पीजीआई के पर्यावरण विज्ञान विशेषज्ञ रविंद्र खैवाल ने बताया कि हर साल एक नवंबर से पराली जलाने की घटनाएं कम होनी शुरू हो जाती थीं और 15 तक खत्म हो जाती थीं लेकिन इस बार 15 नवंबर से कम होने के आसार हैं। कारण है, मानसून का इस बार देरी से आना और देरी से जाना। उन्होंने बताया कि पराली से निकलने वाले कण को हवा से निकलने में कम से कम 7 से 28 दिन का वक्त लगता है।
अगले 10 दिन बारिश के आसार नहीं
पर्यावरण विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से राहत तभी मिलेगी, जब बारिश होगी लेकिन अगले 10 दिन तक बारिश की कोई संभावना नहीं है। इसलिए ये स्थिति ऐसे ही बनी रहेगी। हालांकि, 15 नवंबर के बाद पराली जलने की घटनाएं कम होंगी तो वायु प्रदूषण धीरे-धीरे कम होगा। जो बड़े कण हैं, उनसे छुटकारा जल्द मिल जाएगा लेकिन छोटे कण को हवा से हटने में समय लगता है।
- कब पंजाब-हरियाणा में कितनी जगह जलाई गई पराली
- तीन नवंबर 2653
- चार नवंबर 3205
- पांच नवंबर 6008
- छह नवंबर 4307
- सात नवंबर 4810
- आठ नवंबर 4685
- नौ नवंबर 5200
हरियाणा-पंजाब में कहां कितना प्रदूषण
- जिला वायु गुणवत्ता सूचकांक
- कैथल 418
- जींद 406
- फरीदाबाद (सेक्टर-11) 462
- करनाल 344
- पानीपत 388
- पटियाला 315
- लुधियाना 303
- चंडीगढ़ 126
- पंचकूला 112
(मंगलवार शाम 5 बजे तक के आंकड़े)
ऐसे तय की जाती है श्रेणी
एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) को 0-50 के बीच ‘बेहतर’, 51-100 के बीच ‘संतोषजनक’, 101 से 200 के बीच ‘सामान्य’, 201 से 300 के बीच ‘खराब’, 301 से 400 के बीच ‘बहुत खराब’ और 401 से 500 के बीच ‘गंभीर’ माना जाता है।