चंडीगढ़। एक शोध के मुताबिक देश में 35 फीसदी मर्द चालीस वर्ष की उम्र से पहले और 20 फीसदी उम्र के किसी न किसी पड़ाव पर यौन समस्या से पीड़ित हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 42 फीसदी पुरुष डॉक्टरों द्वारा लिखित दवाइयां छोड़ सस्ते उपचार का विकल्प तलाशते हैं जो उनके लिए घातक सिद्ध हो रहा है। ये बातें पीजीआई यूरोलॉजी विभाग के प्रो. संतोष कुमार ने विश्व यौन स्वास्थ्य दिवस पर रविवार को प्रेस क्लब में कहीं।
प्रो. संतोष कुमार ने कहा कि नपुंसकता के प्रति भ्रमित 75 फीसदी पुरुष और 66 फीसदी महिलाएं अपनी उम्र को इसका बड़ा कारण मानती हैं। यौन शिक्षा के अभाव में घर टूट रहे हैं। दंपती अलग हो रहे हैं। 28 फीसदी महिलाएं इसके कारण अपने पार्टनर से अलग हो जाती हैं। अत्यधिक पोर्न वेबसाइट देखने और हस्तमैथून करने से होने वाले दुष्प्रभावों के प्रति चेताते हुए डॉ. संतोष ने सलाह दी कि युवा अपने आप को इससे हट कर सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ खेल और एडवेंचर से जोड़ें।
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नीम हकीम के चक्कर में न पड़े
सुख फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में प्रो. संतोष ने बताया कि लोग इस लोग बात को लेकर भ्रमित हैं कि मेडिकल साइंस में सेक्सोलोजिस्ट से वह अपनी समस्या का निदान प्राप्त कर सकते हैं या नहीं लेकिन वास्तविकता यह है कि इस तरह का कोई प्रोफेशन देश में मान्य नहीं है इसलिए सेक्सोलोजिस्ट के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले नीम हकीमों के चक्कर में न पड़कर, पुरुष रोगी अपना इलाज यूरोलोजिस्ट और महिला रोगी गाइनोकोलोजिस्ट से परामर्श लें। उन्होंने बताया कि मरीज तीन प्रकार के सेक्सुअल रोगों से गुजरता है जिनमें सेक्सुअल डाई फंक्शन, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजिज (एसटीडी) और रिप्रोडक्टिव हेल्थ शामिल हैं।