चंडीगढ़। रेडियो की महत्ता अपनी जगह है। पहले रेडियो से सूचना और मनोरंजन दोनों मिलते थे। भाषा की शुद्धता थी। एक-एक शब्द को बोलने पर विशेष ध्यान दिया जाता था। एक शब्द से दूसरे शब्द के बीच कितना देर का ठहराव हो, यह सब बहुत जरूरी था। पुरानी शैली में बदलाव हुआ है। लोग अब अपनी गाड़ियों में टीवी देखते हैं और रेडियो सुनते हैं। वक्त के अनुुसार बोलने वालों में बदलाव आया है। पहले फिल्म अभिनेता रोडियो स्टेशन तक आते थे, लेकिन अब वह सब बदल गया हे।
रेडियो उद्घोषकों से बातचीत
रेडियो का महत्व अपनी जगह है
नमस्कार, श्रोताओं का हार्दिक स्वागत, एक बार फिर हाजिर हूं, आपके कार्यक्रम लेकर। उम्मीद है आपको अच्छा लगेगा। यह बात अभी भी रेडियो पर सुनाई पड़ती है। रेडियो की महत्ता अपनी जगह है। समय के साथ चलने से साथ बढ़ता जाता है। अभी भी बड़ी संख्या में लोग रेडियो से जुड़े हैं। थोड़ी वेरायटी कम होने से लोगों का रुझान कम हुआ है, लेकिन श्रोता अभी भी हैं। लोग मोबाइल पर भी रेडियो से जुड़े रहते हैं। रेडियो के उद्घोषक की भाषा उनकी आवाज की पहचान है। लोग उनकी आवाज और कार्यक्रम का इंतजार करते हैं। ऐसा तब होता है, जब ऐसा कार्यक्रम हो, जिसके अंत में ऐसी बात को छोड़कर जाया जाए कि अगले एपिसोड में आपकी आवाज का इंजतार रहे। यह अभी भी है।
-पुनीता बावा, कैजुअल उद्घोषक रेडियो चंडीगढ़
रेडियो सुनने वालों की कमी नहीं
रेडियो सुनने वालों की कमी नहीं है, लेकिन भाषा की शुद्धता में कमी जरूर आई है। प्राइवेट एएफएम में हिंदी के साथ अंग्रेजी व अन्य शब्दों का प्रयोग बढ़ गया है। इसमें भाषा की शुद्धता का मापदंड नहीं है, लेकिन पहले रेडियो से सीखते थे। देश के प्रधानमंत्री तक रेडियो सुना करते थे। जब टीवी और दूरदर्शन नहीं था, तब रेडियो ठीक फार्म में था। बड़े-बड़े अभिनेता रेडियो स्टेशन तक आते थे। जब मैं मुंबई में विविध भारती में था तो बड़े-बड़े अभिनेताओं शशिजी, शम्मी कपूर, अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा का साक्षात्कार किया। अब वह बात नहीं रही। पहले रेडियो से सूचना ओर मनोरंजन दोनों मिलते थे। आवाज की गुणवत्ता में बदलाव हुआ है। आवाज के अनुसार उनके फैन्स थे।
-विजय वशिष्ठ, वरिष्ठ उद्घोषक सेवानिवृत्त ऑल इंडिया रेडियो
रेडियो जिंदा है और जिंदा रहेगा
रेडियो जिंदा है और हमेशा जिंदा रहेगा। टीवी पर तो हमें वह जो चाहते हैं, देखना पड़ता है, लेकिन रेडियो ऐसा नहीं हे। रेडियो थिएटर ऑफ माइंड है। यह एक जगह से दूसरे जगह टेली पोर्ट करने का काम करता है। बचपन से रेडियो सुनते आ रहे हैं। पहली बार वर्ष 2002 में ऑल इंडिया पर आधे घंटे का कार्यक्रम किया था। फिर एक महीने में 10 से 12 कार्यक्रम करने लगे। रेडियो में थीम बेस्ड कार्यक्रम होता है। रेडियो से अब रेडियो जॉकी अकादमी शुरू की है। तीन भाषाओं हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी में बोलते हैं। अमेरिका से रेडियो जॉकी की ट्रेनिंग ली है।
-हरदीप सिंह चांदपुरी, फाउंडर, रेडियो बज्ज एंड अकादमी आफ ब्रॉडकास्टिंग