अंग्रेजी हुकूमत में बने पुल पर दौड़ती थी मीटर गेज लाइन ट्रेेनें
मियाद निकल जाने पर चार दशक तक उठाया ट्रेन-वाहनों का बोझ
पूर्वोत्तर रेलवे की तस्वीर में अब कछला का पुराना रेल पुल नजर नहीं आएगा। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान करीब सवा सौ साल पहले बने मीटरगेज लाइन के रेल पुल के अस्तित्व पर उसी दिन से सवाल उठने लगे थे जब ब्रॉडगेज की लाइन पड़ी। बरेली-कासगंज के बीच ब्रॉडगेज लाइन पर नया पुल बनने के बाद ट्रेनें इस पर चलने लगी हैं। करीब एक साल के बाद रेलवे ने पुराने पुल को हटाने का काम शुरू कर दिया है।
जीवनदायनी के कछला स्थित तट पर बना यह पुल इसलिए भी यादगार रहा कि इसी के जरिए ट्रेनों में सफर कर अनगिनत लोगों ने कुमाऊं की हसीं वादियों और आगरा में प्रेम की अनूठी मिसाल ताज के दीदार किए थे। मीटरगेज लाइन की मरुधर, आगरा फोर्ट और रुहेलखंड सरीखी एक्सप्रेस ट्रेनों ने भी लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजों के जमाने के पुल का सहारा लिया। जानकारों की मानें तो पुल की मियाद करीब 80 साल घोषित की गई थी लेकिन ट्रेन और वाहनों का बोझ उसने तीन दशक बाद तक उठाया। चार साल पहले तक बरेली-मथुरा हाईवे का जोड़ने वाला यही इकलौता पुल था। पुराने पुल से पटरियों और लोहे के मोटे गॉडर को उखाड़ने में जुटे मजूदरों की मानें तो दो महीना के अंदर सभी सामान समेट लिया जाएगा। रेलवे ने इसके लिए एक कंपनी को ठेका दिया था।
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पुल के नजदीक जमींदोज है एक्सप्रेस का इंजन
उझानी। करीब छह साल पहले पूर्वोत्तर रेलवे की मीटरगेज लाइन पर बाढ़ के दिनों में रुहेलखंड एक्सप्रेस हादसे का शिकार हो गई थी। कासगंज से चलकर बरेली जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन का इंजन पुल पर पहुंचने से करीब एक किलोमीटर पहले ही पानी से क्षतिग्रस्त ट्रैक की चपेट में आ गया था। हादसे में कई लोग घायल हो गए थे लेकिन चालक को जान से हाथ धोना पड़ गया था। रेलवे अफसरों ने रुहेलखंड एक्सप्रेस के इंजन को निकलवाने की बजाय मौके पर ही जमींदोज करा दिया था।
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ताउम्र याद रहेगा पुराना पुल
इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाले मीटरगेज लाइन के पुराने पुल से तमाम लोगों की यादें भी जुड़ी हैं। घाट के आसपास रहने वाले कई लोगों ने उसके फोटो भी खिचवा कर रख लिए हैं। पुल के पास बनी मठिया पर रोजाना पूजन करने वाले आश्रम के संचालक हरीओम बाबा कहते हैं कि लोगों के दिलो दिमाग पर यह पुल अमिट छाप छोड़ चुका है।