पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में होने वाले किसी भी चुनाव का राष्ट्र की मुख्यधारा की राजनीति में कोई खास असर नहीं होता। मीडिया में भी इन चुनावों को दूसरे राज्यों के मुकाबले बहुत कम जगह मिलती है। लेकिन असम में चुनाव जीत कर और अरुणाचल प्रदेश में पूरी सरकार के पाला बदलने की वजह से वे इन राज्यों में सत्ता पर काबिज हैं। पूर्वोत्तर में पांव पसारने की रणनीति के तहत अब उनकी निगाहें मणिपुर पर है। इसी अकेली वजह ने इस बार महज 60 विधानसभा सीटों वाले इस चुनाव को अहम बना दिया है।
राज्य में बीते 15 वर्षों से कांग्रेस की सरकार है और ओकराम ईबोबी सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं। अब इन चुनावों के मौके पर निगाह डालते हैं राज्य की राजनीति के कुछ अहम चेहरों पर जो 11 मार्च के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल सकते हैं।
69 साल के ईबोबी सिंह सात मार्च, 2002 यानी बीते कोई 15 साल से लगातार इस उग्रवादग्रस्त राज्य के मुख्यमंत्री हैं। एक गरीब परिवार में पैदा होने और आठ भाई-बहनों के बीच पलने-बढ़ने वाले सिंह ने अपनी मेहनत और लगन के बूते जो मुकाम हासिल किया है उसकी मिसाल मणिपुर की राजनीति में देखने को नहीं मिलती। उनको कांग्रेस आलाकमान का भी पूरा समर्थन हासिल है।
बीते विधानसभा चुनावों में प्रतिष्ठान विरोधी लहर को मात देते हुए उन्होंने अपनी पार्टी कांग्रेस को 60 में से 42 सीटें दिलाते हुए जीत की हैट्रिक पूरी की थी। ईबोबी सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने बीते महीने राज्य में सात नए जिलों का गठन कर तुरुप की चाल चल दी है। इससे जहां नगा संगठन उनके खिलाफ हो गए हैं वहीं ईबोबी को राज्य के बहुसंख्यक मैतेयी तबके का पूरा समर्थन मिलने की उम्मीद है।
नोंगथोमबाम बीरेन सिंह हो सकते हैं बीजेपी उम्मीदवार
नोंगथोमबाम बीरेन सिंह, बीजेपी, नेता
पत्रकारिता से राजनीति में आए नोंगथोमबाम बीरेन सिंह भाजपा को बहुमत मिलने की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रमुख दावेदार के तौर पर उभर सकते हैं। 56 साल के बीरेन को हाल तक मुख्यमंत्री ईबोबी सिंह का दाहिना हाथ माना जाता था। लेकिन बीते साल के आखिर में उन्होंने कांग्रेस से नाता तोड़ कर भाजपा का दामन थाम लिया था।
वर्ष 2002 में डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी ( डीआरपीपी) के टिकट पर जीत कर पहली बार विधायक बनने वाले बीरेन को अगले साल यानी 2003 में मंत्री बनाया गया था। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और वर्ष 2007 में भी उन्होंने अपनी सीट बहाल रखी।
बीते साल अक्तूबर में मुख्यमंत्री से बढ़ते मतभेदों के बीच उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उसके साथ ही कांग्रेस से नाता तोड़कर वे भाजपा में शामिल हो गए। राज्य की राजनीति में अपने ऊंचे कद की वजह से राजनीतिक हलकों में भाजपा को बहुमत मिलने की स्थिति में उनको मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। लेकिन भाजपा यहां नेतृत्व के सवाल पर अंदरूनी गुटबाजी से परेशान हैं और यही बात बीरेन को मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर कर सकती है।
इरोम शर्मिला भी उतरीं चुनावी मैदान में
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- फोटो : ANI
मणिपुर की लौह महिला के नाम से मशहूर चानू इरोम शर्मिला राजनीति की नई खिलाड़ी हैं। लेकिन राज्य में शर्मिला की लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उनको हलके नहीं लिया जा सकता। इस बार वे पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस (पीआरएजेए) नामक नई राजनीतिक पार्टी के साथ मैदान में हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री ईबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने का एलान कर दिया है।
वर्ष 1980 से ही राज्य में लागू सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के खिलाफ लंबे अरसे तक भूख हड़ताल करने वाली शर्मिला के मैदान में उतरने से तमाम दलों के राजनीतिक समीकरणों को गड़बड़ा सकते हैं। शायद यही वजह है कि ईबोबी सिंह के मुकाबले एक कद्दावर नेता और नए चेहरे की तलाश कर रही भाजपा उनको अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही है। हाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से उनकी मुलाकात से इन कयासों को बल मिला है। हालांकि शर्मिला ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।