हमारा धर्म आत्मा के उत्थान और मनुष्यों के श्रेष्ट कर्मों को निरूपित करता है। यह संसार के आधार पर चल रहा है। आत्मा मनुष्यों के कर्म के अनुसार भ्रमण करती है।
आत्मा के गुणों को धारण करना ही धर्म है, जो इससे अलग है वह अधर्म है। ये शब्द मुनिश्री विनयकुमार आलोक ने प्रस्थान से पूर्व अणुव्रत भवन सेक्टर-24 में सभा को संबोधित करते हुए कहे। उन्होंने कहा अध्यात्म अर्थात आत्मा को सिर्फ अनुभव से जाना जाता है।
विज्ञान सिर्फ वहीं बात मानता है जो आंखों से देखी जा सके और लोगों को प्रमाणिक रूप से सिद्ध कर सके। विज्ञान से विकास और विनाश दोनों ही हो सकते हैं। जबकि, आत्मा और कर्म के उत्थान से सिर्फ विकास ही होता है।
पहले विज्ञान वनस्पतियों में जीव की अवधारणा को नहीं मानता था, जबकि धर्मों में उनमें जीवन होने की बात कही गई है। विज्ञान अधूरा है, जबकि जैन धर्म संपूर्ण है।
मुनिश्री शोभायात्रा के साथ अणुव्रत भवन से विहार कर सेक्टर-33 सुधीर जैन के आवास पर पहुंचे। इस अवसर पर सुधीर परिवार ने मुनिश्री का स्वागत किया। मुनिप्रवर ने कहा कि जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान होना जरूरी है।