आपातकाल: 1977 के आम चुनाव में इंदिराजी को भुगतना पड़ा। वे खुद हारीं और कांग्रेस भी सत्ता से बाहर हो गई।
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क्या किसी ने ऐसी मांग की थी, क्या यह केवल वाम पंथियों का समर्थन हासिल करने और उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर करने की चाल थी? क्योंकि उस वक्त भी हिंदू राष्ट्र की बात करने वाली तत्कालीन जनसंघ ( अब भाजपा) की राजनीतिक शक्ति बहुत कम थी। 1971 की प्रचंड इंदिरा लहर में जनसंघ के मात्र 22 सांसद चुनकर आए थे और आरएसएस प्रेरित जनसंघ का वोट प्रतिशत भी मात्र 7.3 था। जो इसके पूर्ववर्ती 1967 के लोस चुनावों की तुलना में और घट गया था। आपातकाल में और भी कई ज्यादतियां हुईं।
इसका नतीजा 1977 के आम चुनाव में इंदिराजी को भुगतना पड़ा। वे खुद हारीं और कांग्रेस भी सत्ता से बाहर हो गई। 1980 के चुनाव के पहले इंदिराजी को अपनी गलती का अहसास हुआ। लेकिन तब तक देश की राजनीति का रंग बदलने लगा था। इंदिराजी दोबारा पूरी ताकत से सत्ता में लौटीं और आपातकाल की कहानियां धीरे-धीरे हाशिए पर जाने लगीं। यहां तक कि 1999 में जब देश में अटलजी के नेतृत्व में एनडीए सरकार थी, तब भी आपातकाल की 25 वीं बरसी को वैसी तवज्जो नहीं मिली, जिस तरीके से मोदी सरकार ने अब 50 वीं बरसी पर इसे हवा दी है।
नए लोस स्पीकर ने कुर्सी संभालते ही आपातकाल के दौरान राजनीतिक प्रताड़ना के कारण जान गंवाने वालों को सदन में श्रद्धांजलि दी। जिसका कांग्रेस को छो़ड़कर सभी ने समर्थन किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने अभिभाषण में आपातकाल के काले दिनो का जिक्र किया। मप्र सरकार ने आपातकाल को स्कूली पाठ्य क्रम में शामिल करने का ऐलान किया। मध्यप्रदेश में मीसाबंदियों को लोकतंत्र सेनानी मानकर उन्हें 30 हजार रू. प्रतिमाह की पेंशन भी दी जाती है। मीसाबंदियो को लोकतंत्र सेनानियों की संज्ञा दी गई। क्योंकि उन्होंने स्वदेशी सत्ता और निरंकुशता के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
निश्चय ही कांग्रेस उन ‘काले दिनो’ को याद नहीं करना चाहती, जबकि भाजपा की चाल यही है कि संविधान बचाने की बात करने वाली कांग्रेस को आपातकाल का आईना बार बार दिखाकर वो मूल संविधान याद दिलाया जाए जो 1976 के संशोधन के पहले का है। यानी भाजपा अतीत का रियर ग्लास दिखाकर सत्ता की गाड़ी आगे हांकना चाहती है तो कांग्रेस नीयत के दर्पण में भाजपा को आईना दिखाकर राजनीतिक बाधा दौड़ जीतना चाहती है तो कांग्रेस का प्रयास उस भय को मेग्नीफाई करने का है कि जिस दिन भाजपा के पास निरंकुश सत्ता होगी, वह संविधान को ‘मनुस्मृति’ में तब्दील करने में देर नहीं करेगी। इसलिए यह बार बार कहा जा रहा है कि देश में दस साल से अघोषित आपातकाल है, जो घोषित आपातकाल से भी बदतर है। जबकि सत्य इन दोनो के बीच कहीं है।
इमरजेंसी पर रक्षात्मक दिखने वाली कांग्रेस ‘संविधान बचाने’ की रणनीति पर अभी और आगे बढ़ सकती है। क्योंकि इसी साल तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं।
‘संविधान बचाओ’ का नारा इनमे कितना चलेगा, यह देखने की बात है। अमूमन चुनावी ‘काठ की हांडी’ की तरह एक बार ही चढ़ते हैं। जो मुद्दा एक चुनाव में चल गया, वो दूसरे में भी चले, यह जरूरी नहीं है। फिर इतिहास के गड़े मुर्दे हर बार सियासी दलों के अनुकूल बोली ही बोलें, यह भी कम ही होता है।
जनता का रोष एक बार निकलने के बाद उसी मुद्दे पर उसमें दोबारा जोश भरना आसान नहीं है। फिर भी चुनावी हानि लाभ से हटकर अच्छी बात यह है कि कुछ बुनियादी मसलों और प्रतिबद्धताओं पर तीखी बहस हो रही है, इस पर कौन कितना खरा उतरता है, यह जल्द ही पता चल जाएगा।
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