राज्य सरकार के विरोध के विपरीत सैनी को ब्लैंकेट बेल दिलाने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। उनका कहना था कि जो अधिकारी आरोपियों को जमानत दिला सकते हैं, वे पंजाब के हितों की रक्षा के लिए क्या लडे़ंगे? इसलिए ऐसे व्यक्ति को महाधिवक्ता के पद पर रखने का कोई औचित्य नहीं है।
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पता चला है कि बैठक में सिद्दू अपने साथ दो फाइलें लेकर पहुंचे थे। उनमें डीजीपी सहोता और एजी देयोल से संबंधित दस्तावेज थे। फाइलों में दोनों अफसरों के खिलाफ मीडिया में छपी खबरों की कतरनें भी थीं। उन पर सिद्धू ने नोटिंग लगा रखी थी। इनके आधार पर ही उन्होंने दलीलें पेश कीं।
बताया जाता है कि करीब आधा घंटे तक सिद्धू दोनों अफसरों पर जमकर बरसे और अन्य नेता चुपचाप सुनते रहे। इसके बाद परगट सिंह ने बैठक में सिद्धू के आरोपों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अफसरों के बारे में दी गई जानकारी बहुत गंभीर है, इसलिए दोनों अफसरों की तैनाती पर फिर से विचार होना चाहिए।
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इसके जवाब में मुख्यमंत्री चन्नी ने अफसरों का बचाव करते हुए कहा कि सहोता के नेतृत्व में बेअदबी मामले की जांच पूरी होने से पहले ही मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। ऐसे में सहोता द्वारा बादलों को क्लीनचिट देने की बात सही नहीं है। चन्नी ने एजी का भी बचाव करते हुए कहा कि सैनी के मामले में भी एडवोकेट के रूप में वे अपना कार्य कर रहे थे।
सूत्रों ने बताया कि विवाद बढ़ता देख हरीश चौधरी ने हस्तक्षेप किया और तीन सदस्यीय कमेटी के गठन की बात कही। यह कमेटी जहां भविष्य में अफसरों की नियुक्ति पर सर्वसम्मति से फैसला लेगी, वहीं डीजीपी सहोता और एजी देयोल पर लगाए आरोपों का भी गहराई से आकलन करेगी। चौधरी ने यह भी कहा कि यह कमेटी हाईकमान को अपनी रिपोर्ट दिया करेगी और अंतिम फैसले के अनुसार अफसरों की नियु्क्ति पर फैसला लिया जाएगा।