विकलांगों को सम्मान देने के लिए दिव्यांग कहना भले शुरू कर दिया गया है, लेकिन इससे उनकी समस्याओं में कोई कमी नहीं आई है। चंडीगढ़ के दिव्यांगों को घर से बाहर निकलते ही हर कदम पर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। पार्क, मार्केट, डिस्पेंसरी, सरकारी दफ्तर समेत अधिकतर सार्वजनिक जगहों पर दिव्यांगों के लिए जरूरी सुविधाओं का अभाव है। अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया है कि स्मार्ट सिटी दिव्यांगों के लिए फ्रेंडली नहीं है।
निट्टर के लॉ अफसर जसपाल सिंह ने बताया कि वह शहर के दो क्लीनिक लैब में गए, वहां व्हील चेयर की सुविधा नहीं थी। यह समस्या लगभग हर जगह है। उन्होंने बताया कि लेबर कोर्ट में काफी मजदूर आते हैं, जो दिव्यांग होते हैं। वहां पर सुनवाई पहले फ्लोर पर होती है लेकिन न तो कोई रैंप है, न लिफ्ट है। सिर्फ सीढ़ियां हैं। ऐसे में उनके सामने बहुत बड़ी समस्या होती है कि वह पहले फ्लोर तक कैसे पहुंचे। प्रशासन को इस बारे में सोचना चाहिए और व्यवस्था करनी चाहिए।
प्रशासन को दिव्यांगों की सुविधा का ख्याल सिर्फ विशेष दिन पर ही आता है। यही कारण है कि प्रशासन चुनाव के दौरान वोट डलवाने के लिए दिव्यांगों को मतदान केंद्र स्थल पर रैंप बनाने के आदेश संबंधितों को जारी कर देता है लेकिन दिव्यांग पूरे साल भर कितने सरकारी कार्यालयों व सार्वजनिक स्थलों पर रैंप न होने से परेशान होता है, इसे कोई नहीं देखता है। ये हालत तब है, जब पीडब्ल्यूडी अधिनियम 1995 में ही बन गया था और 7 फरवरी 1996 से लागू कर दिया गया। इसमें दिव्यांग लोगों के लिए समान अवसर और राष्ट्र के निर्माण में उनकी पूर्ण भागीदारी की बात कही गई है।
दिव्यांगों के लिए इमारत व सभी जगहें फ्रेंडली होनी चाहिए। चंडीगढ़ में कई इमारतों में रैंप है ताकि दिव्यांगों को कोई समस्या न आए। फिर भी अगर किसी इमारत में दिव्यांगों को समस्या आ रही है तो दूर कराने का प्रयास किया जाएगा। - धर्मपाल, सलाहकार, यूटी प्रशासक