एक जमाने में कांग्रेस के मूल मतदाताओं को बीजेपी, सपा और बसपा ने बांट लिया था। अब प्रशांत किशोर प्रयास कर रहे हैं कि मतदाताओं का यह खजाना वापस कांग्रेस के हाथ नहीं लगे। इसी योजना के तहत पहले उन्हें कांग्रेस में प्रवेश कराया जाता। फिर चुनावी रणनीतिकार बनाकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा मैदान से हटने के लिए आलाकमान को मनाया जाता।
यह तर्क दिया जाता कि कांग्रेस अपना ध्यान चौबीस के लोकसभा चुनाव पर लगाए और बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाए। लेकिन इस योजना की भनक कांग्रेस को मिल गई और यह गुप्त योजना टांय टांय फिस्स हो गई।
प्रसंग के तौर पर बता दूं कि प्रशांत किशोर का तृणमूल कांग्रेस के साथ अनुबंध बढ़ा दिया गया है। अलबत्ता बीच में एक शून्यकाल आया था, जब प्रशांत किशोर कांग्रेस में आना चाहते थे और बिहार में फ्री हैंड चाहते थे। पर, यह दाल नहीं गली। इसके बाद बीते बीस पच्चीस दिनों में उन्होंने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की तीखी आलोचना की है।
अर्थ लगाया जाना चाहिए कि उनकी यह आलोचना किन दलों को रास आ सकती है। समझा जा सकता है कि प्रियंका की सक्रियता से अन्य दल क्यों घबराए हुए हैं।कांग्रेस का इकलौता मिशन यही हो सकता है कि वह अपने पुश्तैनी प्रदेश में हिल रही नींव को मजबूत करे। यह नींव जितनी सुदृढ़ होगी, प्रादेशिक दल उतने ही कमजोर होंगे। इसे ध्यान में रखते हुए 'एकला चलो रे' ही कांग्रेस का मूल मंत्र हो सकता है।
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