आचार्य नरेंद्र देव के राजनीतिक जीवन में कई मोड़ आए। कांग्रेस में रहते हुए वे सन् 1937 में संयुक्त प्रांत से विधानसभा के सदस्य रहे। सन् 1946 में विधानसभा के निर्विरोध सदस्य चुने गए। सन् 1948 में नासिक सम्मेलन में कांग्रेस पार्टी और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर गांधी के मृत्यु के तीन महीने बाद समाजवादी पार्टी में चले गए।
हालांकि कहा यह भी जाता है कि वे कांग्रेस पार्टी से अलग नहीं होना चाहते थे। पर आचार्य जी कांग्रेस छोड़ते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कांग्रेस अब वह मोर्चा नहीं रह गया, जहां हर तरह की विचारधारा के लिए जगह हो। गांधी जी भी कुछ ऐसा ही सोचेते होंगे। वे चाहते थे कि कांग्रेस को विसर्जित कर ' लोक सेवक संघ' बना देना चाहिए।
कांग्रेस देश की आजादी के आंदोलन के लिए बनी पार्टी थी। गांधी की राय में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रचनात्मक कामों में लगना चाहिए। गांधी की इस मंशा को जाहिर करते हुए उनके जीवनीकार अमरीकी पत्रकार लुई फिशर बताते हैं कि-
'जब सरकार और दल एक ही होते हैं, तो दल केवल रबड़ की मुहर बन जाता है और उसका अस्तित्व काल्पनिक हो जाता है।' भारत में आजादी के बाद लोकतंत्र कैसे बना रह सकता है- यह गांधी के सोच का विषय रहा है। इस वजह से वे कांग्रेस को अपनी राय से अवगत भी कराते रहे हैं।
15 नवंबर 1947 को कांग्रेस महासमिति की बैठक हुई। इस बैठक में आचार्य जे. बी. कृपलानी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की सूचना देते हैं। कांग्रेस महासमिति की इस बैठक में महात्मा गांधी भी उपस्थित थे। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना था।
महात्मा गांधी का यह मौनवार था। महात्मा गांधी ने एक चिट पर अपने उम्मीदवार का नाम लिखकर जवाहरलाल नेहरू को दिया। जब चिट खोलकर नेहरू ने पढ़ा तो वह नाम आचार्य नरेंद्र देव का था। पहले तो नेहरू भी नरेंद्र देव के नाम पर सहमत थे, बाद में पलट गए।
नेहरू और सरदार पटेल के उम्मीदवार बाबू राजेंद्र प्रसाद बने। शुरुआती ना-नुकुर के बाद राजेंद्र बाबू राजी हो गए। कांग्रेस के वहीं अध्यक्ष हुए। जरा सोचिए कि उस वक्त अगर आचार्य नरेंद्र देव कांग्रेस के अध्यक्ष हो गए होते तो अपने देश के नवजात लोकतंत्र में सत्ता और संगठन का कैसा स्वरूप भविष्य में उभरता?
और देश की सताधारी पार्टी सरकार की महज जीहजूरी और एकतरफा तरफदारी के बजाय अंकुश का भी काम करती। जो कहना न होगा कि लोकतंत्र जड़ को मजबूत ही करता। आज देश में ऐसे विचारों के लिए कोई जगह नहीं दिखती। जाहिर है इससे देश के लोकतांत्रिक सेहत पर दूरगामी असर पड़ेगा। ऐस वक्त बार-बार आचार्य नरेंद्र देव याद आएंगे।
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