7 मई 1933 को कश्मीर में पैदा हुईं कुमारी चन्द्रकांता खोसला के पिता लक्ष्मी नारायण खोसला जम्मू कश्मीर के वन अधिकारी थे। बचपन से ही सितार की तरफ उनका रुझान था। यही कारण है कि जीसीजी में संगीत सिखाते समय वे कोलकाता से खुद ‘सुरबहार’ बनवाकर लाई थीं जो आज भी वहां बड़े सम्मान के साथ रखा है।
सितार की विधिवत शिक्षा प्रारंभ में श्रीनगर के जिया लाल बसंत और शंभुनाथ सोपरी से मिली। तत्पश्चात उमाशंकर जो पंडित रविशंकर के पटशिष्य रहे, से 10 वर्ष तक सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तदोपरांत उस्ताद इनायत खां के पटशिष्य बिमलकांत राय चौधरी से घरानेदार इमदादखानी बात की शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने बीए आनर्स और एम. म्यूजिक की परीक्षा प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से की। इनका जीवन कठिनाइयों से भरा था।
चन्द्रकांता जब 14 वर्ष की थीं तो इनके पिता जम्मू स्थानांतरित हो गए और यह परिवार सहित चंडीगढ़ सेक्टर 9 में आ गईं। कुमारी चंद्रकांता संगीत सीखने के लिए पंडित उमाशंकर मिश्र जोकि पं. रविशंकर जी के पटशिष्य रहे हैं और दिल्ली रहते थे, के संपर्क में आ गईं। उस समय जब लड़कियों का बाहर निकलना अच्छा नहीं समझा जाता था कुमारी खोसला धुन की पक्की होने के कारण हर रविवार 250 किलोमीटर का सफर तय करके चंडीगढ़ से दिल्ली सितार सीखने जाया करती थीं और रात को लौट आती थीं। इन्होंने सेक्टर 11, जीसीजी चंडीगढ़ के संगीत विभाग में 31 वर्ष सेवाएं दीं। विभागाध्यक्ष के रूप में 15 वर्ष तक सफल प्रशासिका के रूप में कार्य किया। इन्होंने पीयू में प्री यूनिवर्सिटी से एम.फिल तक सिस्टम इंस्ट्रूमेंट म्यूजिक का सिलेबस तक बनाया है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ख्याति प्राप्त महिलाओं की परिचयात्मक पुस्तक एशियाज हू इज हू इंडियन वूमन इंटरनेशनल में इनके व्यक्तित्व का उल्लेख किया गया है। इन्होंने अपनी विलक्षण वादन शैली एवं सृजनशीलता के माध्यम से सितार की 100 से अधिक विविध गतों का रचनाकार्य किया है। हाल ही में 5 जनवरी 2020 को अमृतसर की आर्ट गैलरी में अग्निपथ आयोजित एक विशेष संगीतिक कार्यक्रम में उन्हें संगीत सम्राट तानसेन कला से विभूषित किया गया है।