डंपिंग ग्राउंड, सिंगल विंडो सिस्टम, दिनोंदिन बढ़ते यातायात समेत कई समस्याएं वर्षों से शहरवासियों के लिए मुसीबत का सबब बनी हुई हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए प्रशासनिक स्तर पर कई बार प्रयास किए गए, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है या न के बराबर निस्तारित हुई है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के अंतर्गत इन समस्याओं की योजनाएं तो चल रही हैं, लेकिन इनसे जल्द निजात मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही। दशहरे पर हर शहरवासी की यही इच्छा है कि रावण के दसों सिरों की तरह खड़ी इन समस्याओं का भी संहार किया जाए। शहर की 10 प्रमुख समस्याएं क्या हैं, आइए जानते हैं।
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1-सिंगल विंडो सिस्टम
सिंगल विंडो सिस्टम के लिए प्रशासक, उनके सलाहकार और जनप्रतिनिधि समय-समय पर दावा करते रहे हैं, लेकिन आज तक इसकी सुविधा नहीं मिली है। एक पेड़ कटवाने के लिए भी लोगों को नगर निगम, प्रशासन और पर्यावरण विभाग के चक्कर लगाने पड़ते हैं। छोटे से शहर के लिए यह महज एक उदाहरण भर है। विभागों के बीच तालमेल न होने से लोगों को कई समस्याएं झेलनी पड़ती हैं।
2-डंपिंग ग्राउंड
डड्डूमाजरा समेत शहर के लोगों के लिए डंपिंग ग्राउंड किसी नासूर से कम नहीं। लोगों को उम्मीद थी कि 18 माह में डंपिंग ग्राउंड को हटा दिया जाएगा, जिससे लोगों को साफ हवा मिलेगी, लेकिन कचरे का एक पहाड़ तो हटा नहीं, दूसरा खड़ा हो गया है। लोगों को अब जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के वायदों पर भी भरोसा नहीं रहा। तत्कालीन प्रशासक और वर्तमान सांसद ने कहा था कि वे अपनी निगरानी में कूड़े को हटवाएंगे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ।
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3-लटकते तार, जी का जंजाल
चंडीगढ़ को स्मार्ट सिटी का तमगा मिला हुआ है। यही नहीं इसे संवारने और विकास पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इंडस्ट्रियल एरिया समेत शहर के प्रमुख बाजारों और कॉलोनियों में लटकते तार इस बात की गवाही दे रहे हैं कि स्मार्ट सिटी में सब कुछ व्यवस्थित नहीं है। सड़कों, खंभों और दीवारों से लटकते तार के गुच्छे शहर की सुंदरता पर भी धब्बा लगा रहे हैं।
4-पार्किंग पॉलिसी
बढ़ती जनसंख्या के साथ ही अब लोगों के घरों में वाहनों की संख्या भी बढ़ने लगी है। देश में प्रति व्यक्ति कार रखने के मामले में चंडीगढ़ नंबर एक पर है, लेकिन पार्किंग पॉलिसी न होने के कारण अब घरों में कार रखने की जगह ही नहीं बची है। ऐसे में लोग अपने वाहन सड़कों या पार्कों में खड़ा कर रहे हैं। इससे यातायात में परेशानी के साथ पार्कों की स्थिति भी खराब हो रही है।
5-बढ़ता यातायात
शहर में वाहनों की संख्या बढ़ने के साथ ही सड़कों पर दबाव भी बढ़ गया है। इससे जाम की समस्या बढ़ गई है। सुबह और शाम को कुछ प्रमुख चौराहों पर जाम की बात आम हो चुकी है। इसमें फंसकर लोगों का भी रोजाना बुरा हाल होता है। वहीं, दफ्तर पहुंचने में देर होने के डर से लोग तेज रफ्तार वाहन भी चलाते हैं, जिससे हादसे का डर बना रहता है।
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6-सीवर के पानी की निकासी की समस्या
चंडीगढ़ प्रशासन ट्रीटेड पानी के उपयोग और नल से सीधे पानी देने की बात करता है, लेकिन हल्लोमाजरा में पिछले 20 वर्षों से सीवर के पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं बन पाई है। एनजीटी की फटकार के कारण चौ में गंदे पानी की निकासी बंद कर दी गई है। अब बारिश में लोगों के घरों तक यह गंदा पानी पहुंचता है।
7-अतिक्रमण
अतिक्रमण के मामले में यूटी प्रशासन से लेकर नगर निगम और पुलिस तक को फटकार लग चुकी है, लेकिन इस पर लगाम लगाने में अधिकारी और अतिक्रमण हटाओ दस्ता पूरी तरह फेल रहे हैं। निगम और प्रशासन का अतिक्रमण हटाने वाला दस्ता सामूहिक कार्रवाई के बाद भी बाजारों से अतिक्रमण नहीं हटवा पा रहा है। अधिकारी हमेशा कर्मचारियों की संख्या कम होने का रोना रोते रहते हैं।
8-लावारिस पशु
नगर निगम लावारिस पशुओं को पकड़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करता है। काऊ सेस के नाम पर जनता से भी कर वसूला जाता है, लेकिन जब लोग अपनी समस्या लेकर अधिकारियों के पास जाते हैं तो साफ कहा जाता है कि ये पशु पंचकूला और मोहाली से चंडीगढ़ में आते हैं। इसे लेकर नगर निगम सदन में सिर्फ बहस होती है। गोशालाओं में गायों की दशा को लेकर कई बार बवाल हो भी चुका है।
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9-बस क्यू शेल्टर का निर्माण
शहर के 209 बस क्यू शेल्टर बनाने के लिए वर्षों से प्रस्ताव लटका हुआ है, लेकिन आज तक योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया गया। पहले प्रशासन ने बस क्यू शेल्टर बनाने और उस पर विज्ञापन लगाने के लिए एक ही कंपनी की शर्त रखी थी। इस कारण कोई आगे नहीं आया। अब दोनों व्यवस्थाओं को अलग करके फिर से टेंडर किया गया है।
10-सफाई व्यवस्था
स्वच्छता सर्वेक्षण में चंडीगढ़ को नंबर वन बनाने का दावा करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को यह नहीं दिखता कि हल्लोमाजरा में कचरे का कोई बॉक्स ही नहीं है। यही नहीं, पेक के साथ सटे कचरे के बॉक्स की हालत भी जर्जर है। मलोया में लोगों को बसे हुए दो साल हो गए, लेकिन यहां अब तक सफाई कर्मी की तैनाती तक नहीं हुई है। निगम और हाउसिंग बोर्ड सिर्फ अपने दावे करते रहते हैं, लेकिन होता कुछ नहीं है।