्को एटलस के ऑनलाइन चैप्टर के अनुसार भारत की 197 भाषाएं ऐसी हैं जो असुरक्षित, लुप्तप्राय या विलुप्त हो चुकी हैं। विलुप्ति की कगार पर बैठी भाषाओं में अहोम, एंड्रो, रंगकस, सेंगमई, तोलछा आदि शामिल हैं। इनमें रंगकस, तोलछा आदि भाषाएं हिमालयी क्षेत्र में बोलीं जाती हैं।
उत्तराखण्ड प्रदेश गढ़वाल और कुमाऊं दो मण्डलों से बना है जिसके गढ़वाल मण्डल में गढ़वाली और कुमाऊं में कुमाऊंनी बोली जाती है। गढ़वाल मंडल की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 58,57,294 है। लेकिन गढ़वाली बोलने वाले 24,82,098 ही हैं। इसी प्रकार कुमाऊं की जनसंख्या 42,28,998 है, लेकिन जनगणना में केवल 20,81,057 ने अपनी भाषा कुमाऊंनी दर्ज कराई।
भाषाओं का संकट- छोटी मछलियों को निगलती बड़ी मछलियां
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सर्वाधिक खतरे में जनजातीय बोली-भाषाएं
देश की अधिकतर संकटापन्न भाषाएं जनजातियों की हैं। जनजातियों की भी कई उपजातियां होती हैं और उनकी उतनी ही अलग तरह की बोलियां होती है। मसलन उत्तराखण्ड में भोटिया जनजाति की जाड, मारछा, तोलछा, जोहारी, रं आदि उपजातियां और उनकी उतनी ही स्थानीय बोलियां हैं। उत्तर पूर्व की मुख्य जनजातियों में कुकी, आदी, निसी, अंगामी, भूटिया और गारो शामिल हैं। लेकिन इन 7 जनजातियों की भी लगभग 220 उपजातियां हैं और उन उपजातियों की उतनी ही बोली-भाषाएं हैं।
इनमें त्रिपुरा में चैमाल नाम की बोली या भाषा को बोलने वाले केवल 5 लोग ही कुछ वर्ष पूर्व तक बचे हुए थे। भाषाओं की सबसे खतरनाक स्थिति अण्डमान-निकोबार की है जहां जरावा, ग्रेट अण्डमानी, शोम्पेन, ओन्गे और सेंटेनलीज जनजातियों की जनसंख्या 500 से भी बहुत कम है।
इन सबकी अपनी अलग-अलग बोलियां हैं। यहां एक बो भाषा भी होती थी, जिसे बोलने वाली शेष एकमात्र महिला की 26 जनवरी 2010 को मौत होने के साथ ही लगभग 65 हजार साल पुरानी एक भाषा की भी मौत हो गई। उत्तराखण्ड में भी राजी जनजाति की आबादी लगभग 600 है और उनकी अपनी बोली है जिसका अस्तित्व संकट में है।
उत्तराखण्ड की अन्य जनजातियों में थारू और बुक्सा मैदानी होने के कारण उनकी भाषा हिन्दी है, लेकिन पहाड़ी जनजातियों में भोटिया, राजी, और जौनसारी की अपनी-अपनी मातृ बोलियां हैं। इनमें जौनसारी की तो अपनी लिपि तक रही है जो कि लुप्त हो चुकी है।
नवीनतम जनगणना के अनुसार उत्तराखण्ड में भाटिया जनजाति की जनसंख्या 39,106 है जिनमें से केवल 7,592 ने अपनी मातृभाषा भोटिया लिखा रखी है। इसी तरह 5,809 ने अपनी मातृभाषा हिन्दी, 5,765 ने गढ़वाली, 13 ने जौनसारी, 13,150 ने कुमाऊंनी और 88 ने पहाड़ी दर्ज करा रखी है। जौनसारी जनजाति के 88,664 लोगों में से 589 ने गढ़वाली, 8,547 ने हिन्दी और 78,477 ने जौनसारी और जौनपुरी तथा 584 ने बावरी को अपनी मातृभाषा दर्ज करा रखा है।
यूनेस्को का संवेदनशीलता वर्गीकरण
यूनेस्को ने भाषाओं की संवेदनशीलता के अनुसार भाषाओं का 5 वर्गों में कोटिकरण कर रखा है। इनमें से पहला वर्ग सुरक्षित भाषा का है जिसे सभी पीढ़ियों के लोग बोलते और समझते हैं। दूसरे वर्ग में उन संवेदनशील भाषाओं को रखा गया है, जिनको घर के बच्चे भी बोल सकते हैं मगर केवल घर में ही। खतरे वाले वर्ग में वे भाषाएं हैं, जिनको बच्चे अपने घर में मातृभाषा के रूप में प्रयोग नहीं करते।
गंभीर रूप से संकटापन्न वर्ग में वे भाषाएं हैं जिनको केवल घर के बुजुर्ग बोलते हैं। उनको वर्तमान पीढ़ी समझती तो है मगर अपने बच्चों के साथ उस भाषा का प्रयोग नहीं करती हैं। पांचवें वर्ग में वे अत्यन्त संकटापन्न भाषाएं हैं जिनका प्रयोग केवल दादा-दादी करते तो हैं मगर आंशिक रूप से तथा कभी-कभी ही।
प्लायन भी एक बड़ी समस्या
दरअसल भाषाओं का संकट नया नहीं है। इसका मुख्य वजह आर्थिक है जिसके कारण लोगों को अपना गांव और संस्कृति से कहीं दूर पलायन करना पड़ता है। जैसे उत्तराखण्ड के 25 लाख से अधिक लोग दिल्ली में रहते हैं। हिन्दी और अंग्रेजी जैसे सांस्कृतिक वर्चस्व वाली भाषाओं की प्रवृत्ति भी बोलियों को निगलने की होती है।
राजनीतिक गतिविधियां भी जिस भाषा में होती हैं उनका वर्चस्व उतना ही अधिक होता है और बोलियां पिछड़ जाती हैं। जहां-जहां तमिल, तेलगू, मलयालम और गुजराती जैसी भाषाएं राजभाषा के रूप में प्रयुक्त होती हैं वहां हिन्दी या अंग्रेजी जैसी भाषाएं उन्हें नहीं निगल पातीं। इसलिये जरूरी है कि सभी भाषाओं और बोलियों का संरक्षण हो और उन्हें राजकीय प्रोत्साहन मिलने के साथ ही सामाजिक संगठन भी प्रोत्साहित करें।
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