कांग्रेस को बड़ी चुनौती दे रही है आम आदमी पार्टी
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चुनाव परिणामों के दौरान ही दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने जो कहा, उसे कांग्रेस आला कमान ने ठीक से सुना या नहीं, पता नहीं। केजरीवाल ने छाती ठोक कर कहा था कि अब आम आदमी पार्टी ही कांग्रेस का सच्चा विकल्प है।
आप ने लगाई तगड़ी सेंध
‘आप’ ने पंजाब में कांग्रेस से सत्ता छीनी तो गोवा और उत्तराखंड में कांग्रेस के वोट में तगड़ी सेंध लगाई। यही काम आगे वो दूसरे राज्यों में भी करेगी। आप की रणनीति साफ है, वो घोर वामपंथियों और धुर दक्षिण पंथियों से समान डिस्टेंसिंग बनाकर चल रही है। हालांकि ये दांव सभी जगह चले, जरूरी नहीं है।
उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी बहन प्रियंका गांधी को सौंपकर यह माहौल बनाने की कोशिश की गई कि भाई न चले तो बहन जिम्मेदारी संभाल सकती है। बेशक प्रियंका एक गंभीर और मेहनती नेत्री हैं। यूपी में उन्होंने महिलाओ को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद करने की यथासंभव कोशिश भी की। लेकिन नतीजों का निहितार्थ यही है कि खुद महिलाओं ने भी उनके ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे को खास तवज्जो नहीं दी।
यहां अहम सवाल यह है कि इन नतीजों के बाद भी कांग्रेस में कोई सार्थक और रचनात्मक हलचल होगी या नहीं ? अगर सफलता का सेहरा पार्टी नेतृत्व के सिर बंधता है तो हार का ठीकरा भी वहीं क्यों नहीं फूटना चाहिए? दरअसल पंजाब में वहां का राजनीतिक बैटिंग ऑर्डर समझे नवजोत सिंह सिद्धू को बैटिंग सौंपना उतारना गंभीर सियासी भूल थी।
जिस तरह सिद्धू को आला कमान से शह मिल रही थी, उससे साफ था कि उसे पंजाब की सियासी तासीर की सही जानकारी ही नहीं है। जमीन पर क्या हो रहा है, उसका अंदाजा ही नहीं है। कांग्रेस में आला कमान का मतलब आज की तारीख में प्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी और परोक्ष रूप से राहुल और प्रियंका गांधी हैं। बाकी सब झांझ-मंजीरे वाले हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में करारी के तीन साल बाद भी पार्टी अब तक पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं चुन सकी है।
नेतृत्व को लेकर अब भी सवाल जस का तस
नेतृत्व का पास गांधी परिवार में ही एक से दूसरे को दिया जाता रहा है। एक जमाने में चक्रवर्ती की तरह पूरे भारत पर राज करने वाली कांग्रेस यह समझने को ही तैयार नहीं है, उसका मुकाबला पहले तो उस भाजपा से है, जो चुनाव साम-दाम-दंड-भेद के आधार पर लड़ती है और दूसरी अब आम आदमी पार्टी है, जो गुमनाम से चेहरों में नई ऊर्जा फूंक रही है।
वैसे कांग्रेस में एग्जिट पोल के बाद ही राहुल-प्रियंका को ‘बचाने’ की मुहिम शुरू हो गई थी, लेकिन यह पार्टी की शुतुरमुर्गी मुद्रा है। कांग्रेस नेतृत्व के लिए बड़ा सबक (अगर लेना चाहें) यह है कि अधूरे मन और संशकित भाव से किया गया कोई काम अंजाम तक नहीं पहुंचता। सामने आकर जिम्मेदारी लें और उसे निभाएं भीं। वरना कांग्रेस अब कुल ढाई राज्यों ( राजस्थान, छत्तीसगढ़ और आंशिक रूप से महाराष्ट्र) में बची है, वहां भी उल्टी गिनती शुरू होने में देर नहीं लगेगी।
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