पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का जब भी जिक्र होता है, आधुनिक भारत में दोनों ही इलाकों के प्रति अजीब तरह का उपेक्षा बोध झलकता है। पौराणिक और आध्यात्मिक इतिहास को एक पल के लिए परे रख दें...इस माटी का हालिया इतिहास आधुनिक भारतीय राष्ट्र को बनाने वाले प्रकरणों से भरा पड़ा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी के एक-एक कण के इतिहास पर शोध किया जाएगा तो हजारों-लाखों गर्वीली घटनाएं सामने आ खड़ी होंगी।
पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक जिला है बलिया...भदेस भाषा, मंगल पांडेय और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अलावा भी इसका अपना अलग इतिहास है। अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करने वाले ‘करेंगे या मरेंगे’ के गांधी के आह्वान के बाद देश की जिन चुनिंदा जगहों ने अपने शौर्य और पराक्रम के बल पर 1942 में खुद को आजाद कर लिया था, उनमें से एक बलिया भी है।
आज से ठीक 78 साल पहले बलिया की माटी ने वह गर्वीला इतिहास रचा था, जिसने ब्रिटिश सरकार को सोच में डाल दिया। भारत की आजादी से पांच साल पहले अंग्रेजों की गुलामी से खुद को मुक्त करने वाले बलिया आजादी की सांस चंद दिनों तक ही ले पाया था। ब्रिटिश राज के हथियारबंद दस्तों के सामने यह आजादी महज एक हफ्ते ही रही।
लेकिन अंग्रेजों की नजर में बलिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का क्या महत्व था, इसी अंदाज लगाया जा सकता है कि जब हफ्तेभर बाद क्रूर अंग्रेज अधिकारी नेदरसोल की अगुआई में अंग्रेजी सेनाओं ने बलिया पर अंग्रेजी शासन का नियंत्रण स्थापित किया तो ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन यानी बीबीसी को अपनी अंग्रेजी बुलेटिन में बताना पड़ा कि बलिया पर फिर से कब्जा हो गया है।
बलिया की अगस्त क्रांति के एक सेनानी रहे हैं देवेंद्र नाथ उपाध्याय। बलिया के सिकंदरपुर इलाके के नजदीक स्थित मलेजी गांव के उपाध्याय ने बाद के दिनों में अंग्रेजी शासन का अत्याचार झेला। उन्होंने बलिया जेल में बंदी के दौरान बलिया की इस आजादी को लेकर एक किताब लिखी थी, ‘बलिया में क्रांति और दमन। इलाहाबाद से प्रकाशित इस किताब में बलिया में छिड़े आजादी के संघर्ष का लोमहर्षक वर्णन किया गया है।
दुर्भाग्यवश 171 की पृष्ठ की इस किताब के 148 पृष्ठों वाला हिस्सा ही हाथ लग पाया है। 1946 प्रथम साक्षी की नजर से लिखी अपनी पुस्तक की भूमिका में उपाध्याय लिखते हैं, “बलिया में क्रांति का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि यदि किसी को धीरज हो तो वह एक-एक गांव का अलग-अलग इतिहास लिख सकता है।”
आठ अगस्त को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान पर हुए अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया था। यही ग्वालिया टैंक मैदान आज मुंबई के आजाद मैदान के नाम से ख्यात है। उस प्रस्ताव के पारित होने के बाद नौ अगस्त की सुबह से ही कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां होने लगी थीं।
इतिहासकारों ने लिखा है कि गांधी जी उस दिन गिरफ्तारी के मौके पर ‘करो या मरो’ का संदेश दिया था। हालांकि आजादी के आंदोलन की सत्तरवीं वर्षगांठ पर दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में एक प्रदर्शनी लगी थी, उस प्रदर्शनी में गांधी जी का लिखा हुआ वह चिट भी रखा गया था, जिस पर उन्होंने गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस जनों को संदेश देते हुए लिखा था, ‘करेंगे या मरेंगे..’
बहरहाल बलिया में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारियों की खबर शाम को रेडियो के जरिए पहुंच गई थी। इस वजह से माहौल में तनाव बढ़ गया था। लेकिन इसे गति मिली अगली सुबह बलिया पहुंचे बनारस से छपने वाले अखबारों से...जिसमें दैनिक आज प्रमुख था। इसके बाद देखते ही देखते बलिया के छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया।
बलिया के कांग्रेस दफ्तर पर कांग्रेसी जुटे तो उन्हें पीटकर अंग्रेज पुलिस ने भगा दिया। दिलचस्प यह है कि जिस समय बलिया में यह आंदोलन छिड़ा, वहां के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक दोनों ही भारतीय ही थे। तब बलिया के डीएम जे निगम थे तो पुलिस अधीक्षक थे रियाजुद्दीन शेख। दिलचस्प यह है कि बलिया के तहसीलदार भी भारतीय थे। उनका नाम था ठाकुर रामलगन सिंह। आज लोगों को हैरत होगी, लेकिन इन्हीं अधिकारियों के कहने पर बलिया में आंदोलनकारियों पर जमकर अत्याचार हुआ।
अमृत लाल नागर ने बलिया की इस क्रांति पर एक कहानी लिखी है। बरसों पहले हरेकृष्ण देवसरे के संपादन में निकलने वाली टाइम्स समूह की पत्रिका पराग में वह कहानी प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था, ‘बलिया के बाबा।’ वह कहानी ऐतिहासिक तथ्यों के साथ ही श्रुति परंपरा के इतिहास पर भी आधारित है।