शिक्षकों ने साझा किए ऑनलाइन शिक्षण के अनुभव।
कोरोना महामारी में ऑनलाइन शिक्षा एक ऐसी चुनौती के तौर पर आई, जिसके लिए देश के अधिकांश शिक्षक तैयार नहीं थे। कई ऐसे भी थे, जिनका कंप्यूटर के साथ ही जूम या गूगल मीट जैसे सॉफ्टवेयर से दूर-दूर तक नाता नहीं था। विद्यार्थियों के भविष्य के लिए शिक्षकों ने इस चुनौती को भी स्वीकार किया और नई तकनीक से जुड़ने के लिए कड़ी मेहनत की।
नतीजा यह रहा कि जो शिक्षक कंप्यूटर व लैपटॉप चलाने से डरते थे, आज वह इतने प्रशिक्षित हो गए हैं कि ऑनलाइन माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। विद्यार्थियों तक ऑनलाइन शिक्षा ऐसे ही नहीं पहुंची, इसके पीछे गुरुजनों का बहुत बड़ा त्याग है। पहले खुद सीखा और फिर ऑनलाइन शिक्षा से विद्यार्थियों को जोड़ा। अब जरूरत है कि इनके त्याग को बेकार न होने दें और संकल्प लें कि शिक्षक दिवस पर ऑनलाइन शिक्षा को अपनाते हुए मंजिल की ओर बढ़ना है।
- प्रो. अनिल किशोर सिन्हा, सीनियर प्रोफेसर, मानव विज्ञान विभाग पीयू।
बेटी ने सिखाया और अब 18 घंटे तक ऑनलाइन कक्षाएं ले रहा हूं
स्कूल-कॉलेजों में जब शिक्षक पढ़ाते थे तब यही सोचता था कि एक दिन मैं भी विद्यार्थियों को ब्लैकबोर्ड के सामने खड़े होकर पढ़ाऊंगा। मेरा सपना साकार हुआ और 30 साल से मैं पंजाब विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को ब्लैकबोर्ड के सामने खड़े होकर पढ़ा रहा था लेकिन अचानक कोरोना वायरस आ गया और साथ में ले आया ढेर सारी आफत।
एक तो सभी संक्रमण के खतरे को लेकर आशंकित थे तो दूसरी ओर शिक्षा संचालन के लिए ऑनलाइन पद्धति अपनाने पर जोर था। मैंने ऑनलाइन शिक्षा के बारे में सुना तो था लेकिन कभी ऑनलाइन नहीं पढ़ाया था। चुनौती बड़ी थी। नौकरी भी करनी थी, इसलिए ऑनलाइन शिक्षा की ट्रेनिंग बहुत जरूरी थी। इसके लिए बेटी का सहारा लिया और अपने रिसर्च स्कॉलर की मदद ली।
दस दिन तक कड़ी मेहनत की और आज स्थिति यह है कि कंप्यूटर पर मेरी अंगुलियां फटाफट दौड़ रही हैं। अब कंप्यूटर पर सप्ताह में 18 घंटे तक ऑनलाइन कक्षाएं ले रहा हूं। मेरा मानना है यदि व्यक्ति चाहे तो क्या नहीं कर सकता लेकिन ईमानदारी की बात तो यह है कि ब्लैकबोर्ड पर पढ़ाने में जो आनंद आता है वह ऑनलाइन प्रणाली में कहां। विद्यार्थियों से पढ़ाई के दौरान आमना-सामना होना बहुत जरूरी है।
- प्रो. अनिल किशोर सिन्हा, सीनियर प्रोफेसर, मानव विज्ञान विभाग पीयू।
ऑनलाइन में पारंगत होने के लिए की कड़ी मेहनत
प्रो. पी वेणुगोपालन, रसायन विभाग पीयू
हमने जब पढ़ाई की तब ब्लैकबोर्ड पर ही पढ़ाई होती थी लेकिन जब हमने पढ़ाना शुरू किया तो धीरे-धीरे कंप्यूटर का ज्ञान हासिल किया और तमाम कार्य कंप्यूटर के जरिए ही करने लगे। विदेश में ऑनलाइन शिक्षा प्रचलित थी। सोचते थे कि यह एक दिन भारत में भी शुरू होगी मगर इस महामारी ने ऑनलाइन शिक्षा को तुरंत शुरू करने को विवश कर दिया।
आज पूरे विश्व में शिक्षा ऑनलाइन हो गई। बाकी शिक्षकों की तरह मैं भी शुरू में ऑनलाइन शिक्षा में पारंगत नहीं था। विद्यार्थियों को पढ़ाना था इसलिए पीयू की ओर से यूआईईटी विभाग ने एक ट्रेनिंग प्रोग्राम रखा। इंजीनियरिंग विभाग से ऑनलाइन शिक्षा का प्रशिक्षण लिया। उसके बाद मैं घर पर भी इसके लिए अभ्यास करता था।
