हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ यूटी प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी और निजीकरण को आगे बढ़ाने की मंजूरी दे दी। इस बीच यूनियन ने मई 2021 में फिर हाईकोर्ट में अर्जी दायर की और प्रक्रिया पर रोक की मांग की थी। हाईकोर्ट ने 10 जून को इस अर्जी पर सुनवाई करते हुए निजीकरण की प्रक्रिया पर फिर से रोक लगा दी, लेकिन प्रशासन दोबारा सुप्रीम कोर्ट चला गया। इस बार भी सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को राहत दी और हाईकोर्ट की रोक को हटा दिया।
बार-बार लग रही ब्रेक की वजह से निजीकरण का काम लटक गया। इसलिए अब ऊर्जा मंत्रालय ने दखल दिया है और इस मामले को जल्द पूरा करने के लिए एक सलाहकार की नियुक्ति की है। मंत्रालय ने प्रशासन को कहा है कि अब वह पूरे मामले को देखेंगे और बताएंगे कि आगे क्या करना है।
सलाहकार धर्मपाल ने ऊर्जा मंत्रालय के सचिव से की मुलाकात
बिजली विभाग की निजीकरण की प्रक्रिया को जल्द पूरा करने के लिए प्रशासक के सलाहकार धर्मपाल ने बीते दिनों ऊर्जा मंत्रालय के सचिव से भी मुलाकात की है। बैठक में निजीकरण में आ रही रुकावटों पर चर्चा हुई। इसके बाद ही मंत्रालय ने कहा है कि अब वह ही प्रशासन को आगे का रास्ता दिखाएंगे। धर्मपाल ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उन्होंने मामले को ऊर्जा मंत्रालय को भेज दिया है। अब वह पूरे मामले को देखेंगे और उसके बाद बताएंगे कि आगे प्रशासन को क्या करना चाहिए।
दौड़ में हैं अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड समेत सात कंपनियां
चंडीगढ़ के बिजली विभाग को खरीदने की दौड़ में कुल सात कंपनियां हैं। इनमें अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड, टाटा पावर, टोरेंट पावर, स्टेरेलाइट पावर, रन्यू विंड एनर्जी, एमीनेंट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड और एनटीपीसी इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी लिमिटेड शामिल हैं। शहर में इस समय 2.47 लाख बिजली उपभोक्ता हैं। इनमें से 2.14 लाख लोग घरेलू बिजली का इस्तेमाल कर रहे हैं जबकि अन्य कामर्शियल, स्माल पावर, पब्लिक लाइटिंग और कृषि के कनेक्शन हैं। निजीकरण होने के बाद अंदेशा है कि बिजली के दाम कम भी हो सकते हैं और बढ़ भी सकते हैं, क्योंकि पिछले कई सालों से शहर में दाम नहीं बढ़ाए गए हैं।