लोगों की भीड़ अपने-अपने तरीकों से विरोध जाहिर कर रही थी। सड़क पर एक ओवरब्रिज भी है, जहां से मीडियाकर्मी तस्वीरें ले रहे थे। मैं भी अपने दोस्त के साथ ऊपर चढ़ने के लिए बढ़ा तो वहां खड़े एक स्वयंसेवी यानी वॉलिंटियर ने हमें रोक दिया। थोड़ा निवेदन के बाद उन्होंने हमें ऊपर जाने दिया। हालांकि बाद में उसने सॉरी भी कहा।
खैर, ओवरब्रिज से इस प्रदर्शन में उमड़ा जनसैलाब एक भव्य जनांदोलन की तरह लग रहा था, जैसा कि हमने किताबों में देखा-पढ़ा है।
मैंने उस वॉलेंटियर से जब पूछा कि आपने हमें जाने से क्यों रोका तो उनका कहना था कि कुछ असामाजिक तत्व भीड़ को उकसाने के लिए आपत्तिजनक चीजों के साथ यहां आए थे, लेकिन हमारी मुस्तैदी के कारण उन्हें सफलता नहीं मिली। हमारा मकसद शांतिपूर्ण प्रदर्शन का है और हमारी पूरी कोशिश है कि लोग उग्र न हों।
वॉलिंटियर की बातों को सुनकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा। मैंने उनसे पूछा कि यह आंदोलन और विरोध किसलिए, जबकि सरकार तो साफ कर चुकी है कि इस कानून से किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता खतरे में नहीं? इसपर उनका जवाब था कि देश में हजारों-लाखों लोग हैं, जो मूल रूप से भारतीय हैं, लेकिन उनके पास नागरिकता प्रमाणित करने के लिए कोई मूल दस्तावेज नहीं हैं। उदाहरण के लिए आप देश के 5वें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के परिवार को ही ले सकते हैं। उनके परिवार के लोग अपनी नागरिकता प्रमाणित नहीं कर पाए। उनके जैसे कई लोग हैं, जिस कारण हम सीएए और एनआरसी का विरोध कर रहे हैं।
उनके जवाब ने मुझे सोच में डाल दिया। मैं थोड़ी देर चुप रहा फिर सोचने लगा कि अगर सच में, अपनी नागरिकता प्रमाणित नहीं कर पाने वाले भारतीय लोगों को अगर ये देश छोड़ना पड़े तो कितना बुरा होगा।
इसके बाद मैंने एक अन्य वॉलिंटियर से पूछा कि क्या प्रदर्शन से कुछ सकरात्मक हो पाएगा? उनका जवाब था- मुझे नहीं पता कि इसका परिणाम हमें मिलेगा, लेकिन प्रदर्शन हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है सो हम वह कर रहे हैं।
उस ओवरब्रिज से मेरा ध्यान वहीं केंद्रित हो गया, जहां मुझे अनेकता में एकता दिख रही थी। न केवल मुस्लिम, बल्कि अलग-अलग धर्मों के लोग इस प्रदर्शन में दिखाई दे रहे थे। सिखों और हरियाणा छत्तीस बिरादरी समेत कई अलग-अलग समुदाय की ओर से लंगर चलाया जा रहा था।
रात 10 बजे तक घर लौटने की बात कह के आया था, लेकिन कब पौ फटने लगी, पता ही न चला। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए छात्र उर्दू के इंकलाबी शायर असरारुल हक मजाज का लिखा तराना गा रहे थे-
सरशार-ए-निगाह-ए-नर्गिस हूं, पा-बस्ता-ए-गेसू-ए-सुम्बुल हूं
ये मेरा चमन है, मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं
कुछ सवालों को लेकर मैं शाहीन बाग आया था, जिसके जवाब में भी कुछ सवालों को अपने साथ लेकर लौट रहा था।
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