साथ ही दो-दो घंटे पढ़ाता था, जो भी दिक्कतें आती थीं, उन्हें नोट करता था और कक्षा खत्म होने के बाद उनका हल निकालता था। मेरा मानना है कि कोई कार्य असंभव नहीं है लेकिन उसको सीखना पड़ता है। ऑनलाइन शिक्षा में पारंगत होने में मुझे भी पांच दिन लग गए थे। आज मैं आनलाइन कई घंटे तक विद्यार्थियों को पढ़ा रहा हूं। इसके लिए मुझे कड़ी मेहनत करनी पड़ी। वैसे भी शिक्षक काफी मेहनत करते हैं। -प्रो. पी वेणुगोपालन, रसायन विभाग पीयू
कंप्यूटर को देखकर लगता था डर, अब उसी पर बच्चों को पढ़ा रही हूं
पंकज महाजन, अध्यापिका, बीटीएस स्कूल
जिदंगी में कभी सोचा नहीं था कि एक दिन कंप्यूटर भी सीखना पड़ेगा और बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाना पड़ेगा लेकिन समय ने इसे भी सिखा दिया क्योंकि इसके बिना अब गुजारा नहीं इै। मुझे कंप्यूटर की एबीसीडी तक नहीं पता थी। अप्रैल में जब स्कूल प्रशासन की ओर से फरमान आया कि ऑनलाइन माध्यम से पढ़ाई जारी रहेगी। तब यह सुनकर एक दम से मेरे हाथ पांव फूल गए।
कंप्यूटर सीखने की सोची लेकिन लॉकडाउन लगा हुआ था और बाहर निकलना मना था। कंप्यूटर सेंटर भी बंद थे। मेरी परेशानी को देखकर मेरी बेटी, जो सेंट स्टीफंस में 12वीं की छात्रा है, उसने मुझे कंप्यूटर सिखाना शुरू कर दिया। शुरू में थोड़ी परेशानी आई मगर बेटी ने 15 दिनों में मुझे काफी कुछ सिखा दिया। बेटी की कुछ दोस्तों ने भी मेरी बहुत मदद की। धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने भी ऑनलाइन क्लासेज लेनी शुरू कर दीं। जिस कंप्यूटर को मैंने कभी हाथ नहीं लगाया था, अब उसी पर निगाहें और हाथ चलते रहते हैं। दिन में कई घंटे बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई करवा रही हूं। मुझे कंप्यूटर चलाना आ गया। अब मैं किसी को भी कंप्यूटर चलाने मे मदद कर सकती हूं। -पंकज महाजन, अध्यापिका, बीटीएस स्कूल
कभी कंप्यूटर नहीं चलाया था, बेटी की ट्रेनिंग से अब लेती हूं ऑनलाइन क्लास
कुलविंदर कौर, शिक्षिका, सरकारी कॉलेज, फेज छह, मोहाली
20 सालों से टीचिंग लाइन में हूं। छात्रों को इतिहास पढ़ाती हूं। कोरोना आया तो अपने संग काफी मुसीबतों को भी लेकर आया। अचानक पढ़ाने का तरीका ही बदल गया। जब पता चला कि कंप्यूटर के माध्यम से विद्यार्थियों को ऑनलाइन पढ़ाना है तो लगा कि यह सब कैसे हो पाएगा। सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि कंप्यूटर को चलाना नहीं आता था। इस दौरान मेरी बेटी जो कि कंप्यूटर साइंस की छात्रा है, उसने इस मुश्किल समय में सहारा दिया और साथ ही मुझे इस दिशा में ट्रेंड करने का काम शुरू किया लेकिन यह काम आसान नहीं था, इस काम में महारत हासिल करने में मुझे एक महीने से अधिक का समय लग गया।
बेटी ने कंप्यूटर चलाना, कैमरे पर बोलना, वीडियो बनाना, एक साथ सौ बच्चों को पढ़ाने के तरीके आदि को लेकर मुझे प्रशिक्षित किया। घर में कई बार इसके ट्रायल होते रहे। इसके अलावा यू टयूब पर कई अन्य टीचरों को पढ़ाते देख भी काफी कुछ सीखा। अब मैं पूरी तरह से इसमें पारंगत हो गई हूं। - कुलविंदर कौर, शिक्षिका, सरकारी कॉलेज, फेज छह, मोहाली
परिवार और स्कूल स्टाफ ने की पूरी मदद, आज ऑनलाइन ले रही हूं क्लास
भारती गुप्ता, अध्यापिका, सरकारी स्कूल, रायपुररानी
न तो मुझे मोबाइल की तकनीक मालूम थी और न ही कंप्यूटर की। छह महीने पहले तक मेरी सोच थी कि अपने बच्चों को दसवीं कक्षा से पहले मोबाइल की आदत बिल्कुल नहीं डालूंगी लेकिन क्या पता था कि मोबाइल की सारी तकनीक खुद को भी सीखनी पड़ेगी और साथ ही बच्चों को भी सिखानी पड़ेगी। मैं तो सीधी सादी टीचर थी। स्कूल जाती और बच्चों को पढ़ाती थी।
