जानकारी के अनुसार, 2008 में असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम को लागू करने के बाद भी जब चार साल तक चंडीगढ़ में इसे अपनाया नहीं गया तो गृह मंत्रालय ने वर्ष 2012 में रिमाइंडर भेजा लेकिन प्रशासन के अधिकारियों पर इसका भी असर नहीं पड़ा। करीब छह साल बाद प्रशासन ने चंडीगढ़ में इसे लागू किया। इस बीच एमएचए की तरफ से कई बार रिमाइंडर भेजे गए। हैरानी की बात है कि बोर्ड के बनने के तीन साल बाद तक बैठक तो दूर प्रशासन ने नियम तक नहीं बनाए कि इस अधिनियम का लाभ चंडीगढ़ में किसे मिलेगा और कौन-कौन से लाभ मिलेंगे।
असंगठित क्षेत्र में आते हैं ये लोग
घरेलू कामगार, महिलाएं, नाई, सब्जी और फल विक्रेता, समाचार पत्र विक्रेता, सफाई कर्मी, सिर पर मैला ढोने वाले, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, पशुपालक, बीड़ी बनाने वाले श्रमिक, ऑटो चालक, रेहड़ी-फड़ी चालक, दुकानों पर काम करने वाले श्रमिक असंगठित क्षेत्र में आते हैं। इसके अलावा छोटे और सीमांत किसान भी इसके तहत आते हैं।
बोर्ड के सदस्य काम करते तो श्रमिकों को मिलते ये लाभ
- आईडी कार्ड
- पीएफ की व्यवस्था
- चोट लगने पर मिलने वाले लाभ
- ईएसआई या स्वास्थ्य इंश्योरेंस
- पक्के छत की व्यवस्था
- बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा
- कौशल उन्नयन
- वृद्धाश्रम व पेंशन
- जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए अन्य योजनाएं
- बेहद कम आमदनी
- अस्थायी रोजगार
- सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता
- श्रम कानूनों के तहत नहीं आते
- स्वास्थ्य संबंधी खतरे बहुत अधिक
- खतरनाक उद्यमों में भी सुरक्षा नहीं
- बढ़ती हुई जटिल आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था
सरकार कहती है कि मजदूरों का शोषण न हो। इसके लिए सोशल सिक्योरिटी एक्ट बनाए जाते हैं, लेकिन राज्य सरकारें उन्हें लागू नहीं करती हैं। इससे मजदूरों का नुकसान होता है। चंडीगढ़ में पहले तो 10 साल बाद बोर्ड बनाया गया। बोर्ड बनने के बाद अब उसका कार्यकाल खत्म होने वाला है और आजतक उसकी कोई बैठक नहीं हुई। इससे बड़ा शोषण मजदूरों का और क्या हो सकता है। - जीवाराज, राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य, ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस (एक्टू)
बोर्ड के गठन के बाद बैठक होनी चाहिए थी। यह पता किया जाएगा कि ऐसा क्यों हुआ है। बोर्ड का कार्यकाल खत्म होने में अभी कुछ समय बाकी है, उसे समय से पहले ही आगे बढ़ा दिया जाएगा। - धर्मपाल, सलाहकार, यूटी प्रशासक