अब केवल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ही ऐसे हिमालयी प्रदेश रह गए हैं जिनको विकास की दृष्टि से हिमालयी बिरादरी से अलग-थलग रखा गया है- सांकेतिक तस्वीर
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- हिमालयवासियों पर आपदाओं की मार
केदारनाथ की जल प्रलय को हिमालय के पर्यावरणीय असंतुलन का सबसे बड़ा उदाहरण माना जा सकता है। इस आपदा के लिए समय से पहले मानसून के आ धमकने और केदारनाथ से भी कहीं ऊपर चोराबाड़ी ग्लेशियर पर बादल फटने को जिम्मेदार माना जाता है। जबकि इतनी ऊंचाई वाले क्रायोस्फीयर में वर्षा होने का पिछला कोई रिकार्ड नहीं है।
हिमालय में इस तरह की त्रासदियों का लंबा इतिहास है। लेकिन इन प्राकृतिक विप्लवों की फ्रीक्वेंसी में जो तेजी महसूस की जा रही है वह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। उत्तराखंड में 2010 में भी हालात काफी बदतर हो गये थे और दो साल बाद तो केदारनाथ के ऊपर ही बाढ़ आ गई।
हिमाचल प्रदेश की सतलुज नदी में भी एक बाद एक विनाशकारी बाढ़ आती रहीं हैं। अगस्त 2000 में जब सतलुज में बाढ़ आई तो नदी का जलस्तर सामान्य से 60 फुट तक उठ गया था। इसी तरह 26 जून 2005 की बाढ़ में सतलुज का जलसतर सामान्य से 15 मीटर तक उठ गया था।
इसके एक महीने के अंदर फिर सतलुज में त्वरित बाढ़ आ गई। दरअसल पहले रिमझिम बारिश होती थी। ज्यादा से ज्यादा बारिश की झड़ियां लगतीं थीं। लेकिन अब तो इन हिमालयी राज्यों में लगभग हर रोज कहीं न कहीं बादल फटने लगे हैं।
- एशिया की सभी प्रमुख नदियों का स्रोत
प्रकृति के नियमानुसार वहां पहुंची नमी सीधे वर्फ में बदल कर शिखरों पर बिछ जाती है। यही बर्फ सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र तक की नदियों को पानी देती है। अगर हिमालय का पारितंत्र गड़बड़ा गया तो प्रकृति की यह जलापूर्ति व्यवस्था भी गड़बडा़ जाएगी और इस असंतुलन से सूखा और केदारनाथ की बाढ़ जैसी विपदाएं आ जाएंगी जिनसे न केवल हिमालयवासी बल्कि चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल और भूटान की आबादी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित होगी।
एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में विश्व की 50 से लेकर 60 प्रतिशत तक आबादी निवास करती है। भारत में ही हिमालय से उद्गमित ब्रह्मपुत्र, गंगा और सिंधु के बेसिनों में देश का 43 प्रतिशत क्षेत्र आता है और देश की सभी नदियों के प्रवाहमान और भूमिगत जल राशि का 63 प्रतिशत इन तीनों नदियों में है।
इन नदियों को सदानीरा बनाए रखने में भारतीय हिमालय के पूर्व से लेकर पश्चिम तक में फैले लगभग 9575 छोटे बड़े ग्लेशियरों, हिम तालाबों, बुग्यालों और जंगलों का महत्वपूर्ण योगदान है। वैसे संपूर्ण हिंदूकुश-हिमालय में इसमें अंटार्कटिक और आर्कटिक के बाद सबसे अधिक वर्फ जमा है। इसरो की 2010 की रिपोर्ट के अनुसार सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन क्षेत्र के 71,182 वर्ग किमी क्षेत्र में 32,392 छोटे बड़े ग्लेशियर अनुमानित किए गए। इससे पहले 32,182 वर्ग किमी क्षेत्र में 16,117 ग्लेशियर अनुमानित थे जिनमें 3421 घन किमी वर्फ के जमाव अनुमान था।
- हिमालयवासियों को ग्रीन बोनस की दरकार
दरअसल विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस हिमालयी क्षेत्र के निवासियों की अपनी कुछ विशिष्ट कठिनाइयां भी हैं। इनका जीवन कठिन होने के साथ ही यहां औद्योगिक विकास के अवसरों में कमी के कारण रोजगार के अच्छे अवसरों का भी नितांत अभाव है। हिमालयी राज्यों के ऊपर पर्यावरण संबंधी विशिष्ट नियंत्रण के कारण भी यहां आधारभूत संरचना का विकास भी सीमित हो जाता है।
भारत सरकार की “उत्तर पूर्व की ओर देखो” या “लुक नॅार्थ ईस्ट” नीति के तहत हिमालय के उस हिस्से पर सरकार विशेष ध्यान देने लगी है। उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए केंद्र सरकार में अलग मंत्रालय बन चुका है। उसे डोनर मंत्रालय भी कहा जाता है।
इसी प्रकार उस हिमालयी क्षेत्र के लिए उत्तर पूर्व परिषद ( एनईसी) जैसी संस्था भारत सरकार और उत्तरपूर्वी राज्यों के बीच सीधी कड़ी का काम कर रही है। विशेष संवैधानिक प्रावधानों और सामरिक महत्व के कारण जम्मू-कश्मीर को पहले से ही विशेष दर्जा मिला हुआ है।
अब केवल उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ही ऐसे हिमालयी प्रदेश रह गए हैं जिनको विकास की दृष्टि से हिमालयी बिरादरी से अलग-थलग रखा गया है। इन राज्यों के हिमालय के पर्यावरण के संरक्षण में विशेष योगदान या अपने विकास की कीमत पर पर्यावरण की चैकीदारी का ग्रीन बोनस देने से भी भारत सरकार कतरा रही है।
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