कोरोना काल आया तो सबकुछ बदल गया। मैं रायपुररानी के गवर्नमेंट स्कूल में कार्यरत हूं। अब कोविड ड्यूटी में सबकुछ ऑनलाइन हो गया। मोबाइल और कंप्यूटर आवश्यक हो गया। विकट समस्या थी, मुझे यह सीखना भी था और जल्दी। ऐसे में मेरी मदद मेरे परिवार ने की। स्कूल स्टाफ ने भी बताया कि कैसे क्लास ज्वाइन करवानी है, कैसे बच्चों की हाजिरी लेनी है और कैसे उनको पीपीटी बनाकर समझाना है। अब मैं एकदम परफेक्ट हूं। अब यह समझ में आ गया कि जिस दौर में जीना है, उसकी तकनीक को भी अपनाना जरूरी है। - भारती गुप्ता, अध्यापिका, सरकारी स्कूल, रायपुररानी
पहले सीखने में झिझक थी लेकिन अब निपुण हो गई हूं
स्वाति, अध्यापिका, सेंट विवेकानंद मिलेनियम स्कूल, पिंजौर
मैं पहले मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ फोन कॉल के लिए करती थी। कंप्यूटर और मोबाइल में मेरी रुचि नहीं थी लेकिन कोरोना ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया। शुरुआत में मुझे ई-लर्निंग को सीखने में काफी झिझक थी। बिना ब्लैकबोर्ड के कैसे पढ़ाई हो पाएगी, इसे लेकर काफी दुविधा थी। ऑलनाइन पढ़ाई के लिए स्कूल प्रबंधन ने पहले ट्रेनिंग दी, फिर घर आकर भी प्रशिक्षण दिया।
मैंने भी काफी मेहनत की और उसके बाद इसमें कामयाबी मिली। अब मैं ऑनलाइन पढ़ाने में काफी निपुण हो गई हैं। इसके माध्यम से कई नई चीजें सीखने को मिली हैं। विद्यार्थियों को भी काफी आसानी हुई है। ई-लर्निंग के माध्यम से जो शिक्षा बच्चे सीनियर कक्षाओं में ग्रहण करते थे उस ई-लर्निंग सिस्टम को बच्चे अब प्राइमरी कक्षाओं में ही सीख गए हैं। इससे बच्चों को आने वाले समय में कोई कठिनाई नहीं होगी। अब मैं बच्चों की शिक्षा और उन्हें पेश आने वाली समस्याओं को हल करने के लिए रात को भी फोन अपने पास ही रखती हूं। - स्वाति, अध्यापिका, सेंट विवेकानंद मिलेनियम स्कूल, पिंजौर
वेबिनार, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करने के साथ सर्टिफिकेट भी कर लेता हूं तैयार
डा. सुरेंद्र जिंदल, प्रिंसिपल, स्मार्ट हाईस्कूल, गांव रडिआला, मोहाली
कोरोना काल ने स्कूल बंद करवा दिए, शिक्षा व परीक्षा में विघ्न पैदा किया। हार मानने की बजाय समय की जरूरत के लिहाज से चलना अध्यापकों के लिए लाजमी था। किताबों से नोट्स तैयार करना, क्लास में विद्यार्थियों को समझाना हमारी दिनचर्या थी। कोरोना काल में पढ़ाई ही नहीं अन्य प्रबंधन कार्य भी वर्चुअल होने लगे।
40 की उम्र पार कर चुके लोगों के लिए यह मुश्किल था, पर हमने सीखा। कुछ अपने बच्चों से और कुछ एक्सपर्ट से। वर्चुअल क्लास के दौरान कई बार कुछ ऑप्शन तो स्टूडेंट ही सिखा देते हैं। आज फोन या लैपटॉप के जरिए न सिर्फ पढ़ा रहे हैं, बल्कि टेस्ट लेना, चेक करना और उसका डिजिटल रिकार्ड रखना हमने सीख लिया है। भले ही यह महामारी की मजबूरी के कारण हुआ लेकिन इसने हमें युवा पीढ़ी के करीब ला दिया है। अब वेबिनार, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, कंप्यूटराइज्ड मैटेरियल, सर्टिफिकेट तैयार करना हमने सीख लिया है। हालांकि इसके लिए कुछ अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ी। यदि मुश्किल वक्त न आता तो संभवत: हम यह सब न सीख पाते। - डा. सुरेंद्र जिंदल, प्रिंसिपल, स्मार्ट हाईस्कूल, गांव रडिआला, मोहाली