राखाल दास बनर्जी 1922 में एक बौद्ध स्तूप की खुदाई कर रहे थे तो उनके हाथ मोहेंजोदड़ो का यह ख़ज़ाना हाथ लगा था। उन्हें कुछ मुद्राएं हाथ लगी थीं। लेकिन उनकी रिपोर्ट जैसे ठन्डे बस्ते में डाल दी गई।
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भारतीय समाज की श्रेष्ठता
सिंधु सभ्यता की ख़ास बात यह थी कि हिन्दुस्तान ने अपनी सामाजिक परंपराओं और रहन-सहन को हज़ारों साल बाद भी सुरक्षित रखा था और वह कुछ बदलावों को छोड़कर उसी तरह रहता था। अंगरेज़ इतिहासकार ए.एल. बाशम अपने ग्रन्थ द वंडर दैट वाज़ इंडिया में लिखते हैं-
मिस्त्र ,मेसोपोटामिया और यूनान की सभ्यताओं से वहां का वर्तमान समाज पूरी तरह कटा हुआ है मगर भारत ने आज भी अपने वैदिक और पौराणिक ज्ञान को सुरक्षित रखा है। चूंकि अंगरेजों ने सत्ता के सारे सूत्र अपने हाथ में ले रखे थे इसलिए बाद का इतिहास भी कमोबेश उनको श्रेय देते हुए बढ़ता है। पर मेरी कोशिश होगी कि भारतीय विद्वानों की अनदेखी नहीं हो।
इसके मुताबिक़ 1783 में विलियम जोन्स ने इस सिलसिले की शुरुआत की। वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे। वे हिन्दुस्तानी संस्कृति से वाकई प्रभावित थे। उन्होंने हिन्दुस्तान आकर हिंदी,संस्कृत,अरबी,फ़ारसी ,तुर्की और हिब्रू जैसी एक भाषाओँ का ज्ञान प्राप्त किया। जोन्स ने ही 1784 में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की। उनके ही प्रयास थे ,जिस कारण यूरोप में संस्कृत के ग्रंथों में दिलचस्पी बढ़ी। एशियाटिक सोसायटी से बाद में एक नौजवान अफसर जेम्स प्रिंसेप जुड़ा। वह सोसायटी का सचिव था और कलकत्ता की टकसाल का प्रभारी था। उसने पहली बार ब्राह्मी लिपि का अध्ययन किया और सम्राट अशोक के शिलालेख पढ़ने में क़ामयाबी पाई।
इसी जेम्स प्रिंसेप की टीम में एलेक्ज़ेंडर कनिंघम थे ,जिन्हें भारतीय पुरातत्व का जन्मदाता मान लिया गया। जब अंगरेज़ हुकूमत ने 1862 में याने कोई एक सौ उनसठ साल पहले भारत के पहले पुरातत्व निरीक्षक का पद बनाया तो उस पर एलेक्ज़ेंडर कनिंघम नियुक्त हुए। यहां से भारतीय पुरातत्व का विधिवत सफ़र शुरू होता है। कनिंघम के कार्यकाल में प्राचीन इमारतों को पढ़ा गया ,शिलालेखों का अनुवाद हुआ और हिन्दुस्तान में पुरातात्विक खुदाई का आग़ाज़ हुआ।
जब कर्ज़न वाईसरॉय बने तो 1901 से पुरातत्व खोज में कुछ सुधार और विस्तार हुआ। उन्होंने ही विभाग के प्रधान संचालक के पद पर जॉन मार्शल को नियुक्त किया। इन्हीं मार्शल महोदय ने माधोस्वरूप वत्स की मदद से सिंधु सभ्यता को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। राखाल दास बनर्जी का योगदान हाशिए पर चला गया।
सिंधु सभ्यता के केंद्र मोहेंजोदड़ो से 1922 में आर डी बनर्जी ने कुछ मुद्राएं प्राप्त कीं। खुदाई चलती रही। अवशेष मिलते रहे। लगभग इसी समय कनिंघम ने हड़प्पा में भी कुछ मुद्राएं हासिल कीं। अब इन दोनों के बीच के संबंध और ज़मीन में दबी सभ्यता के मिल रहे अवशेषों का अध्ययन कर निष्कर्षों पर काम करना बाक़ी था। ( जारी )
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