फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पंजाब में घट रही धूप: पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पांच दशक के शोध में खुलासा, धान की पैदावार पर भी असर

Fri, 25 Aug 2023 03:42 PM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

1984-2019 के दौरान शोध के विश्लेषण में यह बात सामने आई कि चावल की फसल पर अधिकतम प्रभाव के साथ मासिक धूप के घंटों में कमी आई है। उक्त अवधि में बल्लोवाल, सौंखरी (नवांशहर) में मार्च से मध्य अप्रैल को छोड़कर सभी महीनों में धूप के घंटों में गिरावट देखी गई।
विज्ञापन
पंजाब में घट रही धूप। - फोटो : फाइल
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

गर्मी के मौसम में बहुत कम गर्मी, सर्दी के मौसम में भी गर्मी जैसा माहौल, मानसून के दौरान बेहिसाब बारिश ने पंजाब की आबोहवा पर बुरा असर डालना शुरू कर दिया है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों द्वारा इस मामले में की जा रही शोध में यह खुलासा हुआ है कि इस जलवायु परिवर्तन से पंजाब को धान की पैदावार में गंभीर कमी का सामना करना पड़ सकता है और इसका दूरगामी प्रभाव पूरे देश को उठाना पड़ेगा, क्योंकि अनेक राज्य पंजाब से चावल की आपूर्ति पर निर्भर हैं।

विज्ञापन


लुधियाना स्थित पीएयू में जलवायु परिवर्तन और कृषि मौसम विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा बीते पांच दशकों से सूबे के मौसम के कृषि उत्पादकता पर होने वाले असर के बारे में जारी शोध में यह पता चला है कि राज्य में अब धूप के घंटों में कमी आई है और मानसून में वर्षा पैटर्न भी बदला है, जो सामान्य नहीं रह गया है।

यह भी पढ़ें: Chandigarh: सरहद पार से घुसपैठ रोकेंगे एआई से लैस स्वदेशी ड्रोन, इजराइल पर निर्भरता भी होगी खत्म
विज्ञापन


तापमान और बारिश की अनियमितता और उतार-चढ़ाव विशेष रूप से चावल की फसल के लिए हानिकारक है। पीएयू के प्रिंसिपल साइंटिस्ट (कृषि मौसम विज्ञान) डा. प्रभज्योत कौर द्वारा संकलित किए गए शोध निष्कर्षों में कहा गया है कि पंजाब में मौसम के पैटर्न और जलवायु की स्थिति में तेजी से महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं, जो सीधे तौर पर कृषि ढांचे को प्रभावित करने लगे हैं।

पीएयू के वैज्ञानिकों ने सूबे के सात कृषि-जलवायु क्षेत्रों- उत्तर-पूर्वी भाग में बल्लोवाल सौंखरी (नवां शहर), मध्य क्षेत्र में अमृतसर, लुधियाना और पटियाला, पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में फरीदकोट, पश्चिमी भाग में बठिंडा और अबोहर, में बीते पांच दशकों (1970-2019) के दौरान वार्षिक और मौसमी (मानसून, खरीफ, सर्दी और रबी सीजन) के आधार पर एकत्र किए गए डेटा का आंकलन कर उक्त निष्कर्ष निकाला है।

धूप कम और छाए रहा करेंगे बादल
सात कृषि क्षेत्रों में धूप का आंकलन करने पर पाया गया है कि वार्षिक, खरीफ और रबी सीजन के दौरान धूप के घंटों में लुधियाना व बल्लोवाल सौंखरी में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज हुई। वैज्ञानिकों का मानना है कि फसलों को अपनी वृद्धि के लिए इष्टतम धूप घंटे की आवश्यकता होती है और धूप के घंटे में यह कमी भविष्य में चिंता का कारण हो सकती है, क्योंकि अब पूरे पंजाब में आने वाले वर्षों में राज्य में बादल छाए रहने की स्थितियों में लगातार वृद्धि होगी। शोध वाले उक्त कृषि क्षेत्रों में, जलवायू परिवर्तन के बीच धान की उपज का भी विश्लेषण करते हुए पाया गया कि धान का उत्पादन बढ़ाने में धूप के घंटे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कम धूप वाली परिस्थितियों में अधिक उपज देने वाली फसल की किस्मों के प्रजनन पर विपरीत असर पड़ता है। इसके अलावा, गर्म दिनों में कम धूप के कारण वाष्पीकरण में कमी, आर्द्रता में बढ़ती गर्म प्रवृत्ति और आर्द्र मौसम में वृद्धि भी विपरीत कारक के रूप में काम करेगी। इन सभी परिवर्तनों का राज्य भर में वनस्पतियों और जीवों, कीट-पतंगों, बीमारियों और खरपतवारों के बदलते पैटर्न भी सामने आएंगे, जिनका असर कृषि पर ही पड़ेगा।

यह भी पढ़ें: Chandigarh: सरहद पार से घुसपैठ रोकेंगे एआई से लैस स्वदेशी ड्रोन, इजराइल पर निर्भरता भी होगी खत्म
विज्ञापन


धान की फसल को मिल रही कम धूप
1984-2019 के दौरान शोध के विश्लेषण में यह बात सामने आई कि चावल की फसल पर अधिकतम प्रभाव के साथ मासिक धूप के घंटों में कमी आई है। उक्त अवधि में बल्लोवाल, सौंखरी (नवांशहर) में मार्च से मध्य अप्रैल को छोड़कर सभी महीनों में धूप के घंटों में गिरावट देखी गई, जबकि लुधियाना में इसी अवधि के दौरान जनवरी, सितंबर, अक्टूबर और नवंबर में धूप के घंटों में गिरावट देखी गई। विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि पंजाब में धूप वाले दिनों की संख्या में गिरावट को भी बदलती जलवायु के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। कम धूप फसल की वृद्धि, विकास और समग्र उपज को प्रभावित करती है। धूप के कम घंटों के कारण, फसलों को प्रकाश संश्लेषण के लिए कम ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे विकास दर धीमी हो जाती है और उपज संभावित रूप से कम हो जाती है।

सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता जरूरीः डा. प्रभज्योत कौर
पीएयू की प्रिंसिपल साइंटिस्ट (कृषि मौसम विज्ञान) डॉ. प्रभज्योत कौर का कहना है कि कम धूप का प्रभाव विशेष रूप से रबी और खरीफ सीजन के दौरान स्पष्ट तौर पर सामने आने लगा है। गेहूं, चावल और विभिन्न सब्जियों का उत्पादन सूर्य के प्रकाश की उपलब्धता में परिवर्तन से प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि यह पहचानना आवश्यक है कि ये परिवर्तन न केवल व्यक्तिगत फसल की पैदावार को प्रभावित करेगा बल्कि खाद्य सुरक्षा, आय सृजन और समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक प्रभाव डालेगा।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें