फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ब्रिटिश हुकूमत से बलिया की आजादी की कहानी: 78 साल पहले रचा था बलिया ने इतिहास

विज्ञापन
भारत की आजादी से पांच साल पहले अंग्रेजों की गुलामी से खुद को मुक्त करने वाले बलिया आजादी की सांस चंद दिनों तक ही ले पाया था- फाइल फोटो - फोटो : Getty Images
विज्ञापन

पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार का जब भी जिक्र होता है, आधुनिक भारत में दोनों ही इलाकों के प्रति अजीब तरह का उपेक्षा बोध झलकता है। पौराणिक और आध्यात्मिक इतिहास को एक पल के लिए परे रख दें...इस माटी का हालिया इतिहास आधुनिक भारतीय राष्ट्र को बनाने वाले प्रकरणों से भरा पड़ा है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी के एक-एक कण के इतिहास पर शोध किया जाएगा तो हजारों-लाखों गर्वीली घटनाएं सामने आ खड़ी होंगी। 

विज्ञापन


पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक जिला है बलिया...भदेस भाषा, मंगल पांडेय और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अलावा भी इसका अपना अलग इतिहास है। अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर करने वाले ‘करेंगे या मरेंगे’ के गांधी के आह्वान के बाद देश की जिन चुनिंदा जगहों ने अपने शौर्य और पराक्रम के बल पर 1942 में खुद को आजाद कर लिया था, उनमें से एक बलिया भी है। 


आज से ठीक 78 साल पहले बलिया की माटी ने वह गर्वीला इतिहास रचा था, जिसने ब्रिटिश सरकार को सोच में डाल दिया। भारत की आजादी से पांच साल पहले अंग्रेजों की गुलामी से खुद को मुक्त करने वाले बलिया आजादी की सांस चंद दिनों तक ही ले पाया था। ब्रिटिश राज के हथियारबंद दस्तों के सामने यह आजादी महज एक हफ्ते ही रही। 
विज्ञापन


लेकिन अंग्रेजों की नजर में बलिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करने का क्या महत्व था, इसी अंदाज लगाया जा सकता है कि जब हफ्तेभर बाद क्रूर अंग्रेज अधिकारी नेदरसोल की अगुआई में अंग्रेजी सेनाओं ने बलिया पर अंग्रेजी शासन का नियंत्रण स्थापित किया तो ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग  कॉरपोरेशन यानी बीबीसी को अपनी अंग्रेजी बुलेटिन में बताना पड़ा कि बलिया पर फिर से कब्जा हो गया है। 

बलिया की अगस्त क्रांति के एक सेनानी रहे हैं देवेंद्र नाथ उपाध्याय। बलिया के सिकंदरपुर इलाके के नजदीक स्थित मलेजी गांव के उपाध्याय ने बाद के दिनों में अंग्रेजी शासन का अत्याचार झेला। उन्होंने बलिया जेल में बंदी के दौरान बलिया की इस आजादी को लेकर एक किताब लिखी थी, ‘बलिया में क्रांति और दमन। इलाहाबाद से प्रकाशित इस किताब में बलिया में छिड़े आजादी के संघर्ष का लोमहर्षक वर्णन किया गया है। 

दुर्भाग्यवश 171 की पृष्ठ की इस किताब के 148 पृष्ठों वाला हिस्सा ही हाथ लग पाया है। 1946 प्रथम साक्षी की नजर से लिखी अपनी पुस्तक की भूमिका में उपाध्याय लिखते हैं, “बलिया में क्रांति का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि यदि किसी को धीरज हो तो वह एक-एक गांव का अलग-अलग इतिहास लिख सकता है।”

आठ अगस्त को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान पर हुए अधिवेशन में कांग्रेस ने ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव पारित किया था। यही ग्वालिया टैंक मैदान आज मुंबई के आजाद मैदान के नाम से ख्यात है। उस प्रस्ताव के पारित होने के बाद नौ अगस्त की सुबह से ही कांग्रेस नेताओं की गिरफ्तारियां होने लगी थीं। 

इतिहासकारों ने लिखा है कि गांधी जी उस दिन गिरफ्तारी के मौके पर ‘करो या मरो’ का संदेश दिया था। हालांकि आजादी के आंदोलन की सत्तरवीं वर्षगांठ पर दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में एक प्रदर्शनी लगी थी, उस प्रदर्शनी में गांधी जी का लिखा हुआ वह चिट भी रखा गया था, जिस पर उन्होंने गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस जनों को संदेश देते हुए लिखा था, ‘करेंगे या मरेंगे..’

बहरहाल बलिया में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारियों की खबर शाम को रेडियो के जरिए पहुंच गई थी। इस वजह से माहौल में तनाव बढ़ गया था। लेकिन इसे गति मिली अगली सुबह बलिया पहुंचे बनारस से छपने वाले अखबारों से...जिसमें दैनिक आज प्रमुख था। इसके बाद देखते ही देखते बलिया के छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया। 

बलिया के कांग्रेस दफ्तर पर कांग्रेसी जुटे तो उन्हें पीटकर अंग्रेज पुलिस ने भगा दिया। दिलचस्प यह है कि जिस समय बलिया में यह आंदोलन छिड़ा, वहां के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक दोनों ही भारतीय ही थे। तब बलिया के डीएम जे निगम थे तो पुलिस अधीक्षक थे रियाजुद्दीन शेख। दिलचस्प यह है कि बलिया के तहसीलदार भी भारतीय थे। उनका नाम था ठाकुर रामलगन सिंह। आज लोगों को हैरत होगी, लेकिन इन्हीं अधिकारियों के कहने पर बलिया में आंदोलनकारियों पर जमकर अत्याचार हुआ। 

अमृत लाल नागर ने बलिया की इस क्रांति पर एक कहानी लिखी है। बरसों पहले हरेकृष्ण देवसरे के संपादन में निकलने वाली टाइम्स समूह की पत्रिका पराग में वह कहानी प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक था, ‘बलिया के बाबा।’ वह कहानी ऐतिहासिक तथ्यों के साथ ही श्रुति परंपरा के इतिहास पर भी आधारित है।

देखते ही देखते पूरे बलिया में युवाओं ने क्रांति का मोर्चा संभाल लिया...

गांधी जी के संदेश ‘करेंगे या मरेंगे’ ने युवाओं में जबरद्स्त जोश भर दिया था- फाइल फोटो - फोटो : Getty Images
बहरहाल, बलिया में पहले और दूसरे दिन के आंदोलन की अगुआई उस दौर के छात्र नेता तारकेश्वर पांडेय, राम लक्षण तिवारी आदि ने की। क्योंकि तब बलिया के सभी प्रमुख कांग्रेसी नेता मसलन चित्तू पांडेय, राधामोहन सिंह, विश्वनाथ चौबे, जानकी प्रसाद शर्मा गिरफ्तार कर लिए गए थे।

बलिया में दस अगस्त को छात्रों द्वारा बुलाई गई हड़ताल को कुचलने का मोर्चा तहसीलदार रामलगन सिंह ने संभाला था। उनकी अगुआई में जहां भी आंदोलनकारी दिखे, वहीं उन्हें पीटा गया। 

रेलवे लाइन के समक्ष छात्रों के जुलूस को पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो छात्रों की ओर से रेल पटरियों पर रखी गिट्टियों से मुकाबला किया। इसे देखते हुए बलिया शहर में रात साढ़े सात बजे से लेकर सुबह छह बजे तक के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया। 

लेकिन क्रांति की चिंगारी सुलग चुकी थी। गांधी जी के संदेश ‘करेंगे या मरेंगे’ ने युवाओं में जबरद्स्त जोश भर दिया था। इसमें आग भरने का काम इलाहाबाद और वाराणसी के स्टेशनों से चली रेलगाड़ियों ने खूब किया। जो दो रूटों से बलिया और बेल्थरा रोड 14-15 अगस्त को पहुंची।

इलाहाबाद से चली ट्रेन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र थे, जो बेल्थरारोड के रूट पर पहुंची तो बलिया आने वाली ट्रेन में वाराणसी के काशी हिंदू विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ के छात्र भरे पड़े थे। उन छात्रों ने बलिया के लोगों को प्रेरित किया। 

देखते ही देखते पूरे बलिया में युवाओं ने क्रांति का मोर्चा संभाल लिया। सहतवार, बांसडीह, सिकंदरपुर, उभांव, चिलकहर, हलधरपुर आदि थानों पर या तो कांग्रेसी तिरंगा फहरा दिया गया। बलिया और बांसडीह की दोनों तहसीलों को पंद्रह –सोलह अगस्त के दौरान लूट लिया गया। रेल की पटरियां उखाड़ डाली गईं। 

उन दिनों का प्रमुख नारे थे,
एक-दो,
लाल पगड़ी फेंक दो।
 
एक-दो-तीन,
लाल पगड़ी छीन।
 
एक-दो-तीन-चार,
लाल पगड़ी फाड़ डाल।
 

इस आंदोलन को उग्र बनाने में जिले के नौजवानों का बड़ा हाथ था। उन्होंने गांव-गांव फैले उन रईसों की बंदूकें इकट्ठा करने का अभियान चलाया, जिनके पास तब बंदूकें थीं। कुछ ने राष्ट्रीय धारा में बहकर खुद ही बंदूकें दे दीं तो कुछ से युवाओं ने जबरदस्ती छीन लिया। 

13 से 18 अगस्त के बीच जिले के सभी डाकघर, रेलवे स्टेशन लूट लिए गए। सहतवार और बांसडीह थाने में आग लगा दी गई। नरहीं के थाने को भी लूट लिया गया। शुरू में अधिकारियों ने आंदोलनकारियों को रोकने की कोशिश की, लेकिन इससे आजादी के मतवालों का गुस्सा भड़क उठा।

बलिया को गुस्से में भरने में 18 अगस्त को रसड़ा और बैरिया थाने पर हुई घटनाओं ने बड़ी भूमिका निभाई। बैरिया थाने पर नौजवानों के जत्थों ने तिरंगा फहराने की तत्कालीन भारतीय मुस्लिम थानेदार से अनुमति मांगी। लेकिन उन्होंने अनुमति नहीं दी। बाद में उसने षड्यंत्र के तहत अनुमति दी...नारायण गढ़ निवासी कौशल किशोर सिंह नाम के बीस साल के नौजवान ने तिरंगा फहराने के लिए नौजवानों के साथ आगे बढ़े, लेकिन उन्हें पुलिस ने गोली मार दी। 

कौशल के रक्त से रंगा वह तिरंगा बलिया के अभिलेखागार रखा हुआ। लेकिन गोलियों की बौछार से तीन तरफ से थाने को घेर कर खड़ी भीड़ के गुस्से को बढ़ाने में आग में घी की तरह काम किया। देखते ही देखते बाइस लोग यहां शहीद हो गए, लेकिन लोगों ने थाने पर तिरंगा फहराकर दम लिया।

थाने के एक तरफ पानी भरा हुआ था। धाराधार बरसात हो रही थी। पूरे इलाके में जिसने भी सुना कि थाने पर इतने लोग वीरगति को प्राप्त हो गए हैं, वह थाने की ओर बढ़ चला। लोगों ने इसके बावजूद थाने में मौजूद पुलिसवालों के परिवारों से बदसलूकी नहीं की। लोगों को लगा कि थाने को तीन ओर से घेरा गया है, लिहाजा थाने में ही पुलिस वाले होंगे। लेकिन भीड़ के भय से पानी में कूदकर थाने के कर्मचारी भाग निकले। 
विज्ञापन

18 अगस्त को जिला मजिस्ट्रेट ने सभी जिम्मेदार अधिकारियों और संभ्रांत नागरिकों की बैठक बुलाई...

रिहा हुए नेताओं का भीड़ ने विजेताओं की तरह स्वागत किया- फाइल फोटो - फोटो : social media
इसी तरह 18 अगस्त को ही रसड़ा थाने पर बीस लोग पुलिस की गोलियों के शिकार बने। इसके बाद पूरे जिले की जनता सड़कों पर उतर आई। जगह-जगह पुलिस वालों को घेरा जाने लगा। देखते ही देखते पूरे जिले के थानों के कर्मचारी पुलिस लाइन पहुंच गए। फिर भी वे उद्विग्न थे।

इस बीच इन आंदोलनकारियों को रोकने के लिए जिला प्रशासन ने बातचीत का रास्ता खोला। बलिया के जिला मजिस्ट्रेट ने 16 अगस्त को जिले के संभ्रांत नागरिकों की बैठक ली और उनसे जेल में बंद कांग्रेस नेताओं की आंदोलन को लेकर राय जाननी चाही। यह जिम्मेदारी जिला परिषद के सचिव श्यामसुंदर उपाध्याय को दी। उन्होंने जेल में नेताओं से मिलकर अपनी रिपोर्ट 17 को जिला मजिस्ट्रेट को दी। जिसमें उन्होंने कहा कि जन-जन जेल जाने को तैयार है। इस बीच बलिया में गिरफ्तारियां जारी रहीं।

