कितनी प्रतिभावान लड़कियां होंगी जो ऐसे माहौल में दबकर घर ठहर गई होंगी?
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अब सोचिए ये भविष्य तो हम देख रहे हैं किंतु उस वर्तमान से कैसे निजात पाएं जो भारत की हुनरमंद लड़कियों को घर से बाहर झेलना पड़ता है। पुरुष प्रधानता एक बात है किंतु लड़कियों के साथ रोज होने वाली ऐसी घटनाएं जो उन्हें हतोत्साहित कर देती हैं, उनके मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं, उनके आत्मविश्वास को डिगा देती हैं ऐसी करतूतों में लिप्त पुरुष कितना नपुंसक होता है, ये समझा जा सकता है। ये पुरुष प्रधानता का सबसे घिनौना रूप है।
लड़कियों की उस वेदना को कितना जानते हैंं आप?
कितनी प्रतिभावान लड़कियां होंगी जो ऐसे माहौल में दबकर घर ठहर गई होंगी? कितनी लड़कियां इस देश के लिए कुछ कर दिखा सकती हैं जो इन आवारा लड़कों के कारण अपने कदम समेटने पर मजबूर हो जाती हैं।
आज यदि कोई मैरीकॉम या लवलीना या महिला हॉकी टीम की लड़कियां ओलम्पिक में करिश्मा कर लौटी हैं तो क्या उनके अतीत में वे ऐसी घटनाओं से बच पाई होंगी? सविता जो दुनिया की सबसे शानदार गोलकीपर के रूप में उभर कर सामने आई हैं उनके पिता ने तो स्पष्ट कह दिया किन्तु कितने ही पिता कुछ कह ही नहीं पाते, कितनी लड़कियां कुछ कह ही नहीं पाती।
ये गंभीर समस्या है इस देश की। ताने सुन कर भी तमगे लाकर जो देश का मान सम्मान बढ़ाती हैं सोचिए यदि खुला स्वच्छ और उन्मुक्त आसमान उन्हें मिले तो उनकी उड़ान तिरंगे से पूरे विश्व को ढंक देने की क्षमता रखती है।
स्मरण रखिए संगीत हो या खेल हो उसकी तान साधने के लिए कड़ी मेहनत होती है। ताने मारना तो आसान है। पर ये नया भारत है और ऐसे लोग तमगों से तमाचे खाने के लिए भी तैयार रहें।
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