कक्षा में मास्टर साहब छात्रों से कह रहे थे, लालच बुरी बला है। लालच से बचना चाहिए। सुहास बोला, पर मास्टर जी, हम तो बच्चे हैं। इस उम्र में बच्चे थोड़े-बहुत लालची होते ही हैं। मास्टर जी बोले, लालच की कोई उम्र नहीं होती, सुहास। लालची आदमी हमेशा लालची ही रहता है।
सुहास बोला, फिर हम लालच कैसे कम कर सकते हैं? मास्टर जी बोले, एक काम करो। पास में चॉकलेट की एक फैक्टरी है। वहां जाओ और जो चॉकलेट तुम्हें सबसे ज्यादा पसंद हो, वह ले आओ। चॉकलेट के पैसे मैं दूंगा। पर शर्त यह है कि तुम एक ही चॉकलेट उठा सकते हो और एक बार आगे बढ़ गए, तो पीछे नहीं जा सकते। यह सुनकर सुहास भागता हुआ चॉकलेट की फैक्टरी में पहुंचा और गेट पर मास्टर जी का नाम बताकर अंदर चला गया। वहां एक से बढ़कर एक चॉकलेट रखी हुई थी।
घुसते ही पहले उसे लॉलीपॉप दिखी। सुहास ने सोचा, यह तो मैं रोज खाता हूं, आज कुछ नया देखता हूं। आगे उसे एक मिल्की बार दिखी। उसने सोचा, है तो यह अच्छी, पर क्या पता, आगे और भी अच्छी चॉकलेट हों। आगे उसे कुछ नई तरह की चॉकलेट दिखाई दी।
पर अपने मन को समझाकर वह आगे बढ़ गया। आगे बढ़ते-बढ़ते वह फैक्टरी के अंतिम द्वार पर पहुंच गया। सारी अच्छी चॉकलेटें पीछे रह गईं और उसके हाथ कुछ भी न लग पाया। वह मायूस होकर अपने क्लास पहुंचा। मास्टर जी ने पूछा, कौन-सी चॉकलेट ली? सुहास बोला, मास्टर जी, आगे और भी अच्छी चॉकलेट मिल जाए, इस चक्कर में मैं फैक्टरी के अंतिम दरवाजे पर पहुंच गया।
मास्टर जी बोले, बेटा, इसी को लालच कहते हैं। जो हमारे सामने होता है, हम उसे यह कहकर अनदेखा कर देते हैं कि मेरे लिए तो इससे बड़ा कुछ नियत है।