17 अगस्त को बलिया के तत्कालीन एसडीएम ओवैस और शहर कोतवाल नादिर अली ने जेल में बंद ठाकुर राधामोहन सिंह से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि वे बलिया में पंचायती राज व्यवस्था के तहत सरकार चलाएंगे और अंग्रेजी सरकार के अधिकारी भी उनका सम्मान करें। 18 अगस्त को खुद जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक ने जेल में बंद कांग्रेस नेताओं से मुलाकात की। 

तब राधामोहन सिंह ने कहा था कि आजाद हिंदुस्तान में पंचायती राज व्यवस्था से शासन चलेगा और आपको भी वहीं से आदेश मिलेगा। फिर उन्होंने बलिया में पंचायती शासन स्थापित करने की अपनी मंशा दोहराई। तब निराशा और गुस्से से भरे जिला मजिस्ट्रेट ने कहा था, ‘ऐसा होगा तो आपको फांसी होगी और मेरा सत्यानाश हो जाएगा।’

जिला मजिस्ट्रेट के ऐसा कहने के बावजूद राधामोहन सिंह नहीं झुके। ‘क्रांति में यही सब होता है।’ राधामोहन सिंह का जवाब था..

18 अगस्त को जिला मजिस्ट्रेट ने सभी जिम्मेदार अधिकारियों और संभ्रांत नागरिकों की बैठक बुलाई। उसमें उन्हें सलाह दी गई कि जेल में बंद में कांग्रेस नेताओं को रिहा करके उनसे शांति स्थापित करने में मदद मांगी जाए। लेकिन जे निगम नहीं माने। उन्होंने बनारस स्थित अपने बॉस कमिश्नर के पास तहसीलदार रामलगन सिंह को भेजा और कुमुक भेजने की अपील की।

लेकिन बलिया से बनारस जाने वाली रेलवे लाइन उखाड़ दी गई थी। लिहाजा पुलिस और फौज तत्काल पहुंचना संभव ही नहीं था। इस बीच 19 अगस्त को बलिया जिला मुख्यालय आने वाली चारों प्रमुख शहरों पर चारों तरफ से करीब साठ हजार लोगों की भीड़ जुट आई। इसके बाद जिला प्रशासन ने कांग्रेस नेताओं के सामने समर्पण कर दिया। 

बलिया के कोषागार को कांग्रेस का कोषागार बना दिया गया। जिला जेल से कांग्रेस के नेताओं को रिहा करा दिया गया। रिहा हुए नेताओं का भीड़ ने विजेताओं की तरह स्वागत किया। चित्तू पांडे को बलिया की आजाद सरकार का प्रमुख बना दिया गया। 

शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय की अगुआई में जिले में करीब हफ्ते भर तक पंचायती व्यवस्था से सरकार चलती रही। गांव-गांव सुराजियों ने खुद पहरा दिया।
बलिया में सर्वत्र शांति रही। बलिया की शांति पर ग्रहण तब लगा, जब क्रूर अंग्रेज सेनाधिकारी नेदरसोल की अगुआई में गंगा के रास्ते 25 अगस्त की रात अंग्रेजी सेनाएं पहुंचीं। 

इसके बाद गांव-गांव अत्याचारों का तांडव शुरू हुआ, जो 1944 तक जारी रहा। हर गांव पर जुर्माना लगाया गया। सरकारी संपत्ति को नुकसान की भरपाई के लिए जो लोग जुर्माना ना दे सके, उन्हें जेलों में ठूंस दिया गया या फिर उनकी खेती-किसानी पर कब्जा कर लिया गया।

बलिया तब-तक त्राहि-त्राहि करता रहा, जब तक कि 1944 में फिरोज गांधी बलिया नहीं पहुंचे। बलिया पहुंचे फिरोज गांधी ने तांगे से यात्रा करके गांव-गांव की अत्याचारों की कहानियां सुनीं। पीड़ितों को कानूनी सहायता मुहैया कराने के लिए तत्कालीन वकील मुरली मनोहर श्रीवास्तव की अगुआई में वकीलों की टीम तैयार की। बलिया इस लिहाज से फिरोज गांधी का शुक्रगुजार है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें