भाजपा की इस जीत से भारतीय प्रतिपक्ष को अपनी दुर्बल काया को दूर करने का उपाय ढूंढना ही चाहिए।
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विपक्ष का संघर्ष और उसके लिए सबक
जहां तक प्रतिपक्ष के संघर्ष का सवाल है, तो उत्तर प्रदेश में उसका अति आत्मविश्वास घातक बन गया। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव बंगाल में ममता बनर्जी की तरह जुझारूपन नहीं दिखा सके। हो सकता है कि इसके पीछे बंगाल में ममता बनर्जी का सत्ता में होना रहा हो। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के पिछले कार्यकाल की कड़वी यादें मतदाताओं के मन में बनी रहीं।
दरअसल, सियासत में अक्सर अतीत का प्रेत लंबे समय तक मंडराता रहता है। अखिलेश भी उसका शिकार बन गए। भले ही उनके पुराने समझौते परिणाम नहीं दे पाए मगर इस बार भी उन्हें अन्य विपक्षी दलों को साथ में लेना था।
पंजाब में अकाली दल इस बार भी कोई चमत्कार नहीं दिखा सका। अलबत्ता दिल्ली से आए एक नवोदित क्षेत्रीय दल ने बाज़ी मार ली। इसका अर्थ यह भी है कि सिख मतदाता ने बुजुर्ग प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे को नकार दिया और अपेक्षाकृत एक कलाकार सिख चेहरे को स्वीकार किया।
इधर, अन्य तीन प्रदेशों में भी कांग्रेस ही मुख्य विपक्ष थी और कहने में हिचक नहीं कि इन राज्यों में कांग्रेस ने चुनाव गंभीरता से नहीं लिया । उसकी लड़ने की जुझारू क्षमता कहीं विलुप्त हो गई है।
तो अब इन पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव के परिणाम आने वाले दिनों के क्या सियासी संकेत देते हैं। लोकसभा के अगले चुनाव से पहले दस राज्यों में इस बरस और अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। सत्तारूढ़ अपने विजयी चेहरे के साथ उनमें प्रस्तुत होगी जबकि विपक्ष पराजित और एक तरह से हताश मुद्रा में सामने होगा। उसे ध्यान देना होगा कि अब बीजेपी जैसी हाईटेक प्रचार संसाधन युक्त पार्टी से उसका मुक़ाबला है,जो पूरे साल चुनावी मुद्रा में रहती है।
गुजरात और हिमाचल में इस साल और मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में अगले बरस चुनाव होंगे। यानी पूरब, पश्चिम, मध्य और दक्षिण भारत में होने वाले यह चुनाव विपक्ष के लिए लिटमस टेस्ट होगा।
स्वस्थ्य लोकतंत्र की सेहत पक्ष के साथ साथ विपक्ष के भी तंदुरुस्त होने पर निर्भर करती है। ऐसी सूरत में भारतीय प्रतिपक्ष को अपनी दुर्बल काया को दूर करने का उपाय ढूंढना ही चाहिए।