देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भाषाएं बोली व पढ़ी जाती हैं। मौसम विज्ञान केंद्र नई दिल्ली के लिए सभी भाषाओं में सूचना पहुंचाना काफी मुश्किल है, लेकिन कृषि भूमि की कमी व मौसम में बदलाव के कारण तकनीक को अपनाना जरूरी हो गया है। अब मौसम विज्ञान केंद्र ने फैसला किया है कि वे ऐसे ग्राफिक्स व वीडियो तैयार करेंगे, जिसे देश के किसी भी कोने में बैठा किसान व आम व्यक्ति आसानी से समझ सके।
मौसम विज्ञान केंद्र नई दिल्ली उत्तर भारत के क्षेत्रीय प्रमुख चरण सिंह ने बताया कि वर्तमान दौर में खेती के साथ रोजमर्रा की जिंदगी में भी मौसम की बहुत बड़ी भूमिका होती है। हर व्यक्ति के मोबाइल पर मौसम का विश्लेषण मुहैया कराने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि ये एक बड़ी चुनौती भी है क्योंकि भारत बहुत बड़ा देश है और यहां कई भाषाएं बोली व पढ़ी जाती हैं, इसलिए मौसम विज्ञान केंद्र ग्राफिक्स का सहारा ले रहा है, ताकि सभी व्यक्ति तक मौसम की सूचनाएं पहुंचाने के लिए भाषा राह में रोड़ा न बने।
चरण सिंह ने कहा कि सभी भाषाओं में सूचना को अनुवाद करना काफी कठिन काम है, इसलिए ग्राफिक्स का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि ग्राफिक्स की कोई भाषा नहीं होती। इसके साथ ही वीडियो भी बनाए जा रहे हैं। हालांकि, अभी हिंदी और अंग्रेजी में वीडियो बनाए जा रहे हैं। स्थानीय भाषा में भी वीडियो बनाने की कोशिश की जा रही है। इसके लिए यूट्यूब चैनल बनाए गए हैं।
मौसम विश्लेषण के लिए देश में है 3-टियर व्यवस्था
अगर किसी व्यक्ति को पूरे देश के मौसम का विश्लेषण चाहिए, तो वह नई दिल्ली स्थित मुख्यालय ज्यादा अच्छे से कर सकता है क्योंकि दिल्ली मुख्यालय में पूरे देश के मौसम का विश्लेषण किया जाता है। उसके बाद क्षेत्र के अनुसार विश्लेषण किया जाता है। आखिर में राज्यों में बैठे मौसम वैज्ञानिक जिलों के मौसम का विश्लेषण करते हैं। ये 3-टियर व्यवस्था है। चरण सिंह ने बताया कि पहले सिर्फ 24 घंटे या 48 घंटे तक का ही पूर्वानुमान जारी किया जाता था, लेकिन नई तकनीक और 3-टियर व्यवस्था की वजह से हम सात दिन का आधिकारिक पूर्वानुमान जारी कर सकते हैं, जबकि 10 दिन की जानकारी उपलब्ध होती है।
40 वर्षों में एक्यूरेसी 55 से पहुंची 85 फीसदी
चरण सिंह ने बताया कि पिछले करीब 40 साल में पूर्वानुमान की एक्यूरेसी में बढ़ोतरी हुई है। पहले जो मौसम व अन्य के पूर्वानुमान की एक्यूरेसी 50-55 फीसदी थी, अब 80 से 85 फीसदी तक हो गई है। बताया कि अब साइक्लोन के पूर्वानुमान की एक्यूरेसी 90 फीसदी से ज्यादा और भारी बारिश की 80 फीसदी से ज्यादा है। हालांकि, केंद्र अब भी पूर्वानुमान की एक्यूरेसी को बढ़ाने के लिए कार्य कर रहा है। पिछले 10 साल में एक्यूरेसी औसतन 5 प्रतिशत की दर से सुधर रहा था, जो अब घटकर औसतन 2 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसके पीछे बड़ा कारण है कि जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, स्कोप कम होता जा रहा है। हालांकि, नए तकनीक की मदद से अभी भी कई स्तर पर शोध चल रहे हैं।