हाई रिस्क प्रेगनेंसी यानी गर्भावस्था के दौरान जोखिम वाली महिलाओं के संस्थागत प्रसव के बाद भी कम से कम 2 वर्षों तक फॉलोअप करना बेहद जरूरी है। क्योंकि नियर मिस यानि जरा सी चूक के कारण जान जोखिम में पड़ने वाली श्रेणी में आने वाली ऐसी माताओं की जान जोखिम में होती है।
प्रसव के बाद उन्हें शारीरिक से लेकर कई तरह की मानसिक परेशानियां शुरू हो जाती हैं। जिसका समय रहते ही इलाज शुरू ना होने पर जान जाने का भी जोखिम रहता है। यह जानकारी पीजीआई के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की डॉ. आशिमा व डॉ. मीनाक्षी रोहिल्ला ने शनिवार को पीजीआई में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में दी।
फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया (फॉग्सी) और पीजीआई स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की ओर से आयोजित सम्मेलन में डॉ. आशिमा ने बताया कि आईसीएमआर के प्रोजेक्ट पर पीजीआई ने तीन साल तक काम किया। जिसमें उस दौरान हुई 13 हजार डिलीवरी का ब्यौरा लिया गया। उन 13 हजार माताओं में से 520 नियर मिस की श्रेणी में थीं।
चिंता की बात यह है उन 520 माताओं में से 20 की मौत हो गई। इससे यह पता चलता है कि हाई रिस्क प्रेग्नेंसी में शुरू से ही नियमित चेकअप कराने के साथ अन्य आवश्यक सावधानियों का पालन बेहद जरूरी है। साथ ही उन माताओं की प्रसव के बाद अनदेखी नहीं होनी चाहिए। अन्यथा उनकी जान जोखिम में पड़ सकती है।
नियर मिस क्लीनिक में लिया गया फॉलोअप
डॉ. मिनाक्षी ने बताया कि पीजीआई में ऐसी माताओं के लिए नियर मिस क्लीनिक प्रत्येक शनिवार को कमरा नंबर 224 में चलाई जा रही है। प्रोजेक्ट के दौरान उन 520 माताओं को हर तीन महीने पर उनके बच्चे के साथ फॉलोअप के लिए बुलाया गया। जिसमें पता चला कि उनमें से 20 की मौत हो गई। वहीं 75 को परमानेंट कोई न कोई परेशानी जैसे किडनी या हृदय रोग हो गया। बहुतों की सेहत खराब होने से उनके बच्चों के वजन और खून की मात्रा पर सीधा दुष्प्रभाव पड़ा। लेकिन जिन माताओं ने नियमित रूप से क्लीनिक में फाॅलोअप दिया उनमें से काफी को राहत मिली।
शरीर से दिमाग तक प्रभावित
नियर मिस माताओं की जिंदगी प्रसव के बाद पूरी तरह बदल गई। वे विभिन्न प्रकार की शारीरिक समस्याओं के साथ ही मानसिक परेशानियों से ग्रस्त हो गई। डॉ. आशिमा ने बताया कि उन महिलाओं का मनोचिकित्सकीय विश्लेषण भी किया गया। जिसमें यह बात सामने आई कि वे उच्च श्रेणी अवसाद में चली गई। उनकी क्वालिटी ऑफ लाइफ पर दुष्प्रभाव पड़ा। वहीं जब उनमें दूसरे बच्चे की प्लैनिंग का स्तर जांचा गया तो पाया गया कि उनमें से 20 प्रतिशत ने तो जान बचाने के लिए अपना यूट्रस ही गवां दिया था। फिर वे दोबारा मां कैसे बन पाएगी।
सम्मेलन में देशभर के विशेषज्ञों का जमावड़ा
सम्मेलन की आयोजक सचिव डॉ. मिनाक्षी ने बताया कि विभागाध्यक्ष डॉ वनिता सूरी के मार्गदर्शन में इसका आयोजन किया गया है। प्रसूति एवं स्त्री रोग सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. एस. सी. साहा इस कार्यक्रम के आयोजन अध्यक्ष हैं। सम्मेलन मातृ जीवन को बचाना पर केंद्रित है। जिसमें पहले दिन डॉ. अंजू ग्रेवाल (संज्ञाहरण विभाग, एम्स, बठिंडा के प्रमुख) और डॉ. विमी रेवाड़ी (प्रोफेसर, एनेस्थीसिया विभाग, एम्स, दिल्ली) व पीजीआई एनेस्थिसिया विभाग की डॉ. काजल जैन ने महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी।