हिसार के गांव भैणी अमीरपुर की रहने वाली सुनीता आज दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बनकर सामने आई हैं। कभी एक-एक पैसे को तरसती थी, लेकिन आज स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर हर सीजन में ढाई लाख रुपये कमा रही हैं। उनका उद्देश्य दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित करना है।
किसी समय एक-एक पैसे के लिए तरसने वाली गांव भैणी अमीरपुर की रहने वाली सुनीता देवी आज हर सीजन में दो से ढाई लाख रुपये कमा रही है। घर की चहारदीवारी से निकलकर सुनीता ने पहले हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में बाजरे से बने लड्डू से लेकर स्वादिष्ट व्यंजन बनाने सीखे। इनके चर्चे संसद भवन तक हैं। इतना ही नहीं आज सुनीता 2000 महिलाओं के लिए आइकॉन तक बन चुकी हैं। सुनीता बताती हैं कि 9 साल पहले एकमात्र कमरे में सात सदस्य एक साथ रहते थे, लेकिन मैंने हार नही मानी और सेल्फ हेल्प ग्रुप से शुरुआत की। अपने साथ-साथ गांव की महिलाओं को व्यावसायिक काम करने के लिए प्रोत्साहित किया।
दूसरी महिलाओं को मोटिवेट करना ही उद्देश्य
सुनीता ने बताया कि मैं सेल्फ हेल्प ग्रुप में सोशल वर्क का काम करती हूं। मेरा उद्देश्य यह है कि गांव की जो अनपढ़, बेरोजगार महिलाएं काम करने की इच्छुक हैं, उनको मोटिवेट करना है, ताकि वे घर के कामों के साथ-साथ व्यावसायिक काम कर सकें। मेरा मानना है कि महिलाएं अगर घर में रहकर चूल्हे-चौके से सारा काम संभाल सकती हैं, तो वे कुछ भी कर सकती हैं। घर में रहकर परिवार संभालने वाली एक औरत घर से बाहर निकलकर व्यावसायिक कामों को भी कर सकती है। वे कहती हैं कि ऐसी महिलाएं, जो बाहर काम करना चाहती थी या घर में रहकर अपना कोई काम शुरू करना चाहती हैं, तो उनके परिवार वालों को उनका साथ देना चाहिए।
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एचएयू में सीखा था बाजरे के लड्डू बनाना
वर्ष 2013 में हरियाणा ग्रामीण आजीविका मिशन योजना के बारे में डीपीएम वीरेंद्र श्योराण ने बताया और एचएयू से बाजरे के प्रोडेक्ट की ट्रेनिंग दिलवाई। ट्रेनिंग के दौरान बाजरे से बने प्रोडक्ट पर काम किया। जैसे बाजरे के लड्डू बनाना, नमकीन बिस्कुट, मटर, मठ्ठी आदि। उसके बाद सेल्फ हेल्प ग्रुप में 10 महिलाओं ने काम करना शुरू किया। वर्ष 2016 में प्रोडक्ट को संसद भवन तक पहुंचाया गया। आज मेरे साथ करीब 2000 महिलाएं अपना अलग-अलग काम कर रही हैं। सीजन के समय अलग-अलग जगहों पर लगने वाले मेलों में स्टाल लगाकर सामान बेचती हैं। दुकानदार ऑर्डर कर प्रोडक्ट बनवाते हैं।
पति का साथ मिला तो लोगों की बदल दी सोच
सुनीता बताती हैं कि जब मैंने इस काम की शुरुआत की थी, तो पड़ोसी और गांव के लोग कहते थे कि औरत को घर रहकर काम संभालना चाहिए, न कि बाहर जाकर काम करना चाहिए। मगर मेरे पति ने मेरा साथ दिया। उनके मिले सहयोग से आज मैंने उन लोगों की सोच को भी बदल दिया है।